चक दे इंडिया के 13 साल: "इस फिल्म ने महिला एथलीट जगत और देश के बीच एक पुल का काम किया"
यश राज फिल्म्स के साथ जयदीप साहनी की 15 साल लंबी रचनात्मक सहभागिता ने उन्हें 'बंटी और बबली', 'रॉकेट सिंह: सेल्समैन ऑफ द ईयर', 'शुद्ध देसी रोमांस', 'आजा नचले' और शाहरुख खान अभिनीत कल्ट क्लासिक 'चक दे! इंडिया' जैसी कुछ शानदार हिट फिल्में लिखने का मौका दिया। जनरेशन को डिफाइन करने वाली इस फिल्म की 13 वीं वर्षगांठ पर जयदीप कहते हैं कि इस फिल्म को बनाने के लिए निर्देशक शिमित अमीन और उन्हें आदित्य चोपड़ा की तरफ से पूरी रचनात्मक स्वतंत्रता मिली हुई थी। इस फिल्म को इंडस्ट्री द्वारा बनाई गई अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है।
"मैं कई वर्षों से यह कहानी कहना चाहता था। तो जब 'बंटी और बबली' के बाद आदि ने मुझसे पूछा कि अब आगे मैं क्या करना चाहता हूं, मैंने उनको बताया कि मैं यह फिल्म करना चाहूंगा, जो महिला एथलीट जगत और शेष भारत के बीच एक तरह का पुल बना सकती है। मैं जैसे-जैसे अपने अनुभवों और अहसासो के बारे में उनको सुनाता गया, वह इस बात पर सहमत होते चले गए कि इस एथलीट जगत से अधिकतर लोगों का वास्ता न होना शर्म की बात है। आदि ने यह भी कहा था कि अगर हम चीजों को सही ढंग से पेश कर पाए तो वाकई एक बेहतरीन फिल्म बनेगी"- बताते हैं जयदीप।

जयदीप ने डायरेक्टर शिमित अमीन की ही तरह बॉलीवुड में अपने दम पर अपनी जगह बनाई है। शिमित ने एक विजनरी डायरेक्टर के रूप में अपनी प्रतिभा के दम पर सबको चकित कर दिया था। इन दोनों को आदित्य ने अपनी क्षमता से आगे जाकर कंटेंट पर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया, जो चाहते थे कि इनकी खास आवाज और विजन एकदम निखर कर सामने आए।
"शिमित और मैं तब से फ्रेंड हैं, जब मैं 'कंपनी' लिख रहा था और वह राम गोपाल वर्मा के ऑफिस में 'भूत' फिल्म की एडिटिंग कर रहे थे। लेकिन 'अब तक छप्पन' देखने के बाद यह आदि का ही कन्विक्शन था कि शिमित को इस फिल्म का डायरेक्टर होना चाहिए। उस शुरुआती स्टेज पर बतौर प्रोड्यूसर और डायरेक्टर आदि व शिमित ने फिल्म में जो यकीन जाहिर किया था, वह मेरे लिए बड़ा आश्वस्तिकारक था, क्योंकि मुझे पता था कि मैं अपनी राइटिंग उन लोगों के हाथों में सौंप रहा हूं, जिन पर मुझे भरोसा है और जिनका मैं सम्मान करता हूं।"- कहते हैं जयदीप, जो शिमित की ही तरह पूरी तरह से ऑउटसाइडर हैं और दोनों को उनकी विशुद्ध प्रतिभा के चलते आदि ने चुना और सजाया-संवारा था।
लिहाजा जयदीप को लगता है कि वायआरएफ में उनको हमेशा फ्री हैंड मिलने के चलते ही वह अलग-अलग किस्म की फिल्में लिख पाए। वह बताते हैं, "मेरी 5 स्क्रिप्ट, जो एक-दूसरे से एकदम मुख्तलिफ थीं, वायआरएफ ने प्रोड्यूज की हैं। इन्हें 4 अलग-अलग डायरेक्टरों ने निर्देशित किया है। फिल्ममेकर्स द्वारा बनाए और चलाए जा रहे स्टूडियो की बात ही कुछ अलग होती है, जिसे सुपरफीशियल ढंग से समझाना मुश्किल है, लेकिन कामकाजी फिल्ममेकर इस बात को समझते हैं और एप्रीसिएट करते हैं।"
