किशोर कुमार के जीवन में इतनी त्रासदी रही पर वह इंदिरा गांधी से भी नहीं डरे

By Bbc Hindi

किशोर कुमार की हरफ़नमौला गायकी में कोई भी तत्व वर्जित नहीं है. आत्मा में गहरे उतर जाने वाली धीर गंभीर उदात्तता से लेकर दिल को रुई के फाहे में तब्दील कर देने वाली गुरुत्वहीनता तक इंसानी मूड के जितने रंगों का तसव्वुर किया जा सकता है, किशोर कुमार ने उन सब को साध लिया था.

भारतीय सिनेमा की गायकी को पहली बार औपचारिकता के ताने-बाने से मुक्त कर देने का श्रेय उन्हीं को जाता है. कुंदनलाल सहगल की छाया से निकले मोहम्मद रफ़ी और मुकेश 1950 के दशक में जिस आज़ादी को अपनाने से झिझकते रहे थे, किशोर कुमार ने उसे एक झटके में हासिल कर दिखाया.

ज़ाहिर स्वच्छन्दता के बावजूद उनके गायन के मूल में परंपरा के लिए गहरा सम्मान हमेशा बना रहा. दुनिया भर के लोकप्रिय संगीत से प्रेरणा हासिल करने के बावजूद वे कुंदनलाल सहगल को अपना आदर्श मानते थे जिसकी दो मिसालें अप्रासंगिक नहीं होंगी.

किशोर के बड़े भाई अशोक कुमार अपने ज़माने के बहुत बड़े स्टार थे. उनके घर अक्सर दावतें होतीं. उपयुक्त मौक़ा देख कर अशोक कुमार किशोर को बुलाते और गाने के लिए कहते.

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10-11 बरस के किशोर ने एक गाने के लिए 25 पैसे की दर तय कर रखी थी. अलबत्ता कुंदनलाल सहगल का गाना सुनाने के लिए वे पूरा एक रुपया वसूलते.

एक बार ख़ुद कुंदनलाल सहगल को किशोर कुमार का गाना सुनने का अवसर मिला. सहगल किसी से बोले, "गाता अच्छा है पर इसके हाथ-पैर बहुत चलते हैं."

बात किशोर तक पहुँची. उस दिन के बाद से जब भी उन्होंने सहगल का कोई गीत गाया, उनके चेहरे तक पर एक शिकन नहीं पड़ती थी.

किशोर कुमार ने कुंदनलाल सहगल को अपना अघोषित गुरु माना और 70 के दशक की शुरुआत में जब उनके पास एक बड़ी रक़म के ऐवज में सहगल के गानों को रेकॉर्ड करने का प्रस्ताव आया तो उन्होंने सीधे मना कर दिया, "लोग कहेंगे किशोर अपने को कुंदनलाल से बड़ा समझने लगा है!"

बहुमुखी प्रतिभा का सम्मान

कोई अचरज नहीं कि उनके बंगले 'गौरीकुंज' में सहगल का एक बड़ा पोर्ट्रेट टंगा रहता था जिनकी बहुमुखी प्रतिभा का वे बड़ा सम्मान करते थे.

सहगल के अलावा उनके घर में दो और लोगों के पोर्ट्रेट थे जिनके आगे वे हर सुबह शीश नवाया करते थे - गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और हॉलीवुड के अभिनेता-गायक स्टार डैनी के.

किशोर कुमार को अपनी प्रतिभा के विविध आयामों का पूरा भान था. अपने रोलमॉडल भी उन्होंने उसी हिसाब से छांटे हुए थे.

एक सुपरस्टार बड़े भाई की छत्रछाया में बंबई पहुंचे 16-17 साल के आभास कुमार गांगुली उर्फ़ किशोर कुमार गायक बनना चाहते थे पर अभिनेता बना दिए गए.

बेमन से किए गए इस काम के बावजूद 1950 के दशक में वे एक कुशल अभिनेता के रूप में जम तो गए लेकिन उनका मन केवल गाने में लगता था.

