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    राजपाल यादव और खली की कुश्ती

    By Ankur Sharma
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    दुर्गेश उपाध्याय

    बीबीसी संवाददाता, मुंबई

    हॉकी, क्रिकेट, और फ़ुटबॉल पर आधारित फ़िल्मों के बाद अब बॉलीवुड में बनी है कुश्ती पर एक फ़िल्म.

    फ़िल्म ‘कुश्ती’ कॉमेडी है और इसमें मुख्य भूमिकाओं में राजपाल यादव, ओम पुरी, असरानी और शरद सक्सेना हैं. इस फ़िल्म की एक ख़ासियत ये भी है कि जाने-माने पहलवान खली की ये पहली हिंदी फ़िल्म है.

    इस फ़िल्म का निर्देशन टी के राजीवकुमार ने किया है. बीबीसी ने राजीवकुमार और राजपाल यादव से बातचीत की.

    फ़िल्म में राजपाल यादव का किरदार एक पोस्टमैन का है. कहानी के बारे में राजपाल यादव कहते हैं, “कुश्ती एक पोस्टमैन की कहानी है जिसे एक ऐसी जगह भेजा जाता है जहां पहलवानों का बोलबाला है. वो पोस्टमैन किस तरह की चीज़ों में उलझता जाता है, यही कहानी है.”

    फ़िल्म के क्लाइमैक्स में पांच फ़ीट तीन इंच के राजपाल यादव और सात फ़ीट तीन इंच के खली के बीच कुश्ती का मुक़ाबला है.

    राजपाल कहते हैं, “खली के साथ काम करने में मुझे शुरु में लगा कि ऐक्शन तो ठीक है लेकिन कहीं कोई ग़ल्ती हुई और उनका हाथ-वाथ पड़ गया तो मुश्किल हो जाएगी. लेकिन खली बहुत सीधे और सरल इंसान हैं. बहुत ही सावधानी से लेकिन बहुत ही मस्ती भरा ऐक्शन करने का मौका मिला और मुझे बहुत मज़ा आया.”

    शाहजंहापुर के रहने वाले राजपाल यादव कहते थे कि बचपन में वो और उनके दोस्त हर साल मेले इत्यादि में कुश्ती और कबड्डी हमेशा खेला करते थे.

    फ़िल्म के निर्देशक टी ए राजीव कुमार कहते हैं कि ये एक अलग तरह की प्रेम कहानी है जो कुश्ती की पृष्ठभूमि में है.

    राजीव कुमार कहते हैं , “राजपाल यादव ही पोस्टमैन की मुख्य भूमिका के लिए सबसे सही अभिनेता थे. मैं एक ऐसा ऐक्टर चाहता था जो सीधा-सादा हो, जो रोल की बारीक़ियां समझ सके और जिससे दर्शक भी जुड़ सकें.”

    खली के बारे में राजीव कहते हैं, “मैंने खली को फ़िल्म की कहानी ईमेल की थी लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. हमने उनके बिना ही फ़िल्म की लगभग पचास प्रतिशत शूटिंग कर ली और तब तक हमें नहीं पता था कि वो फ़िल्म करेंगे या नहीं. लेकिन ईमेल और फ़ोन पर हुई उनसे बातचीत से मुझे लगता था कि वो ये फ़िल्म करेंगे. हमने पहले शेड्यूल के बाद ही खली को साइन किया.”

    पहलवानी पर आधारित इस प्रेम कहानी के बारे में राजीव कुमार कहते हैं कि पहलवान और पहलवानी अब भी भारत में प्रचलित है लेकिन उसे नज़रअंदाज़ किया जाता है. राजीव कहते हैं, “मैं मानता हूं कि आज की पीढ़ी को ये फ़िल्म अच्छी लगेगी.”

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