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    'रचना करने वाला अपनी जड़ों की ओर लौटता है'

    By Staff
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    नए उपन्यास, पुरानी कृतियों, लेखन और अकादमी सम्मान प्राप्त करने जैसे विषयों पर गोविंद मिश्र ने बीबीसी संवाददाता फैसल मोहम्मद अली से बातचीत की.

    भोपाल शहर के एक पॉश इलाके में स्थित अपने बंगले के बगीचे में बैठकर, पास खड़े अशोक के पेड़ों पर चहचहाते परिंदों की मीठी आवाज़ों के बीच बात शुरू हुई.

    बातचीत के मुख्य अंश:

    क्या आपको उम्मीद थी कि अकादमी सम्मान मिलेगा और 'कोहरे में क़ैद रंग' के लिए मिलेगा?

    सच पूछिए मुझे तो कुछ भी नहीं पता था. यह भी नहीं कि मिलेगा भी या नहीं मिलेगा. क्योंकि बहुत सारे लेखक ऐसे हैं जो बहुत अच्छे हैं मगर उनको अकादमी पुरस्कार नहीं मिल पाता है. कई बार उनकी पुस्तक एक विशेष अवधि के दौरान प्रकाशित नहीं हो पाती जिसे शायद अवॉर्ड देतेसमय ध्यान में रखा जाता है. दूसरे कई लेखक जो एक दफा काफ़ी मशहूर हो जाते हैं तो बाद में उनकी किताबें आनी ही बंद हो जाती हैं.

    धर्मवीर भारती को अकादमी पुरस्कार नहीं मिला था. शायद रेणु को भी नहीं मिला. तो यह कोई ज़रूरी नहीं कि अवॉर्ड मिलेगा तभी लेखक होगा.

    हाँ यह अंदाज़ा होता है कि अगर आपकी किसी ख़ास पुस्तक को अवॉर्ड मिला है तो वह अच्छी होगी. और उपन्यास तो बड़ा काम होता है.

    इन तीन चार सालों में आपकी और कौन-कौन सी किताबें आईं और क्या आपके हिसाब से 'कोहरे में क़ैद रंग' आपकी सबसे बेहतर कृति है?

    लेखक को तो अपनी सभी कृतियाँ अच्छी लगती हैं. जब वह उन्हें लिख रहा होता है, तो संवार रहा होता है. जब एक बार किताब लिख ली जाती है, छप जाती तो वह पराई सी हो जाती हैं.

    लेखक को तो अपनी सभी कृतियाँ अच्छी लगती हैं. जब वह उन्हें लिख रहा होता है, तो संवार रहा होता है. जब एक बार किताब लिख ली जाती है, छप जाती तो वह पराई सी हो जाती हैं.

    लेखक को तो अपनी सभी कृतियाँ अच्छी लगती हैं. जब वह उन्हें लिख रहा होता है, तो संवार रहा होता है. जब एक बार किताब लिख ली जाती है, छप जाती तो वह पराई सी हो जाती हैं.

    जैसे बच्चे अपने होते हैं,आप उनको स्कूल छोड़ने जा रहे हैं, लेने जा रहे हैं, लेकिन जब वह एक बार कमाने लग गए, उड़ गए तो फिर आप अकेले रह जाते हैं. जैसे, अब हम मियाँ-बीवी हैं तो फिर उनसे एक दूरी बन जाती है. उसी तरह किताबों के साथ होता है.

    कोहरे में क़ैद रंग २००४ में आई. उस साल मेरी दो- तीन और किताबें आईं. एक यात्राओं पर थी, यात्रा वृतांत 'और यात्रा' के नाम से, एक कहानी संग्रह भी छपा मेरे ख्याल से. 'साहित्य, साहित्यकार और प्रेम' नाम से निबंध संग्रह का भी प्रकाशन हुआ.

    लेकिन साहित्यिक समाज की दृष्टि से तो उपन्यास एक बड़ी कृति मानी जाती है. तो ज़ाहिर है साहित्य अकादमी का ध्यान उपन्यास पर ही गया होगा.

    कहाँ से और कैसे ख़्याल आया कोहरे में क़ैद रंग लिखने का?

