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    Irrfan and I: विशाल भारद्वाज ने इरफान खान की तेरहवीं पर दिया आखिरी पलों का ब्योरा,पढ़कर दिल फट जाएगा

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    विशाल भारद्वाज ने इरफान खान के जाने के तेरह दिन बाद उनकी तेरहवीं पर अपनी यादों के पिटारे को अपने दुख से और इरफान की अंतिम विदाई से जोड़ते हुए एक स्क्रीनप्ले लिख दिया है। कहानी का नाम है इरफान और मैं।

    ये स्क्रीनप्ले, टाइम्स ऑफ इंडिया के पास आधिकारिक रूप से है जिसे आप यहां पर PDF में डाउनलोड कर रहे हैं। अपने हिंदी पाठकों के लिए हम इस स्क्रीनप्ले के कुछ अंश आपके लिए यहां पर लेकर आए हैं।

    विशाल भारद्वाज ने जिस तरह इरफान खान की यादों को उनके अंतिम विदाई के दिन के साथ जोड़ा है, उसे पढ़कर कोई भी अपने आंसू रोक ही नहीं पाएगा। यहां पढ़िए, इरफान और मैं के कुछ हिस्से -

    विशाल भारद्वाज का घर

    विशाल भारद्वाज का घर

    मुंबई में लॉकडाउन चल रहा है। मैं घर से ही पिछले एक महीने से काम कर रहा हूं। मेरा फोन बजता है। फोन पर नाम दिखता है - M.P. मैं दहशत में आ जाता हूं। M.P. इरफान की एजेंसी में मेरा एजेंट है। मैं फोन बजने देता हूं। और थोड़ी देर बाद डरते हुए फोन उठाता हूं। M.P. कहता है अब इरफान ठीक होने लगा है। डॉक्टर्स को उम्मीद है कि वो फाईटर है, ठीक होकर ही बाहर आएगा। मैं सुकून की सांस लेता हूं।

     सच है या अफवाह

    सच है या अफवाह

    कुछ देर बाद मैं रेखा से किसी बात पर झगड़ रहा होता हूं। तब तक फोन पर एक मेसेज आता है। एक दोस्त का। मेसेज में लिखा था - इरफान खान के बारे में सुनकर दुख हुआ। मैं ट्विटर चेक करता हूं, ये सोच कर कि अफवाह ही होगी। कोई खबर नहीं दिखती। मैं निश्चिंत हो जाता हूं। मैं रेखा की ओर देखता हूं, उसकी आखों में आंसू हैं।

    यूं मिली दिल तोड़ने वाली खबर

    यूं मिली दिल तोड़ने वाली खबर

    फोन फिर बजता है। एक बार फिर M.P. का। इस बार मैं बहुत जल्दबाज़ी में फोन उठाता हूं। उधर से केवल रोने की आवाज़ आती है जैसे मेरा दिल फट गया हो। मास्क पहनकर, हाथों में ग्लव्स पहनकर मैं मुंबई की खाली सड़कों से होता हुआ कब्रिस्तान के लिए निकलता हूं। आंखों में आंसू है, शायद इसलिए सड़क पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा है।

    पुरानी यादों का कारवां

    पुरानी यादों का कारवां

    1994 के मुंबई के बारे में सोच रहा हूं। इरफान से पहली बार क्रिकेट ग्राउंड पर मुलाकात हुई थी। मैंने पूछा था - संडे को मैच खेलोगे? वो मुस्कुराते हुए कहता है - मुझे मैच खेलने में मज़ा नहीं आता विशाल साहब। मैं बस प्रैक्टिस करने का आनंद लेता हूं। उसके जवाब से मैं सन्न रह गया था। और उसे देखकर बेवकूफों जैसा मुस्कुरा दिया।

