ग़ज़ल का बदला है मिज़ाज!

By Staff
ग़ज़ल का बदला है मिज़ाज!

सुशील झा

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

लिखना कठिन काम है. अगर वो ग़ज़ल, नज़्म या कविता हो तो और भी कठिन है.

लेकिन अगर कोई ऐसा लिख ले और उस साहित्य के नामी गिरामी लोग कहें कि लिखने वाले ने विधा का मिज़ाज बदला है...

बात हो रही है पत्रकार मधुकर उपाध्याय के कविता संग्रह की.....और तारीफ़ करने वाले कोई और नहीं....समीक्षक नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी जैसे दिग्गज.

अस्सी से अधिक कविताओं का यह संग्रह 'बात नदी बन आए' के नाम से प्रकाशित हुआ है. पुस्तक का विमोचन करते हुए अशोक वाजपेयी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मधुकर ने जो भी लिखा है वो ग़ज़ल और नज़्म के बीच है और इसकी चर्चा हिंदी ही नहीं बल्कि उर्दू साहित्य के लोगों के बीच भी होनी चाहिए.

वो कहते हैं, "ये हिंदी में लिखी हुई उर्दू की पुस्तक है. इसे नया प्रयोग भी कह सकते हैं. बहर शैली में लिखा गया है... इसमें ग़ालिबाना, मीराना और ख़ुद उनका अपना अंदाज़ भी है."

अशोक वाजपेयी कहते हैं, "मधुकर ने ख़ामख़ां हिंदी में ग़ज़ल लिखने की कोशिश नहीं की है...नई कविता की शैली में भले ही लिखा हो..."

इस अवसर पर जाने माने समीक्षक नामवर सिंह ने स्पष्ट किया कि वो मधुकर के गद्य के कायल थे लेकिन उन्होंने ख़ुशी ज़ाहिर की कि मधुकर अपने कविता संग्रह के साथ एक नई शैली की सोच लेकर आए हैं .

उन्होंने कहा, "उर्दू ग़ज़ल का पूरा मिज़ाज बदला है... ग़ज़ल और नज़्म के बीच एक नया रिश्ता कायम किया है और आशिक और माशूक से अलग लिखा है....ग़ज़ल का फ़ॉर्म नहीं कॉंटेंट बदला है."

नामवर सिंह ने कविता संग्रह में से एक पंक्ति का ज़िक्र किया -

‘बात मुश्किल न थी मगर उसने,

सब समझ बूझ कर कहा यानी...

या फिर ये पंक्तियाँ देखिए कि...

छू कर मेरा ख़्याल मुझे यूं लगा कि, बस

कोना स्याह दिन का चमकने लगा कि, बस

तुझसे कहा था और छिपाया था बहुत कुछ

कोई परत उधेड़ने मैं भी गया कि, बस’

नामवर सिंह ने कहा कि मधुकर की कविताओं में एक बांकपन, टेढ़ापन है जिसे संस्कृत काव्य परंपरा में वक्रोक्ति कहते हैं.

उनका कहना था कि वो मानते हैं कि 'इस काव्य शैली में सबसे बड़ी बात यही है कि ये आशिक और माशूक से जुड़ी हुई नहीं है जो बंधी बंधाई रहती है. बिल्कुल अलग मुद्दों पर ऐसे क़ाफ़ियों के साथ लिखना मुश्किल काम है...'

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