    ये यहीं लिखा गया जहाँ आप और हम बैठे हुए हैं, भोपाल में. मेरे ज़्यादातर उपन्यास इस तरह लिखे गए हैं कि मैं कहीं चला जाता हूँ दस-पन्द्रह दिनों के लिए ऐसी जगह जहाँ न टीवी है, न रेडियो है, न अखबार है ... न परिवार है, सिर्फ़ आपका लिखना है. सोना है, घूमना है, खाना है.

    ऐसे समय मैं ज़्यादातर पचमढ़ी जाता रहा हूँ. फिर लेखन को भोपाल ले आता हूँ, उसे संवारता हूँ. इस तरह चार पाँच साल लग जाते हैं मुझे एक उपन्यास लिखने में.

    इसको लिखने का कारण था, बुंदेलखंड पर मैंने एक उपन्यास लिखा था-'लाल पीली ज़मीन', जिसे ऑथर्स गिल्ड आफ इंडिया का पुरूस्कार भी मिला था.

    उसमें बुंदेलखंड के परिवेश के नकारात्मक पहलू बहुत आए तो मुझे थोड़ीअसहजता थी कि वहां की सुंदरता और खूबसूरती नहीं दिखाई जा सकी.

    कोहरे में क़ैद .... में परिवेश बांदा का है जहाँ का मैं हूँ. इसमें वैसे पात्र हैं जिनके अन्दर सुंदरता, सकारात्मकता है पर वह विकसित नहीं हो पातीं समाज के दबावों की वजह से, दूसरी वजहों से, इंसान व्यावहारिक होने लगता है. उन सुंदर तत्वों को उभारना मेरा मकसद था.

    इसीलिए रंग जो है शीर्षक में, वह सुन्दरता है, व्यक्तित्व की सुन्दरता जो अक्सर पूरी तरह पल्लवित नहीं हो पाते, पूरी तरह फूल नहीं पाते. कोहरा समाज के वो दबाव हैं जो व्यवहारिकता, जो चालाकी सीखनी पड़ती है जिसकी वजह से सुंदर चीज़ें दब जाती हैं. इसलिए कोहरे में कैद रंग शीर्षक लिया गया है.

    मुख्यतः बांदा का परिवेश है लेकिन चूँकि आज का समय भी उठाना था तोकई काल खंड साथ साथ आते हैं.

    यानी एक हिस्से में कहानी है, नया समय जब शुरू होता है तो वही लिखा हुआ उपन्यास नायक-नायिका डिस्कस करते हैं. नए समय की नायिका एक प्रकार से पुरानी नायिका का विस्तार है यहाँ.

    आपकी ज़्यादातर किताबों में क्या बुंदेलखंड ही बैकग्राउंड रहा है? एक किताब में आज़ादी के बाद परिवारों में जो टूट फूट हुई है उसको लेकर भी आपने कुछ लिखा है?

    मेरे कामों में महानगर भी हैं. मैंने विदेश के कुछ पात्रों की कहानियाँ भी लिखी हैं; 'ख़ाक इतिहास' कहानी का नाम याद आ रहा है, 'पैंतालीस अंश का कोण' एक कहानी है, विदेशी परिवेश में.

    मेरे कामों में महानगर भी हैं. मैंने विदेश के कुछ पात्रों की कहानियाँ भी लिखी हैं; 'ख़ाक इतिहास' कहानी का नाम याद आ रहा है, 'पैंतालीस अंश का कोण' एक कहानी है, विदेशी परिवेश में.

    आप जिसका ज़िक्र कर रहे हैं, 'पाँच आंगनों वाला घर' वह उपन्यास है. इसमें तीन पीढियों की कहानी है. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के काल में. आज़ादी के बाद जैसे जैसे राजनीतिक स्तर पर हमारा पतन हुआ है, पतन यानी उतने समर्पित और निष्ठावान नेता नहीं हुए; तो उसी के समानांतर और चीज़ों में भी पतन आया है. इसका अंग्रेज़ी में भी अनुवाद हुआ है.

    व्यास सम्मान भी दिया गया था इसे?