    हैदर की शूटिंग

    हैदर की शूटिंग

    फरवरी 2014 की बात है हम श्रीनगर के एक मोहल्ले में शूट कर रहे हैं। सिक्योरिटी फोर्स ने इजाज़त नहीं दी थी। कुछ समय बाद, लोगों को संभालना मुश्किल हो गया था। सिक्योरिटी वाले मुझ पर नाराज़ हुए और इरफान को लेकर चले गए। इरफान के फैन भी छंटने लगे। इरफान एक कार से वापस जाने लगा। एक लड़के ने उसकी गाड़ी की तरफ पत्थर मारा और खिड़की का कांच बुरी तरह टूट गया। सिक्योरिटी वाला गोली चलाने ही वाला था कि इरफान ने मना कर दिया।

    शानदार इंसान इरफान

    शानदार इंसान इरफान

    अगले दिन इरफान से दूसरी लोकेशन पर मिला। मुझे लगा कि वो नाराज़ होगा पर वो मुस्कुराते हुए मेरी तरफ आया और कहा - विशाल साहब क्या थ्रो मारा साे ने। एकदम जॉन्टी रोड्स याद आ गया। हर इंसान उसकी बात पर हंस पड़ा।

    29 अप्रैल 2020

    29 अप्रैल 2020

    ये बातें सोचते सोचते मेरी कार कब्रिस्तान में पहुंच चुकी है। मैं नीचे उतरता हूं। हर तरफ पुलिस की बैरीकेडिंग है। मीडिया भी दिख रही है। M.P. मुझे रास्ता दिखाते हुए अंदर तक लेकर जाता है। लोगों के बीच से गुज़रते हुए मैं एक कमरे के बाहर पहुंचता हूं जिस पर लिखा है - यहां बॉडी के नहाने का इंतज़ान है। इंतज़ाम गलत तरीके से लिखा है।

    वो सामने पड़ा है

    वो सामने पड़ा है

    मैं अंदर घुसता हूं। सामने एक प्लेटफॉर्म पर वो पड़ा है। सफेद कपड़े में लिपटा हुआ। सर मेरी तरफ मुड़ा हुआ। मैं उसकी तरफ बढ़ता हूं। उसे देखे जा रहा हूं। लग रहा है जैसे समय रूक गया है। एहसास हुआ कि उसकी आंखें कितनी भारी लग रही हैं। कानों में उसकी गाई एक लोरी की आवाज़ गूंज रही है।

    इरफान का पहला मेसेज

    इरफान का पहला मेसेज

    आ जा री निंदो तू आ जा…इफ्फू की आंखों में। आती हूं भाई मैं आती हूं, इफ्फू की आंखों में। इरफान ने ये वॉट्सएप पर भेजा था। जब वो लंदन के अस्पताल में कैंसर का इलाज करवा रहा था। साथ में एक वॉइस नोट भी था - विशाल साहब, अब आपको एक्टिंग के साथ मेरी गायकी भी झेलनी पड़ेगी। लंदन जाने के बाद पहली बार उसकी आवाज़ सुनी थी। मैंने इरफान को मेसेज भेजा, लंदन आ रहा हूं। उसने लिखा - मेरे लिए अलग से समय रख लीजिएगा।

    इरफान से मुलाकात

    इरफान से मुलाकात

    मैं लंदन के एक पार्क में जा रहा हूं। बड़े बड़े हरे पेड़ हैं। दूर से इरफान हाथ हिलाते दिखता है। हम एक बड़े से पेड़ के नीचे बैठकर कॉफी पीते हैं जो वो लेकर आया है। हमारे बीच एक अजीब सी खामोशी है जिसे इरफान तोड़ता है।

    यूं बांटा था दर्द

    यूं बांटा था दर्द

    इरफान - विशाल साहब आजकल बहुत खुला हुआ, आज़ाद महसूस करता हूं। ऐसा लगता है जैसे बदन के ऊपर से सैकड़ों बदन उतर गए हों। रूह पर कितने बोझ लेकर घूमते हैं हम लोग। एक बार ज़िदगी की मियाद तय हो जाए तो इक धुंध सी छट जाती है आंखों से। जैसे बारिश के बाद धूप में सब चमकने लगता है ना, सब वैसा, नहाया धोया सा हो जाता है।