उनके खाते में 'चलती का नाम गाड़ी' और 'दिल्ली का ठग' जैसी शानदार फ़िल्में थीं लेकिन उन्हें लगता था वे अपनी पूरी गायन प्रतिभा को इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे.

एस. डी. बर्मन उनके गाने के कायल थे और उन्हीं की संगत में इसी दशक के दौरान किशोर कुमार ने गायन की अपनी अलग शैली हासिल की.

टेक्स नॉर्टन, जिमी रोजर्स और बॉब विलिस जैसे गायकों की प्रेरणा से उन्होंने अपने गाने में योडलिंग को समावेश किया. उल्लेखनीय है कि भारतीय सिनेमा में योडलिंग की शुरुआत कोई 10 वर्ष पहले तमिल फिल्मों के एक अभिनेता-गायक जोसेफ चंद्रबाबू रोड्रिगेज़ द्वारा की जा चुकी थी.

हम नहीं जानते किशोर को चंद्रबाबू के बारे में पता था या नहीं लेकिन योडलिंग के चलते ही उनकी "इडले उडले इडली उडली" वाली मस्तमौला छवि बनी और जीवन भर उनके साथ जुड़ी रही. उनकी इस ख़ूबी के बगैर 'ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना','मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू' और 'चला जाता हूँ किसी की धुन में' जैसे गीतों की कल्पना भी नहीं हो सकती.

देव आनंद की आवाज़ बने किशोर कुमार

1950 के दशक में मुख्य रूप से एस. डी. बर्मन ने ही उन्हें लगातार गवाया और देव आनंद की आवाज़ के रूप में स्थापित कर दिया.

'टैक्सी ड्राइवर','फंटूश' और 'पेइंग गेस्ट' समेत आधा दर्जन देव आनंद स्टारर फ़िल्मों में गाने के अलावा किशोर दूसरे संगीत निर्देशकों के साथ 'ईना मीना डीका' और 'नखरेवाली' जैसे अद्वितीय गाने भी गा चुके थे. लेकिन इन दौरान वे फ़िल्में प्रोड्यूस और डायरेक्ट करने लगे थे. स्क्रीनप्ले और गाने लिखने में हाथ आजमा चुके थे.

1960 के दशक की शुरुआत से उन्होंने अभिनय छोड़ पूरी तरह गायन से जुड़ने की शुरुआत की जिसका नतीजा यह हुआ कि इस पूरे दशक के दौरान उन्होंने एक से एक गीत गाए और दुनिया को अपनी रेंज की झलक दिखाई.

देव आनंद के लिए तो वे गा ही रहे थे अब राजेश खन्ना के लिए गाने लगे. 1969 की फिल्म 'आराधना' उनके करियर का बेहद महत्वपूर्ण मरहला बन गई. ख़ास तौर पर राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर पर फिल्माया गया और उनका गाया 'रूप तेरा मस्ताना'.

हालांकि 'आराधना' में संगीत निर्देशन का ज़िम्मा एस. डी. बर्मन के पास था लेकिन इस एक गाने को छोड़ कर बाकी धुनें उनके बेटे आर. डी. बर्मन ने बनाई थीं. 'रूप तेरा मस्ताना' की रेकॉर्डिंग चल रही थी जब एस. डी. बर्मन बीमार पड़ गए और उन्हें अस्पताल भर्ती करना पड़ा. कमान आर. डी. ने सम्हाली और अपने पिता की बनाई धुन को अपने जादू में रंग दिया.

जहाँ एस. डी. बर्मन ने गीत को लोकधुन की शैली में कम्पोज़ किया था, फिल्म में गाने की इरोटिक सिचुएशन के हिसाब से आर. डी. ने उसमें अमेरिकी और लैटिन संगीत शैलियों - जैज़ और साम्बा का अनूठा मिश्रण घोल दिया.

किशोर कुमार को आर. डी. बर्मन की नवाचार वाली शैली से संगत बिठाने में ज़रा भी समय नहीं लगा. 'रूप तेरा मस्ताना' इस तथ्य की पुष्टि करता है. गीत की शुरुआती पंक्तियों को किशोर बहुत मुलायम आवाज़ में फुसफुसाते भर हैं.

