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    कवि प्रदीप की 10वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि

    By Super
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    हिंदी सिनेमा के दिग्गजों का अगर नाम लिया जाए तो कवि प्रदीप का नाम भी इस सूची में ज़रूर आएगा.ऐ मेरे वतन के लोगों जैसे वीर रस के उनके गीतों ने जन-जन में जोश भरने का काम किया है. उनकी 10वीं पुण्यतिथि पर एक श्रद्धांजलि.

    ये वो लफ़ज़ हैं जिन्हें सुनकर अकसर आँखें नम हो जाती हैं. भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी इस गीत को सुनकर अपने आँसू रोक नहीं पाए थे.कुछ ऐसी ही थी कवि प्रदीप की क़लम की ताक़त. 11 दिसंबर 2008 को उनकी 10वीं पुण्यतिथि है.

    1915 में मध्यप्रदेश में जन्मे कवि प्रदीप का असल नाम था रामचंद्र द्विवेदी. लड़कपन में ही उन्हें लेखन और कविता का चस्का लगा. कवि सम्मेलनों में वे ख़ूब दाद बटोरा करते थे.

    प्रदीप जी ने बहुत ही अच्छे राष्ट्रीय गीत लिखे हैं. यूँ समझिए कि उन्होंने सिनेमा को ज़रिया बनाकर आम लोगों के लिए लिखा. बहुत सुंदर गीत थे वो निदा फ़ाज़ली

    देखते ही देखते वे रामंचद्र द्विवेदी से प्रदीप हो गए. वहाँ से प्रदीप मायानगरी मुंबई चले आए जहाँ उनकी किस्मत ख़ुली 1943 में आई फ़िल्म किस्मत के इस गाने से-'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो-दूर हटो ऐ दुनियावालों हिंदोस्तान हमारा है".

    अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई उन दिनों ज़ोरों पर थीं और ये गाना वतन के मतवालों में मानो नई ऊर्जा भर जाता था.

    कहते हैं कि अग्रेज़ हुकूमत इस एक गीत के असर से इस कदर परेशान हो गई थी कि प्रदीप जी के ख़िलाफ़ वारंट निकाल दिया गया. लोगों की फ़रमाइश पर इस गीत के लिए सिनेमाघरों में फ़िल्म की रील रिवांइड की जाती और गाना फिर सुनाया जाता.

    प्राधीन भारत के जांबाज़ो को प्रदीप जी ने अपने गीत रूपी हथियार दिए. उनकी बेटी मितुल प्रदीप बताती हैं कि देश प्रेम के गीत लिखने का जज़्बा प्रदीप जी में उन्हीं दिनों से था जब वे बतौर छात्र इलाहाबाद में पढ़ते थे.

    मितुल बताती हैं, "पिताजी इलाहाबाद में पढ़ते थे, आनंद भवन के पीछे रहते थे. इसने उन्हें काफ़ी प्रभावित किया. नेहरू जी को वो देखते थे. ये सब उनके ज़हन में इतना अंदर तक बैठ गया था कि जब लिखना शुरु किया तो वीर रस की कविताएँ ख़ूब लिखते थे. अब भी जब मुंबई में हमले हुए तो लोगों के घरों से ज़ोर-ज़ोर से प्रदीप जी के ही गीत बज रहे थे."

    लेखनी का कमाल

    अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ. आज़ादी बाद 1954 में उन्होंने फ़िल्म जागृति में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को बख़ूबी फ़िल्म के गानों में उतारा.

    इसे लेखनी का ही कमाल कहेंगे कि जब पाकिस्तान में फ़िल्म जागृति की रीमेक बेदारी बनाई गई तो जो बस देश की जगह मुल्क़ कर दिया गया और पाकिस्तानी गीत बन गया....हम लाएँ हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस मुल्क़ को रखना मेरे बच्चों संभाल के..

    पिताजी इलाहाबाद में पढ़ते थे, आनंद भवन के पीछे रहते थे. . नेहरू जी को वो देखते थे. ये सब उनके ज़हन में इतना अंदर तक बैठ गया था कि जब लिखना शुरु किया तो वीर रस की कविताएँ ख़ूब लिखते थे.

