एक मुलाक़ात अभिनेता ओम पुरी के साथ

By संजीव श्रीवास्तव

ओम पुरी ने बॉलीवुड और हॉलीवुड की कई बेहतरीन फ़िल्मों में अभिनय किया है
इस बार एक मुलाक़ात में हमारे साथ ऐसी शख़्सियत हैं जो टैलेंट और स्टारडम का ख़ूबसूरत मिश्रण हैं. जी हाँ इस बार हमारे मेहमान हैं सुपर एक्टर ओम पुरी.

जब अपनी तारीफ सुनते हैं तो कैसा लगता है, कहीं ऐसा तो नहीं लगता कि अब तो लोगों को कहना ही चाहिए कि मैं ज़बर्दस्त अभिनेता हूँ?

नहीं ऐसा नहीं है, अपनी तारीफ सुनकर अच्छा लगता है. ये स्वाभाविक है. किसी की तारीफ हो और वो स्वीकार न करे तो ये बदतमीज़ी होगी.

इस प्रशंसा का हक़दार बनने के लिए ओमपुरी ने कितनी मेहनत की?

मेहनत तो बहुत की है. तीन साल नेशनल स्कूल ड्रामा (एनएसडी) में रहा. एक साल दिल्ली में फ्रीलासिंग की. इसके बाद दो साल फ़िल्म इंस्टीट्यूट में रहा. 1976 में मुंबई गया और 1981 में पहली फ़िल्म आक्रोश मुझे मिली. आप खुद ही देख लीजिए कि कितने साल की मेहनत है. हालाँकि मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है.

दरअसल, जब हम बॉम्बे गए थे तो एनएसडी की कोई पहचान नहीं थी, लेकिन आज मेरे ख़्याल से कोई 150 एक्टर होंगे जो एनएसडी से हैं और उन्होंने बहुत जल्द फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई है.

दोनों ने एनएसडी में एक साथ अभिनय सीखा है

एनएसडी और पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट की बात चली तो पूछ लूँ कि क्या दोनो संस्थानों के छात्रों के बीच क्या किसी तरह की प्रतिस्पर्धा थी?

नहीं, सीधे तौर पर तो किसी तरह की प्रतिस्पर्धा नहीं थी. क्योंकि दोनो की अपनी अलग पहचान थी और है. हालाँकि बाद में एनएसडी फ़िल्म के साथ मिल गया और इसकी वजह ये है कि मराठी, बंगाली थियेटरों की तरह हिंदी थियेटर प्रोफ़ेशनल नहीं हो सका.

ऐसा क्यों है, जबकि हिंदी में एक से कवि, लेखक, साहित्यकार, कलाकार हुए हैं?

ठीक है, लेकिन थिएटर की परंपरा नहीं रही. मसलन पंजाब में भांड, मरासी. लेकिन हिंदी या पंजाबी में थिएटर नहीं रहा.

बीबीसी एक मुलाक़ात के सफ़र आगे बढ़ाएँ, आपके पसंदीदा गाने?

किशोर कुमार का गाया गाना ‘आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ इक ऐसे गगन के तले. इसके अलावा मणिरत्नम की फ़िल्म का गाना ‘छोटी सी आशा.... साथ ही ‘हम दोनों फ़िल्म का गाना ‘हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया, शहीद का गाना ‘जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में भी मुझे काफी पसंद है.

अच्छा, पहली बार दिमाग में कब और कैसे आया कि एक्टर बनना है?

जब मैं स्कूल में था तो फौज में भर्ती होना चाहता था, हालाँकि स्कूल में मैने दो छोटे-छोटे नाटक किए थे. लेकिन कॉलेज पहुंचकर मैं गंभीर हो गया. वहाँ जो नाटक किए, उनमें मुझे काफी प्रशंसा मिली. जब मैं यूनीवर्सिटी के यूथ फ़ेस्टिवल में हिस्सा ले रहा था वहाँ निर्णायक हरपाल टिवाना और उनकी पत्नी बीना थी. तो उन्होंने मुझे अपने थिएटर पंजाब कला मंच में काम करने का प्रस्ताव दिया.

मैं उस समय दिन में कॉलेज में लैब असिस्टेंट की नौकरी करता था और ईवनिंग कॉलेज में पढ़ता था.

हम शनिवार, रविवार को देश के विभिन्न स्थानों पर नाटक के लिए जाते थे. मैं इस ग्रुप के साथ ढाई साल रहा. फिर मुझे एनएसडी के बारे में पता चला. मैने आवेदन किया और मेरा चयन भी हो गया.

इसके बाद आक्रोश और अर्धसत्य. दोनो बहुत शानदार फ़िल्में थी. उस समय एंग्री यंगमैन का दौर भी शुरू हो चुका था. आपका चेहरा भी बहुत आकर्षक नहीं था, कैसे हुआ ये सब?

देखिए ऐसा तो शुरू में बच्चन साहब के बारे में भी कहा जाता था कि उनका चेहरा चॉकलेटी नहीं है.