    जी हाँ. लेकिन यह कहना कि सब मैंने बुंदेलखंड के परिवेश में है, सही नहीं है. अब यह जिस उपन्यास का ज़िक्र हो रहा था, पाँच 'पाँच आंगनों वाला घर' उसमें बैकग्राउंड बनारस है. बल्कि बोली भी बनारस की है.

    इसी तरह मेरा एक उपन्यास है 'धीर समीरे' जो ब्रज की भूमि पर है और उसमें ब्रज भाषा का भी थोड़ा बहुत इस्तेमाल है.

    चूँकि मैं बुंदेलखंड का हूँ, और चूँकि बचपन का जो अनुभव होता है, आपकी भाषाई संस्कार, जो अनुभूतियाँ आपमें आ जाती हैं वह बाद में छोड़ती नहीं आपको. आप बार बार लौट कर वहां आते हैं. यह सभी कृतिकारों के साथ होता है.

    आज के सबसे प्रसिद्ध, अंतरराष्ट्रीय ख्याति के साहित्यकार गेब्रियल गार्सिया की किताब है हंड्रेड ईअर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड. वह बार-बार लातिन अमरीका जाते हैं जहाँ के बचपन के उनके अनुभव हैं.

    ऐसा तो ज़ाहिर है होगा. लेकिन मैंने उपन्यासों में अपने को काफ़ी बड़ा दायरा देने की कोशिश की है, बल्कि यह आलोचकों का कहना है कि जितना बड़ा रेंज मेरा है वह कम लेखकों का मिलता है. मेरे कामों में महानगर भी हैं. मैंने विदेश के कुछ पात्रों की कहानियाँ भी लिखी हैं; 'ख़ाक इतिहास' कहानी का नाम याद आ रहा है, 'पैंतालीस अंश का कोण' एक कहानी है, विदेशी परिवेश में.

    लेखक बंध के नहीं रहता है. लेकिन हाँ, जहाँ उसका बचपन बीता, वह बड़ा हुआ, वह उसका सबसे विपुल अनुभव होता है तो वह वहां आएगा ही.

    लेखन का काम कैसे शुरू हुआ, और बाद के वर्षों में जब आप सरकारी नौकरी में चले गए; तो यह आपके लेखन में बाधा के तौर पर आया या इससे आपके लेखन में मदद हासिल हुई?

    एक जीव के पैदा होने के बारे में तो आप कह सकते हैं कि नौ महीने में पैदा हो जाएगा. रचना के बारे में मेरे ख्याल से कहना मुश्किल है. यहाँ लेखक सिर्फ़ एक माध्यम होता है जिसके माध्यम से प्रकृति एक रचना को निकालती है. रचना शक्ल ख़ुद लेती है. उसकी तकदीर भी ख़ुद की ही होती है. किसी किताब को लोकप्रियता मिलती है. किसी को कुछ नहीं मिलता. और अक्सर ऐसा होता है कि एक रचना लेखक से बहुत आगे निकल जाती है. लेखक की मंशा नहीं थी की मैं यह कहना चाहता था लेकिन पाठक उनमें वह सब ढूंढ़ लेता है.

    एक जीव के पैदा होने के बारे में तो आप कह सकते हैं कि नौ महीने में पैदा हो जाएगा. रचना के बारे में मेरे ख्याल से कहना मुश्किल है. यहाँ लेखक सिर्फ़ एक माध्यम होता है जिसके माध्यम से प्रकृति एक रचना को निकालती है. रचना शक्ल ख़ुद लेती है. उसकी तकदीर भी ख़ुद की ही होती है. किसी किताब को लोकप्रियता मिलती है. किसी को कुछ नहीं मिलता. और अक्सर ऐसा होता है कि एक रचना लेखक से बहुत आगे निकल जाती है. लेखक की मंशा नहीं थी की मैं यह कहना चाहता था लेकिन पाठक उनमें वह सब ढूंढ़ लेता है.

    लेखन में हर वह चीज़ मदद करती है जो जीवन से सम्बंधित है. चूँकि आप जी ही रहे हैं. जीने को अभिशप्त हैं तो भी. जीना एन्जॉय कर रहे हैं तो भी. आप जीते तो है ही.