    जीवन में पिताजी की बेहद छोटी-छोटी और सुंदर माँगे होती थी- दाल चावल स्वादिष्ट बना हो, सुबह चाय के साथ अख़बार समय पर आ जाए. उनका दिन सुबह छह बजे बीबीसी हिंदी सेवा के समाचारों से होता था. अब भी जब मुंबई में हमले हुए तो लोगों के घरों से ज़ोर-ज़ोर से प्रदीप जी के ही गीत बज रहे थे. मितुल प्रदीप, बेटी

    कुछ इसी तरह 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल" की जगह पाकिस्तानी गाना बन गया.....

    यूँ दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान, ऐ क़ायदे आज़म तेरा एहसान है एहसान.

    ऐसे ही था बेदारी का ये पाकिस्तानी गाना....आओ बच्चे सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की, जिसकी खातिर हमने दी क़ुर्बानी लाखों जान की.

    ये गाना असल में था आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की...

    प्रदीप जी गानों के कॉपीराइट और रॉयलिटी को लेकर उनकी बेटी मितुल को अदालत में मुक़दमा लड़ना पड़ा है. वे बताती हैं, "ए मेरे वतन के लोगों...पिताजी ने लिख कर दिया था कि इस गाने से आने वाली रॉयल्टीशहीद सैनिकों की विधवाओं को मिलनी चाहिए. लेकिन रॉयल्टी विधवाओं तक नहीं जा रही थी. इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें कोर्ट जाना पड़ा था."

    सादा व्यक्तित्व

    निदा फ़ाज़ली उन्हें बतौर कवि से अधिक एक गीतकार के रूप में ज़्यादा मक़बूल मानते हैं. वे कहते हैं, "प्रदीप जी ने बहुत ही अच्छे राष्ट्रीय गीत लिखे हैं. यूँ समझिए कि उन्होंने सिनेमा को ज़रिया बनाकर आम लोगों के लिए लिखा. बहुत संदुर गीत थे वो."

    वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश चौकसे कवि प्रदीप के सादे व्यक्तित्व के कायल हैं.

    उन्हें याद करते हुए वे कहते हैं, "उन्होंने बहुत ज़्यादा साहित्य का अध्ययन नहीं किया था, वो जन्मजात कवि थे. उन्हें मैं देशी ठाठ का स्थानीय कवि कहूंगा. यही उनकी असली परिचय है. सादगी भरा जीवन जीते थे.

    किसी राजनीतिक विचारधारा को नहीं मानते थे. जैसे साहिर लुधयानवी और शैलेंद्र के गीत लें तो वे कम्युनिस्ट विचारधारा के थे. लेकिन प्रदीप जी के किसी राजनीतिक विचारधारा को स्वीकार नहीं किया. बौद्धिकता का जामा उनकी लेखनी पर नहीं था, जो सोचते थे वही लिखते थे, सरल थे, यही उनकी ख़ासियत थी."

    बेटी मितुल कहती हैं कि अच्छे कवि होने के साथ-साथ प्रदीप जी बेहतरीन इंसान और पिता थे.

    वो जन्मजात कवि थे. उन्हें मैं देशी ठाठ का स्थानीय कवि कहूंगा. यही उनकी असली परिचय है. सादगी भरा जीवन जीते थे. किसी राजनीतिक विचारधारा को नहीं मानते थे. बौद्धिकता का जामा उनकी लेखनी पर नहीं था जयप्रकाश चौकसे

    यादों के झरोखों में झाँकते हुए वे बताती हैं, "जीवन में पिताजी की बेहद छोटी-छोटी और सुंदर माँगे होती थी- दाल चावल स्वादिष्ट बना हो, सुबह चाय के साथ अख़बार समय पर आ जाए. और हाँ उनका दिन सुबह छह बजे बीबीसी हिंदी सेवा के समाचारों से होता था. बीबीसी सुनते ही हम समझ जाते थे कि दिन हो गया है."

    यूँ तो कवि प्रदीप ने प्रेम के हर रूप और हर रस को शब्दों में उतारा लेकिन वीर रस और देश भक्ति के उनके गीतों की बात ही कुछ अनोखी थी.

    फ़िल्मों में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 1998 में दादा साहब फ़ाल्के सम्मान भी दिया गया. उनका हर फ़िल्मी-ग़ैर फ़िल्मी गीत अर्थपूर्ण होता था और जीवन को कोई न कोई दर्शन समझा जाता था. 10 साल पहले 11 दिसंबर 1998 को सबको अकेला छोड़ कवि प्रदीप अनंत यात्रा पर निकल गए थे.

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