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    25 साल से स्ट्रगलर ही हूं

    By सुशील झा,
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    फ़िल्मों में एक्टिंग का काम सबसे मुश्किल से मिलता है. बंजारा नामक यह अभिनेता पिछले 25 सालों से संघर्षरत है एक बेहतरीन भूमिका के लिए.

    बंजारा शायद उनका असली नाम नहीं लेकिन अब इंडस्ट्री में सब उन्हें इसी नाम से जानते हैं.

    बंजारा को अब भी इंतज़ार है उस रोल का जो उन्हें पहचान दिला सके.

    ये लोग इंडस्ट्री में जूनियर आर्टिस्ट कहे जाते हैं. ये आते हैं बड़ी भूमिकाओं की तलाश में लेकिन जब हीरो या एक्टर नहीं बन पाते जो छोटी भूमिकाओं से गुज़ारा करते हैं और इस उम्मीद में इंड्स्ट्री में बने रहते हैं कि कभी न कभी उनका नबंर भी आएगा.

    वो कहते हैं, ' मैं जब यहां आया था तो मेरी नई नई शादी हुई थी. अब मैं नाना-दादा बन गया हूं. तब भी संघर्ष कर रहा था अब भी संघर्ष कर रहा हूं. वो रोल नहीं मिला जो करना चाहता था. '

    ऐसा नहीं है कि बंजारा को काम नहीं मिला. उन्हें छोटा मोटा काम मिलता रहा जिससे उनका गुजारा चलता रहा लेकिन चरित्र अभिनेता के रुप में पहचान अब तक नहीं मिली जो वो चाहते हैं.

    मैंने महेश भट्ट, पहलाज निहलानी और पार्थो घोष की फ़िल्मों में छोटे मोटे रोल किए हैं. कभी भीड़ में खड़ा रहा तो कभी गुंडा बना. लेकिन आज भी मुझे उस भूमिका का इंतज़ार ही है
    वो बताते हैं, ' मैंने महेश भट्ट, पहलाज निहलानी और पार्थो घोष की फ़िल्मों में छोटे मोटे रोल किए हैं. कभी भीड़ में खड़ा रहा तो कभी गुंडा बना. लेकिन आज भी मुझे उस भूमिका का इंतज़ार ही है.'

    लेकिन क्या वो रोल मिलेगा. बंजारा बहुत उत्साह से कहते हैं, ' मुझे तो लगता है कि अभी जिस फ़िल्म की शूटिंग हो रही है उसी में मेरा यह रोल है जो मुझे पहचान दिलाएगा. हालांकि इसमें सिर्फ़ एक ही डॉयलॉग है मेरा. '

    लेकिन काम क्यों नहीं मिला, वो कहते हैं, ' फ़िल्म लाईन में पहचान होनी चाहिए. आपका कोई माई बाप नहीं है तो काम नहीं मिलता है. मेरा यहां कोई नहीं था. मैं राजस्थान के गांव से आया था और इंडस्ट्री से ही जुड़ा रहना चाहता था. '

    बंजारा गीत लिखते हैं, छोटे मोटे रोल करते हैं और संघर्षरत हैं उस ख़ास रोल के लिए जो उन्हें प्रसिद्धियों की बुलंदियों तक पहुंचाएगा.

    मुंबई में हर रोज़ बंजारा जैसे सैकड़ों लोग आते हैं और अपनी किस्मत आजमाते हैं.

    फ़िल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा कहती हैं, ' आपको इंडस्ट्री में हर तरह का काम मिल सकता है. आप डायरेक्टर भी बन सकते हैं लेकिन एक्टिंग के लिए बहुत मारामारी है. हज़ारों लोग रहते हैं. किस्मत अच्छी हो तभी कुछ हो पाता है.'

    ऐसे ही संघर्ष के दौर से गुज़र कर हीरो बनने वाले मनोज वाजपेयी भी मानते हैं कि इंडस्ट्री में बिना माई बाप के खुद को हीरो या एक्टर के तौर पर स्थापित करना अत्यंत मुश्किल है.

    तो फ़िर एक्टर के तौर पर सफलता किसको मिलती है, इस पर हर संघर्षरत एक्टर की अलग अलग थ्योरी होती है.

    हर शुक्रवार की सपने टूटते हैं और नए स्टार पैदा होते हैं और इंडस्ट्री उन सभी को भूल जाता है जो फ्लॉप होते हैं और उन्हें सलाम करता है जो हिट होता है.

    इंडस्ट्री की यही कहानी है जहां हीरो बनने के लिए लंबी कतारें हैं और उम्मीद की एक किरण है जो शायद फ़िल्म इंडस्ट्री में और मुंबई में जीने के लिए ज़रुरी है क्योंकि उम्मीद कायम रखने वाला और हिम्मत नहीं हारने वाला ही यहां आगे बढ़ता है.

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