उनका स्वर धीरे-धीरे खुलना शुरू करता है और क्लाइमेक्स के आते-आते पूरी तरह मर्दाना हो जाता है. कुल साढ़े तीन-पौने चार मिनट के इस एक गीत में किशोर कुमार ने स्वर संतुलन के अनेक रंग दिखाए. इसके लिए उन्हें साल के सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्मफेयर अवार्ड मिला.

सत्तर का दशक हिन्दी सिनेमा के दो सुपरस्टार्स का था - पहले के पांच साल राजेश खन्ना उसके बाद अमिताभ बच्चन. इन दोनों को भी किशोर कुमार की ही आवाज़ का संबल मिला.

परंपरागत हिन्दी फिल्मों में महानायकों का निर्माण ख़ास तरह के मैनरिज़्म और शिल्प की मदद से किया जाता रहा था. जहाँ देव आनंद नई आज़ादी पाए एक मुल्क के शहराती और लोकतांत्रिक रोमांटिक नायक थे तो राजेश खन्ना का मिथक पूरी तरह रोमांस से बुना गया था.

इन दोनों से अलग अमिताभ बच्चन एंग्री यंग मैन थे. उस दौर में देश के सुदूरतम इलाक़ों में इन महानायकों की फ़िल्में बहुत बाद में पहुँच पाती थीं, गाने पहले पहुंच जाते थे. फिल्म की व्यावसायिक सफलता के लिए यह जरूरी था कि नायक के मैनरिज़्म गायक की ध्वनि में भी प्रतिविम्बित हों.

विलक्षण प्रतिभा

इस लिहाज़ से किशोर कुमार की गायन क्षमता विलक्षण थी क्योंकि इन तीनों के लिए उन्होंने अपनी आवाज़ को फिल्मों की विषयवस्तु और अभिनेता के व्यक्तित्व के हिसाब से ढाल पाने में सफलता पाई.

मिसाल के तौर पर आप स्क्रीन पर 'तीन देवियाँ' के देव आनन्द को 'ख़्वाब हो तुम या कोई हकीकत' गाता हुआ देखिये. कल्पना कीजिये गाने को किशोर कुमार की जगह और कोई गा रहा है. आप कर ही नहीं सकेंगे.

चाहें तो राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गए गीतों के साथ भी यह प्रयोग कर के देख सकते हैं. इशारों और संबोधनों से बनी हुई किशोर कुमार की आवाज़ का यह तिलिस्म है कि दशकों तक इस देश की गाड़ियों के डैशबोर्डों पर 'हिट्स ऑफ़ किशोर कुमार' की उपस्थिति अपरिहार्य मानी जाती रही.

'प्यार दीवाना होता है' से लेकर 'आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ' जैसे असंख्य गीत न जाने कितनी पीढ़ियों के सफ़र के साथी रहे.

उनका कोई अल्बम उठा कर देख लीजिये. किशोर कुमार की आवाज़ के पास हर किसी मनःस्थिति के लिए, हर किसी मौक़े के लिए हमेशा कुछ न कुछ होता है - 'ओ मेरे दिल के चैन' से लेकर 'हमें तुमसे प्यार कितना' और 'ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी' से लेकर 'वो शाम कुछ अजीब थी' जैसे सैकड़ों गाने हैं जिन्हें दिन के किसी भी पल सुना जा सकता है. चाहे आप अकेले हों चाहे भीड़ में.

आश्चर्य नहीं कि आज के युवाओं को पिछली पीढ़ी के सभी गायकों की तुलना में अपनी आधुनिकता और बेपरवाही के चलते किशोर कुमार ही सबसे अधिक पसंद आते हैं. यह किशोर कुमार का जादू है कि चैटिंग और टेक्स्टिंग के इस दौर में भी लड़के-लड़कियां 'फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज़ पाती' जैसे गाने सुनते-सुनाते पाए जाते हैं.