    एक अजीब सी घटना

    एक अजीब सी घटना

    तभी वहां हम दोनों के बीच एक कबूतर आकर गिर जाता है। हम दोनों चौंक जाते हैं। वो आगे बढ़कर देखता है। कबूतर की गर्दन टूटी है और सांस नहीं ले पा रहा है। इरफान कहता है - ये मर रहा है। वो पास के नल के पास दौड़कर जाता है, अपने कप से कॉफी गिराता है, उसमें पानी भरता है और कबूतर के पास वापस लेकर आता है। कबूतर को कुछ बूंद पानी की पिलाता है। हम दोनों फिर शांत बैठ जाते हैं। पास में एक कबूतर मरा पड़ा है।

    फिल्म और हम

    फिल्म और हम

    इरफान इस शांति को तोड़ता है। ज़िंदगी में फिल्मों से ज़्यादा ड्रामा होता है। अब अगर ये सीन, फिल्म में डाल दिया जाए तो कितना ज़्यादा ड्रामा बन जाएगा। मैं उदास होकर मुस्कुरा देता हूं। इरफान कहता है - अब आप इसे और ड्रामा मत बनाइए और मेरी एक तस्वीर खींचिए कबूतर के साथ। एक उड़ गया और एक का उड़ना बाकी है।

    आज का दिन

    आज का दिन

    मैं ज़ोर से चीखना चाहता हूं, रोना चाहता हूं लेकिन जैसे गला चोक हो गया है। ज़हन में बस इरफान की यादें हैं। आंसू से मेरा पूरा मास्क गीला हो चुका है। और आंखों के आगे बस उसकी फिल्मों के शानदार सीन याद आ रहे हैं।

    वाह विशाल साहब

    वाह विशाल साहब

    हैदर की स्क्रीनिंग के दौरान मैं एक कोने में सिगरेट पी रहा था। इरफान आया और बोला विशाल साहब मैं तो चौंक गया। ऐसी एंट्री देनी थी फिल्म में तो फिर पैसे क्यों दिए? मैंने हंसकर उसे गले लगा दिया। उनसे धीमे से थैंक यू कहा, मैंने और ज़ोर से गले लगा लिया।

    यूं हुआ था झगड़ा

    यूं हुआ था झगड़ा

    2007 की बात है। मैं सीढ़ियों पर बैठा हूं और एक फोन लगा दिया। जैसे ही फोन उठा, मैंने काट दिया। उधर से वापस फोन आया। मैंने लंबी सांस ली और फोन उठाया। इरफान ने पूछा - गलती से लगा था या जानबूझकर काट दिया? मैंने हंसते हुए कहा - दोनों। इरफान ने पूछा कब तक गुस्सा रहेंगे इश्किया के लिए? फिल्म भी हिट हो गई और डायरेक्टर भी। अब तो मान जाइए।

    बस झट से मान गए

    बस झट से मान गए

    मैंने इरफान को कहा, आप मना लीजिए। उसने पूछा कैसे? मैंने बताया, एक फिल्म बना रहा हूं। इरफान ने फिर पूछा - सात खून माफ? मैंने कहा - जी, उसमें एक पति का रोल है, सबने मना कर दिया है करने से। उसने मुझे बीच में ही काटते हुए कहा - मुझे छोड़कर। मैंने कहा आप बहुत अजीब हैं इरफान साहब!