जब हम बॉम्बे गए थे तो एनएसडी की कोई पहचान नहीं थी, लेकिन आज मेरे ख़्याल से कोई 150 एक्टर होंगे जो एनएसडी से हैं और उन्होंने बहुत जल्द फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई है
लेकिन माफ़ कीजिएगा. उनके मुक़ाबले आपका चेहरा तो बहुत कम चॉकलेटी है.

बिल्कुल. ये सही बात है. ऐसा बहुत लोगों के बारे में कहा गया. शेख मुख्तार के चेहरे पर भी चेचक के दाग थे और वो ‘बी ग्रेड फ़िल्मों में हीरो होते थे. बाद में वो पाकिस्तान चले गए.

उस समय आपका रोल मॉडल कौन था?

बचपन में हम दिलीप कुमार, बलराज साहनी, मोतीलाल, वहीदा रहमान के भक्त थे. ऐसा नहीं कि बाद में हम उनसे प्रभावित नहीं रहे, लेकिन एनएसडी में हमने ये सीखा कि फ़िल्म इंडस्ट्री में हमें ख़ुद अपनी जगह बनानी है और किसी की नकल नहीं करनी है.

अर्धसत्य, आक्रोश में आपकी पसंदीदा फ़िल्म कौन थी?

बहुत मुश्किल है. अर्धसत्य मैं इसलिए चुनूँगा कि वो ज़्यादा लोगों तक पहुँची. अर्धसत्य सिर्फ़ मध्यम, उच्च मध्यम वर्ग तक ही नहीं पहुंची बल्कि कामकाजी वर्ग तक भी पहुँची. इस फ़िल्म ने ये भी भ्रम तोड़ा कि कामकाजी तबका सिर्फ़ गाने-बजाने की फ़िल्मों को पसंद करता है.

कई लोगों का कहना है कि आर्ट और पेशेवर दोनो तरह की फ़िल्मों में आप कैसे फ़िट हो जाते हैं?

मैं कहूँगा कि ये सब एनएसडी की देन है. वहाँ हमें सघन प्रशिक्षण मिला. दरअसल, जब मैंने आक्रोश की तो मुझे लगा कि मेरी छवि ‘गंभीर कलाकार की बन गई है. तंगहाली के बावजूद मैने इस छवि को तोड़ने के लिए एक नाटक ‘बिच्छू किया. हमने इसके 70-75 शो किए और यह काफ़ी सफल रहा. इससे लोगों को लगा कि मैं गंभीर ही नही हास्य भूमिकाएं भी कर सकता हूँ. ये नाटक देखने के बाद ही कुंदनशाह ने मुझे ‘जाने भी दो यारो का रोल दिया.

‘जाने भी दो यारो के बनने के दौरान का कोई दिलचस्प वाकया?

उसका बजट बहुत नालायक था. फ़िल्म का बजट नौ लाख रुपये का था और मुझे सिर्फ़ 5,000 रुपये मिले थे. नसीरुद्दीन शाह को शायद 12 हज़ार मिले थे. खाना डायरेक्टर के घर से आता था. उन्होंने एक बाई रख ली थी. रोज लौकी की सब्जी और मूंग की दाल आती थी और शाम को भी यही.

ओम पुरी ने एक फ़िल्म में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़िया उल हक़ की भूमिका भी निभाई है

लेकिन फ़िल्म में काम करते हुए बहुत मजा आया. एनएसडी की शानदार प्रतिभाएँ उस फ़िल्म में थी.

जाने भी दे यारो को बने 20 साल से अधिक हो गए. उस जैसी फ़िल्म फिर क्यों नहीं बनीं?

इसका मुझे भी अफ़सोस होता है. राजनीति, मेडिकल क्षेत्र पर ऐसी फ़िल्में बन सकती हैं. एक धारावाहिक बना था कक्काजी कहिन. लेकिन हम उसके सिर्फ़ 13 एपिसोड ही बना सके. सरकार ने आगे बनाने की अनुमति नहीं दी. शायद हमने किसी नेता की दुम पर पांव रख दिया था.

आप लोगों की दुम पर पांव रखने के लिए भी जाने जाते हैं?

हम सही लोगों की दुम पर पांव रखते हैं.

आपने हॉलीवुड, बॉलीवुड तमाम जगह काम किया है. आप अंग्रेजी भी देसी शैली में बोल लेते हैं. कैसे शुरुआत हुई?

देसी स्टाइल इसलिए कि मैं नगरपालिका के स्कूल में पढ़ा हूँ, कॉन्वेंट में नहीं. रही बात शुरुआत की तो 1981 में एक ब्रिटिश टेलीविजन सीरियल बना था ‘ज्वैल इन द क्राउन. जैनिफ़र कपूर ने मेरा नाम सुझाया था. एक महीने तक मैने इसमें काम किया.