    थोड़ी समस्या आपके व्यावहारिक काम की वजह से हो सकती है- वो काम से जो आपने खर्चे चलने के लिए, जीवन यापन करने के लिए कर रहे हैं वह आपके लेखन के लिए कितनी गुंजाइश छोड़ता है. ख़ासतौर पर शारीरिक स्तर पर, स्टेमिना के तौर पर. जहाँ तक अनुभवों का सवाल है तो मेरी नौकरशाही के अनुभव भी मेरी साहित्य में आए हैं.

    कुछ कहानियाँ हैं जैसे जिहाद, वह एक चेहरा, जिसमें एक नया प्रोबशनर सरकारी नौकरी ज्वाइन करता है और उसका मोह उससे भंग होता है.

    वह तो आदर्शों की पोटली लेकर आया था!

    एक सवाल समय का होता है. तो में तो अपनी सारी छुट्टियां इकट्ठी करके रखता था. और जैसा कि मैंने आपको बताया, छुट्टी लेकर लिखने के लिए बाहर चला गया. पचमढ़ी चला गया, जंगल में चला गया, वहां अपने को डाल दिया. मेरे अधिकांश उपन्यास इसी तरह लिखे गए.

    मेरे अपने सन्दर्भ में भी ऐसा ही हुआ कि नौकरशाही का माहौल इतना असाहित्यिक था कि मुझे और अधिक प्रेरणा मिली की लिखूं.

    क्या आपकी नौकरी का ज़्यादा हिस्सा मध्य प्रदेश में ही बीता?

    मैं केन्द्र सरकार में मुलाज़िम था. और मेरी ज़्यादातर पोस्टिंग बड़े शहरों में ही हुई. मध्य प्रदेश में कभी नहीं रहा. यहाँ तो सेवानिवृत्ति के बाद बस गया. सोचा अब एक नया जीवन शुरू करूंगा. ज़ीरो से. न रिश्तेदार हों. न बहुत जान पहचान हो.

    पहले दिल्ली बसने का इरादा था.l

    पचमढ़ी का ज़िक्र आपने बार बार किया इस बातचीत में, जहाँ आप बार-बार लेखन के लिए गए?

    हाँ एक तरह से लेखन का ज़्यादा काम वहीँ हुआ. लेकिन 'हुज़ूर दरबार' उपन्यास कुशवंत सिंह के कसौली काटेज में लिखा गया, बारह दिन रूककर, लाल पीली ज़मीन लिखा मुक्तेश्वर में. वहां करीब बीस दिन पड़ा रहा.

    मध्य प्रदेश से मेरा लगाव ही एक तरह से पचमढ़ी से शुरू हुआ. तब वहां इतनी भीड़ भाड़ नहीं होती थी. बीस रूपये रोज़ में कमरा मिल जाता था. वहां कुछ दिन रह लिए लेखन का काम किया.

    हाल में ही धर्मशाला के राइटर्स होम में रहकर आया हूँ. अपने नए उपन्यास की थोड़ी रूप रेखा खींच के, अब यहाँ री-टच करूंगा, फिर उसे लेकर कहीं चला जाऊँगा.

    यह सिलसिला कि बाहर चले जाइए. उस उपन्यास के साथ सोइए, उसके पात्रों के साथ रहिए, बातें करिए उन्हीं से, किसी की ज़रूरत नहीं आपको. उससे लिखने की प्रक्रिया ज़रा तेज़ हो जाती है.

    पहाड़ में एकांत होता है. उत्तर भारत में हिमालय के नीचे तो प्रेरणा भी वैसी आती है. चेतना भी. लगता है एक उच्च स्तर पर उठ जाती है अपने आप ही. शायद इसीलिए पुराने ऋषि मुनि वहीँ पहुँचते थे.

    मैं दिल्ली मुंबई रहकर कोई उपन्यास नहीं लिख पाया. जबकि दोनों जगहों पर लंबे समय तक रहा हूँ. इसीलिए भोपाल आ गया. बड़ा शहर लेखन के लिए अच्छा नहीं होता है. वहां आप आज के जीवन के अनुभव अर्जित कर सकते हैं लेकिन एक लेखिक्य चेतना, जिस समय आप लिख रहे होते हैं, वह वहां मुश्किल है.