किशोर कुमार की सनकों को लेकर बहुत सारे किस्से-किंवदंतियाँ प्रचलन में हैं. कहते हैं एक बार जब किसी प्रोड्यूसर ने वादा करने के बाद भी पूरी फीस के बदले आधी भिजवाई तो वे आधे सिर की हजामत बनवा कर सेट पर पहुँच गए. एक किस्सा यह है कि एक बार भरी गर्मी के दिन ऊनी कपड़े का थ्री-पीस सूट पहने एक अंग्रेज़ीदां क़िस्म का इंटीरियर डेकोरेटर उनसे मिलने पहुंचा.

किशोर कुमार को हैरत हुई कि कोई आदमी पसीने-पसीने होते हुए सूट पहन कर कैसे बैठ सकता है लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा. जब वह आधे घंटे तक नकली अमेरिकी लहजे में अंग्रेज़ी में बकबक करता रहा तो किशोर ने उसे सबक सिखाने की ठानी.

उन्होंने उससे कहा कि वे चाहते हैं उनके ड्राइंग रूम की दीवारों पर पेन्टिंग्स के बदले जिंदा कौवे टाँगे जाएं और पंखों की जगह बन्दर लटक रहे हों जो समय-समय पर वायु-विसर्जन करते रहें. बेचारा इंटीरियर डेकोरेटर किसी तरह वहां से भागा. "आप छत्तीस डिग्री में वूलन सूट पहन सकते हैं तो पंखे के जगह बन्दर भी टांग सकते हैं", क़िस्सा सुनाने के बाद किशोर कुमार स्पष्टीकरण ज़रूर देते थे.

गुदगुदाने वाले किशोर कुमार

इसी तरह का व्यवहार वे कई बार साक्षात्कार लेने वालों के साथ भी कर दिया करते थे. कई बार किसी बहुत गंभीर विषय की तरफ बढ़ते-बढ़ते वे मसखरी पर उतर आते थे.

दरअसल अपने गीतों की खिलखिलाहट से सबको गुदगुदाने वाला यह इंसान अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत सारे दुखों से गुज़र चुका था. संभवतः उन दुखों की मुश्किल स्मृतियों से बचने का यही इकलौता तरीका उन्हें आता होगा.

किशोर कुमार के कुल चार शादियाँ कीं जिनमें से तीन का त्रासद अंत हुआ. भारतीय सिने इतिहास की सुन्दरतम स्त्री मानी जाने वाली मधुबाला उनकी दूसरी पत्नी थीं जिनके साथ उन्होंने नौ मुश्किल साल गुज़ारे. शादी के समय ही किशोर जानते थे कि मधुबाला को दिल की गंभीर बीमारी है.

शादी के बाद अधिकतर समय मधुबाला शैय्याग्रस्त रहीं. 1969 में हुई उनकी दर्दनाक मृत्यु से पहले किशोर ने उनकी बहुत सेवा की. हालांकि उसके बाद उन्होंने दो शादियाँ और कीं लेकिन वे मधुबाला जैसे खूबसूरत इंसान की ऐसी मौत के दर्द को कभी विस्मृत नहीं कर सके.

किशोर कुमार का जीनियस अद्वितीय था जिसके भीतर हर अच्छे-बुरे अनुभव को रचनात्मकता में ढाल सकने की ताब थी. यह तभी हो सका कि कहीं उनके सुरों में एक साथ किसी मतवाले प्रेमी की उच्छृंखलता दिखाई देती है तो कहीं किसी साधु की सी थिर निस्संगता. किशोर कुमार शरारत के भी खलीफ़ा थे.

वे सलिल चौधरी जैसे गंभीर संगीत निर्देशक और शंकर शैलेन्द्र जैसे बड़े गीतकार के काम में मज़ाक के पुट का समावेश कर सकने का माद्दा रखते थे. 1962 की फिल्म 'हाफ़ टिकट' का वह गीत 'आके सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया' इसका उदाहरण है.

