अपनेआप को मिस करना चाहता हूं : अनुपम खेर

अनुपम ने कहा, "लोग मुझसे पूछते हैं कि इन दिनों मैं बड़े पर्दे पर क्यों नहीं दिखता। मुझे लगता है कि जीवन में कभी ऐसा समय आता है जब आप काम के पीछे नहीं भागना चाहते। मैं 400 फिल्मों में काम करने के बाद खुद को संतुष्ट महसूस करता हूं। कभी-कभी यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि आप अपनी उपस्थिति को अपनी अनुपस्थिति से महसूस कराएं, मैं इन दिनों यही कर रहा हूं।"
पद्मश्री से सम्मानित अनुपम ने 'सारांश' में बेहद प्रभावशाली भूमिका निभाकर बॉलीवुड में अपनी शुरुआत की थी। उन्होंने अपने करीब तीन दशक लम्बे करियर में खलनायक से लेकर हास्य कलाकार तक के सभी किरदार निभाए हैं।
'कर्मा' (1986) और 'हम' में उनकी नकारात्मक भूमिकाएं जहां दर्शकों में भय पैदा करती हैं, वहीं 'डैडी' (1989), 'मैंने गांधी को नहीं मारा' और 'खोसला का घोसला' (2007) जैसी फिल्मों में उनका अभिनय दर्शकों को भावुक कर देता है। उन्होंने 'लम्हे' (1991), 'शोला और शबनम' (1992), 'डर' (1993) और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' (1995) जैसी फिल्मों में अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन किया है।
इन दिनों 55 वर्षीय अनुपम ज्यादा फिल्में नहीं कर रहे हैं। वह कहते हैं, "अनुभव बहुत कुछ सिखाते हैं। एक लम्बी यात्रा के बाद लोग चयनात्मक हो जाते हैं। अलग-अलग तरह की भूमिकाएं करने के बाद कोई भी विशेषज्ञ बन जाता है और उसे अच्छी और ठीक भूमिकाओं में फर्क समझ में आने लगता है।"
फिल्मों में न दिखने के बावजूद अनुपम बहुत व्यस्त हैं। वह कहते हैं, "मैं बहुत सी परियोजनाओं में खुद को व्यस्त रखता हूं। फिल्में, परिवार, मेरा एक्टिंग स्कूल और 'लीड इंडिया' व 'डिस्कवर इंडिया विद अनुपम खेर' जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त हूं। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप नींव डालें और यह समझें कि आप इस उम्र में क्या करना चाहते हैं और कैसी उपलब्धियां हासिल करना चाहते हैं।"


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