    नई कृति, जिसका ज़िक्र आपने किया वह क्या है, उपन्यास, यात्रा वृत्तांत ....?

    उपन्यास हाथ में रहता है तो जीवन ज़रा अच्छा लगता है, अर्थपूर्ण लगता है. मैं एक उपन्यास छपने के बाद थोड़ा से दिन खाली छोड़ता हूँ, फिर मन होने लगता है कि कोई बड़ी चीज़ शुरू हो जाए, अब भले ही मैं रोज़-रोज़ उसे न लिखूं, महीनों न लिखूं, लेकिन थोड़ा लिखा, फिर रख लिया, वह एक प्रक्रिया चलती रहती है.

    जो अभी शुरू किया है वह ज़ाहिर है उपन्यास ही है.थोड़ा बताएं उसके बारे में...

    अभी कहना उसके बारे में बड़ा मुश्किल लगता है. मगर मोटे तौर पर कभी कभी साधारण आदमी, आम लोग, वह भी कभी ज़िम्मेदार होता है इस बात के लिए जिस तरह की सरकारें उसे मिलती हैं. यानि जो जनता है वह भी कम ज़िम्मेदार अपनी बर्बादी के लिए नहीं है.

    हर चीज़ के लिए नेताओं को ब्लेम कर देना सहीं नहीं हैं हम लोग भी जिम्मेदार हैं. अब देखिए यहीं भोपाल का लिजिए. झील साफ़ कर दी जाती हैं लेकिन हम ही लोग जाकर कभी यह विसर्जन, कभी वह विसर्जन. कभी गणेश का, कभी देवी का. उसे गन्दा कर आते हैं.

    निकम्मापन अलग. भ्रष्टाचार अगर है तो दोनों तरफ़ से होता है. हम ही लोग बहुत उतावले होते हैं पैसे दे देने को. पैसा देकर काम करा लेने को. शार्टकट ढूँढने के तैयार.

    इसके मायने है यह एक राजनीतिक उपन्यास होगा?

    हाँ. वैसे मैंने पहले भी राजनीतिक उपन्यास लिखे हैं. हुज़ूर दरबार स्वतंत्रता आंदोलन के समय राजाओं के बारे में है. पाँच आंगनों वाला घर में भी राजनीतिक परिवेश आया है.

    अब मैं कहना चाहता हूँ कि हमारे समय में जो बर्बादी हो रही है उसके लिए नेताओं के साथ साथ साधारण जन को भी बख्शा नहीं जाए. उसको भी छुआ जाए ताकि कुछ सुधर हो सके.

    कब तक आ जाएगा यह उपन्यास?

    हँसते हुए.. मैंने कभी बंधन नहीं रखा है ख़ुद पर. कल मैं अपने एक आलोचक मित्र से कह रहा था कि जीना लिखने से ज़्यादा अहम है. जिस तरह का मन करे वैसे जियो.

    मैं लिखने में जल्दी नहीं करता. कभी कभी तो सौ सौ बार पढ़े जाते हैं, करेक्ट किए जाते हैं, फाड़े जाते हैं. नए पन्ने लिखे जाते हैं. एक ऐसा समय आ जाता है जब मुझे लगता है अब इसमें मेरे बस का कुछ रहा नहीं तब मैं उसको प्रकाशक के हवाले कर देता हूँ.

    एक जीव के पैदा होने के बारे में तो आप कह सकते हैं कि नौ महीने में पैदा हो जाएगा. रचना के बारे में मेरे ख्याल से कहना मुश्किल है. यहाँ लेखक सिर्फ़ एक माध्यम होता है जिसके माध्यम से प्रकृति एक रचना को निकालती है. रचना शक्ल ख़ुद लेती है. उसकी तकदीर भी ख़ुद की ही होती है. किसी किताब को लोकप्रियता मिलती है. किसी को कुछ नहीं मिलता. और अक्सर ऐसा होता है कि एक रचना लेखक से बहुत आगे निकल जाती है. लेखक की मंशा नहीं थी की मैं यह कहना चाहता था लेकिन पाठक उनमें वह सब ढूंढ़ लेता है.

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