उनका हृदय अपार मोहब्बत से भरा रहता था और वही मोहब्बत उनके रूमानी गानों में झरने की तरह बहती दिखाई देती है. संगीत की उनकी समझ की गहराई की थाह लेनी हो तो कभी उनका गाया रवीन्द्र संगीत सुनिए. सत्यजित रे की 'चारुलता' में उनका गाया टैगोर का लिखा 'ओगो बिदेशिनी' सुनिए. खोजने चलेंगे तो उनके हजार नए रंग मिलेंगे.

भीड़-भड़क्के और दावत-पार्टी से दूर रहने वाले एकांतप्रेमी किशोर पेड़ों से मोहब्बत करते थे और अल्फ्रेड हिचकॉक की हॉरर फिल्मों के दीवाने थे. अपने बगीचे में लगे पेड़ों को उन्होंने बुद्धूराम, जनार्दन, गंगाधर, रघुनंदन और जगन्नाथ जैसे नाम दे रखे थे और वे उन्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त गिनते थे.

बाग़ी किशोर कुमार

1975 में जब इमरजेंसी लगी तो इंदिरा गांधी ने अपनी नीतियों को लेकर बीस-सूत्रीय कार्यक्रम बनाया और उसके प्रचार के लिए अपने विश्वासपात्र विद्याचरण शुक्ल को सूचना मंत्री बनाया.

विद्याचरण फिल्मों की ताक़त को पहचानते थे और बंबई में उनके बहुत से फ़िल्मवालों के साथ नज़दीकी सम्बन्ध थे. वह तानाशाही का दौर था और जैसा कि ऐसे समय में होता है, सत्ता के किसी भी विचार से असहमत होना कलाकार के करियर के लिए घातक होता है.

पहले किशोर कुमार को बंबई में यूथ कांग्रेस की एक रैली में गाने को कहा गया. उन्होंने साफ़ मना कर दिया.

विद्याचरण शुक्ल चाहते थे कि इन्दिरा गांधी और उनके बीस-सूत्रीय कार्यक्रम की प्रशंसा में गीत लिखे जाएँ जिन्हें उस समय के बड़े गायकों से गवाया जाय. शुक्ल के आदेश पर सूचना मंत्रालय के कुछ अफसर इस सिलसिले में किशोर कुमार से मिलने बम्बई गए.

किशोर कुमार को बताया गया कि मंत्रालय के आदेश के अनुसार उन्हें फलां-फलां गीत गाने होंगे. किशोर ने गालियाँ देते हुए इन अफसरों को अपने घर से भगा दिया.

अपनी सत्ता का अपमान हुआ देख सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों ने देश के सबसे महबूब गायक को सबक सिखाने का फ़ैसला किया.

लिखित आदेश जारी किये गए कि इस 'अपराध' की सज़ा के तौर पर आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के गाये सभी गीतों के प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है. जिन फ़िल्मों में किशोर ने अभिनय किया था, उन्हें भी निशाने पर ले लिया गया.

इसके अलावा यह भी आदेश दिया गया कि किशोर कुमार के गीतों के ग्रामोफोन रेकॉर्ड्स की बिक्री पर रोक लगा दी जाय.

अफसरशाही समझती थी कि उसके आदेश से सारी फ़िल्म इंडस्ट्री में डर पैदा होगा और विरोध की संभावना समाप्त हो जाएगी. हालांकि ज़्यादातर कलाकारों ने डर के मारे चुपचाप सब कुछ मान लिया, सरकार के विरोध में बोलने वालों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई.

देव आनंद, विजय आनंद, राजकुमार, वी शांताराम, उत्तम कुमार और सत्यजित रे जैसे लोगों ने झुकने से मना कर दिया. सत्यजित रे ने तो इंदिरा गांधी के उस प्रस्ताव तक को ठुकरा दिया जिसके तहत उन्हें जवाहरलाल नेहरू पर बनने वाली एक फिल्म का निर्देशन करना था.

वह ऐसा दौर था जब कलाकारों के पास अपने काम को जनता के पास ले जा सकने के सीमित रास्ते थे. ऐसे में सरकार के सामने न झुकने वाले जिन मुठ्ठी भर लोगों ने अपनी रीढ़ की हड्डी को साबुत बचाए रखा, किशोर कुमार उनकी पहली पांत में थे.

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