    मस्तमौला इंसान इरफान

    मस्तमौला इंसान इरफान

    अक्टूबर 2013 की बात है। हम दोनों पैरिस एयरपोर्ट पर अगली फ्लाईट का इंतज़ार कर रहे थे। इरफान ने पूछा - सिगरेट पियेंगे? मैंने कहा यहां नहीं पी सकते, मना है। उसने पूछा है लाईटर है आपके पास? मैंने कहा, नहीं। उसने कहा मेरे पास है। उसने बेल्ट के बकल के नीचे से लाईटर निकाला। मैं हैरान रह गया।

    शैतानी में भी माहिर

    शैतानी में भी माहिर

    इरफान ने कहा - यहां तो लाईटर के साथ सफर करना मना है। अपने यहां फिकवा देते हैं साले सिक्योरिटी वाले। इसलिए मैं बेल्ट में छिपाकर चलता हूं। मैंने पूछा मेटल डिटेक्टर में पास कैसे होते हैं? उसने कहा, बकल दिखा देता हूं बेल्ट का। सब मान जाते हैं। पर कोई अगर बकल छूकर चेक करने लगता है तो मैं गुदगुदे लगने की इतनी एक्टिंग करता हूं कि वो भी हंसने लगता है।

    आखिरी फिल्म पर तैयारी

    आखिरी फिल्म पर तैयारी

    जनवरी 2017 की बात है। इरफान मेरे ऑफिस में शीशे के सामने बैठा है। चेहरा चमक रहा है। हमारा मेकअप डिज़ाइनर, हमारी अगली फिल्म का लुक तैयार कर रहा है जिसमें वो और दीपिका काम करेंगे। इरफान फिल्म में गैंगस्टर बना है। इरफान मुझसे कहता है - मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूं, जब तक आप सात खून माफ की मेरी कहानी पूरी नहीं रिलीज़ करते हैं यूट्यूब पर, मैं आपकी अगली फिल्म की शूटिंग नहीं करूंगा। मैंने इरफान से कहा कि एडिट में वो फुटेज गायब हो गई है। मिल नहीं रही है। इरफान ने कहा - खोल लीजिए वरना फिर मुझे खोजते रह जाइएगा।

    अंतिम विदाई की तैयारी

    अंतिम विदाई की तैयारी

    इरफान को अब ताबूत में रखा जा रहा है। इसके बाद एक रंगीन चादर ओढ़ा दी गई है। ताबूत उठाया जा रहा है और उसे खुली जगह पर ले जाएंगे जहां नमाज़ पढ़ी जाएगी। मैं कंधा देता हूं। 40 कदम पूरे करने है। ताबूत को आगे बढ़ाया गया मैं चाहता हूं कि इसे पीछे ना ले जाया जाए। लेकिन मैं अब कुछ नहीं कर सकता।

    सात खून माफ का वो सीन

    सात खून माफ का वो सीन

    2006 की बात है। सात खून माफ की शूटिंग खत्म होने को आ रही है। नाइट शिफ्ट है। सब जैसे बीमार हैं। इरफान के किरदार वसीउल्लाह को दफनाया जाने का सीन है। सब काम हो चुका है। आर्ट डिपार्टमेंट ने कब्र खोद दी है। इरफान पास में ही आंख बंद कर के बैठा है। वो बर्फ से ढंकी कब्र में घुसता है और लेट जाता है। सब यही सोच रहे हैं कि ये अंदर कितना ज़्यादा ठंडा होगा।

    उफ्फ इरफान

    उफ्फ इरफान

    मैं बोलता हूं एक्शन। असिस्टेंट कब्र पर और बर्फ डालने लगता है। कुछ बर्फ अब उसके चेहरे पर आकर गिरने लगी है लेकिन इरफान ज़रा भी नहीं हिला। वो वहां वैसे ही पड़ा है जैसे मानो मर चुका है। बाद में हमें ये सीन फिल्म से काटना पड़ा था।

    काश बस काश!

    काश बस काश!

    इरफान को कब्र में डाल दिया गया है। वहां खड़ा आदमी कहता है, किसी को आखिरी दीदार करना हो तो आगे आ जाए। मैं आगे जाता हूं और कोने में खड़ा हो जाता हूं। कानों में इरफान की आवाज़ गूंज रहा हूं। काश उस सीन की तरह, ये सब कुछ मैं अपनी ज़िंदगी से एडिट कर पाता!

    English summary
    Vishal Bhradwaj penned down emotional anecdotes of Irrfan Khan’s last moments in the form of screenplay. No one can stop crying after reading Irrfan and I.
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