मीडिया हमेशा कयास लगाता है कि क्या 'चक दे! इंडिया' रचनात्मक दृष्टि से अपने वक्त से पहले की फिल्म थी, क्योंकि उनको लगता है कि अगर यह फिल्म आज रिलीज हुई होती तो बॉक्स ऑफिस के तमाम रिकॉर्ड तोड़ देती। जयदीप को इस बात की खुशी है कि 'चक दे! इंडिया' भारतीय सिनेमा की एक माइलस्टोन बन गई है।
"जब लोग 'चक दे! इंडिया' को अपने वक्त से पहले की फिल्म बताते हैं तो हैरत में पड़ जाता हूं कि मैं इसे किस रूप में लूं! बात सिर्फ इतनी सी है कि ऑडियंस के तौर पर हम अपनी-अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस कदर बिजी हो जाते हैं कि हमें यह याद ही नहीं रह जाता कि अगर हम मौका दें तो कोई नई चीज भी हमें खुशियां दे सकती है। बतौर स्टोरीटेलर हमारे ऊपर हमेशा एंटरटेनिंग बने रहने का प्रेशर होता है जो हमारे सब्जेक्ट के चुनाव पर एक आर्टीफीशियल सीलिंग थोप सकता है। लेकिन सब्जेक्ट हमेशा स्टोरीटेलर से महान होते हैं, और अगर हम उनका आदर करें तो वे धीरे से हमें रास्ता भी दिखा देते हैं।"- कहते हैं जयदीप।
मजे की बात यह है कि जयदीप फिल्म इंडस्ट्री में अपने 20 साल पूरे करने जा रहे हैं। उन्होंने वर्ष 2000 में राम गोपाल वर्मा की 'जंगल' से बतौर एक राइटर डेब्यू किया था। वायआरएफ के साथ उनका गठबंधन 'बंटी और बबली' लिखने के लिए 2005 में हुआ और उसके बाद से वह आदि के साथ करीब से काम करते चले आ रहे हैं।
वह याद करते हैं, "मुझे दो महीने रोजाना देखने के बाद भी मेरी पहली फिल्म के सेट पर किसी ने डीटीपी ऑपरेटर समझ लिया था क्योंकि मैं कम्प्यूटर पर काम किया करता था। राइटिंग को उस भूले-बिसरे कोने से हर व्यक्ति के ध्यान में सामने आते देखना हम सभी लेखकों के लिए बड़े संतोष का विषय है।"
जयदीप आगे बताते हैं- "मुख्तलिफ माहौल में रची-बसी भिन्न सुर-तालों, बोलियों और गंवारू भाषाओं वाली अलग-अलग जॉनर की फिल्में इमेजिन करने और उन्हें लिखने में मुझे परम आनंद मिला है। इनमें से कई किरदारों, संवादों या गानों के टुकड़ों का लोगों की आम बातचीत में शामिल हो जाना एक ऐसी उपलब्धि है, जिसे पाना मेरा लक्ष्य नहीं था, लेकिन बिना चौंके इसका आनंद उठाना आखिरकार मैंने सीख लिया है। हालांकि मैं इस बात को लेकर हमेशा सचेत रहता हूं कि ऐसा इस माध्यम की पहुंच के कारण भी होता है, इसीलिए हमें इस अनाड़ी ताकत को किसी अच्छे काम में इस्तेमाल करने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहिए, ताकि भरोसे के कुछ पुल कायम हो सकें या संभवतः कोई सार्थक चर्चा ही शुरू हो जाए।"


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