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    थोड़ी मेहनत,थोड़ी किस्मत ज़रूरी

    By Neha Nautiyal
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    थोड़ी मेहनत,थोड़ी किस्मत ज़रूरी

    लगातार दो फ़िल्मों-अतिथि तुम कब जाओगे और राइट या रॉंग के रिलीज़ के बाद अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा फ़िलहाल थिएटर की दुनिया में व्यस्त हैं.

    ‘मिस्टर एंड मिसेज़ अय्यर’ में अपने अभिनय के लिए सराहना और अवॉर्ड बटोरने वाली कोंकणा फ़िल्मी व्यस्तताओं के बावजूद अतुल कुमार निर्देशित अंग्रेज़ी नाटक ‘दी ब्लू मग’ के लिए मंच पर लौटी हैं.

    मुंबई, हैदराबाद और पुणे के बाद कोलकाता में इस नाटक के दो शो हुए. इसके बाद चंडीगढ़, दिल्ली और बंगलुरू में इसका मंचन किया जाएगा.

    नाटक के मंचन के सिलसिले में कोलकाता आई कोंकणा ने अपने फ़िल्मी सफर, पसंद-नापसंद और भावी योजनाओं के बारे में पीएम तिवारी से बातचीत की. पेश हैं प्रमुख अंश.

    लंबे समय बाद थिएटर की दुनिया में लौटी हैं. कैसा लग रहा है?

    बहुत अच्छा. मैंने कॉलेज के दिनों में कई नाटकों में अभिनय किया था. लेकिन मुंबई शिफ्ट होने के बाद पेशेवर कलाकार के तौर पर कोई मौका नहीं मिला. अब एक बार फिर मंच पर लौटना अच्छा लग रहा है.

    नाटक और सिनेमा में अभिनय में क्या फर्क है? आपको दोनों में कौन पसंद है?

    मुझे दोनों में अभिनय करना पसंद है. दोनों ही माध्यम चुनौतीपूर्ण हैं. लेकिन नाटक में मेहनत ज़्यादा करनी होती है. इसमें कोई री-टेक नहीं होता.

    आपको कैसी भूमिकाएं पसंद हैं ?

    मैं उन फ़िल्मों को अधिक महत्व देती हूँ जिनमें जीवंत किरदार निभाने का मौका मिलता है. मैं ग्लैमर को प्राथमिकता नहीं देती. मेरे लिए ग्लैमर महत्वपूर्ण नहीं है. लेकिन अगर मुझे कभी ग्लैमरस लड़की का किरदार निभाने का मौका मिला तो ज़रूर करूंगी. किसी एक इमेज में बंध कर रहने की बजाय मैं अलग-अलग तरह की भूमिकाएं करना चाहती हूं.

    अब तक की तमाम फिल्मों में आप लीक से हट कर भूमिकाओं में नज़र आई हैं. फ़िल्मों के चयन में किस बात को प्राथमिकता देती हैं ?

    मैंने अब तक सिर्फ़ पटकथा के आधार पर ही फ़ैसला किया है. पटकथा पसंद होने पर मैं फिल्म हाथ में लेने का फैसला करती हूं. लेकिन कई बार निर्देशक और कहानी भी फिल्मों के चयन में अहम भूमिका निभाते हैं. बेहतर निर्देशकों के साथ काम करने का मज़ा ही कुछ और है.

    आपने हिंदी के अलावा बांग्ला और अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी काम किया है. किस भाषा में आप सबसे सहज महसूस करती हैं ?

    मैं यह तीनों भाषाएं जानती और बोलती हूं. इसलिए इनमें से किसी भी भाषा की फ़िल्म करना उतना ही अच्छा लगता है. अभिनय में भाषा कोई रोड़ा नहीं है. बस पटकथा और किरदार बढ़िया होना चाहिए.

    फिल्मों में कामयाब होने के लिए क्या ज़रूरी है?

    इसके लिए भाग्य और प्रतिभा का मेल ज़रूरी है. जहां तक मेरी बात है, मुझे अपर्णा सेन जैसी जानी-मानी अभिनेत्री और निर्देशक की पुत्री होने का फायदा मिला. लेकिन कामयाबी के लिए यह अकेली शर्त नहीं है. ऐसा होता तो तमाम अभिनेता-अभिनेत्रियों के बच्चे कामयाब होते. लेकिन मैं मानती हूं कि अभी एक अभिनेत्री के तौर पर मुझे खुद को स्थापित करना है. मुझे अपनी मां के साथ काम करना पसंद है.

    आगे क्या योजना है?

    अभी कई फ़िल्में आने वाली हैं. कुछ का काम पूरा हो चुका है. कुछ का बाकी है. इनमें विनय शुक्ला की ‘मिर्च’, ऋतुपर्णो की ‘सनग्लास’ और मेरी मां की ‘इति मृणालिनी’ शामिल है. बांग्ला और हिंदी में बनी ‘इति मृणालिनी’ अगले महीने ही रिलीज़ होने वाली है.

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