इसके बाद पांच-छह साल का लंबा अंतराल. फिर दीपा मेहता ने मुझे अपनी पहली फ़िल्म ‘सैम एंड मी में लिया. 1990 में सिटी ऑफ़ ज्वॉय आई. इसमें मेरी भूमिका की ख़ूब तारीफ़ हुई. इस तरह बातें आगे बढ़ी. माई सन द फैनेटिक, ईस्ट इज ईस्ट, वूल्फ़, चार्ली विल्सन वार जैसी फ़िल्में मुझे सीधी मिली. चार्ली विल्सन वार में मैने ज़िया उल हक़ की भूमिका की.

ज़िया उल हक़, पाकिस्तानी राष्ट्रपति?

जी हां. हालाँकि फ़िल्म में मेरे दो ही सीन थे. ये फ़िल्म की कहानी तब की है जब अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सैनिक थे और अमरीका छटपटा रहा था. अमरीका ने ज़िया उल हक़ को विश्वास में लिया था. ज़िया उल हक़ ने अमरीकियों से मोलभाव किया था कि अफ़ग़ानिस्तान में पैसा हमारे मार्फ़त जाएगा. एक और सीन था जब ज़िया को अमरीका में सम्मानित किया जाता है.

दरअसल, पहले मैने इस फ़िल्म के लिए मना कर दिया था, लेकिन फिर माइक निकलसन ने खुद मुझे फ़ोन किया और मैं इनकार नहीं कर सका.

मैं खुद को सामान्य इंसान मानता हूँ. जो काफ़ी सख़्त हालात से गुज़रा, लेकिन ज़िंदगी को हल्के में नहीं लिया और मेहनत की. मेरी सोच ये रही कि आगे बढूँ लेकिन किसी पर पैर रखकर नहीं
हिंदी सिनेमा, हॉलीवुड की कई बार तुलना की जाती है. आपका क्या नज़रिया है?

ऐसा नहीं कि वे बुरी फ़िल्में नहीं बनाते, लेकिन हमारे मुक़ाबले अच्छी फ़िल्मों की संख्या उनकी ज़्यादा है. हाल ही की फ़िल्में ‘तारे जमीं पर, ‘हल्ला बोल बहुत अच्छी फ़िल्में हैं. पिछले छह महीनों की फ़िल्मों में से मुझे ये दोनो ही फ़िल्में अच्छी लगीं.

चक दे इंडिया अच्छी नहीं लगी?

ये फ़िल्म भी अच्छी थी.

हॉलीवुड में आपका पसंदीदा अभिनेता?

जब कॉलेज में थे तो ज़्यादा अंग्रेजी फ़िल्में नहीं देखी, लेकिन एनएसडी में आने के बाद हॉलीवुड की फ़िल्में देखने लगे थे. मेरे पसंदीदा अभिनेता एल्गीनस रहे हैं. उसकी वजह ये है कि उनका व्यक्तित्व अभिनेता के लिहाज से बेहतरीन था.

वैसे तो मार्लिन ब्रांडो का व्यक्तित्व भी अच्छा था, लेकिन एल्गीनस भिखारी और राजा दोनो किरदारों को बेहतरीन तरीके से निभा सकते थे, जबकि मार्लिन ब्रांडो किसी तरह भिखारी की भूमिका में सहज नहीं हो सकते थे. अभिनेता का शरीर उसका इंस्ट्रूमेंट है. संगीतकार की तरह.

आप अपने बारे में क्या कहेंगे. क्या आपका अभिनय स्वाभाविक और आसान है या फिर मेहनत?

कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो आपके व्यक्तित्व, स्वभाव से इत्तेफ़ाक रखते हैं. लेकिन जो किरदार व्यक्तित्व के विपरीत हों उन्हें निभाने में मुश्किल आती है.

आपका ख़ुद का व्यक्तित्व या शख़्सियत कैसी है?

मैं खुद को सामान्य इंसान मानता हूँ. जो काफ़ी सख़्त हालात से गुज़रा, लेकिन ज़िंदगी को हल्के में नहीं लिया और मेहनत की. मेरी सोच ये रही कि आगे बढूँ लेकिन किसी पर पैर रखकर नहीं. भावुक हूँ. अख़बार पढ़ता हूँ तो भी महसूस करता हूँ. आप किसी का दुख महसूस कर सकें तभी किरदारों के साथ न्याय कर सकते हैं.

लोग कहते हैं कि फ़िल्मी दुनिया में गलाकाट प्रतिस्पर्धा है. तो संवेदनशील होने का आपने कभी खामियाजा भुगता है?

नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता कि कोई मुझ पर पाँव रखकर आगे बढ़ा. कई बार ऐसा होता है कि आप कोई किरदार करना चाहते हैं वो किसी दूसरे के पास चला गया. जैसे नसीर ने फ़िल्म ‘शोध के लिए मना किया और वो फ़िल्म मेरे हिस्से आई. फिर मैने नसीर को फ़ोन कर धन्यवाद दिया.

दूसरा मैने हाल ही में अमिताभ के साथ ‘देव की तो मैने उनसे कहा कि 25 साल पहले आपने मुझ पर अहसान किया था तो उसके लिए मैं आपका धन्यवाद करना चाहता हूँ. इस पर अमिताभ ने कहा कि 25 साल पहले तो मैं आपका जानता भी नहीं था. तब मैने उन्हें कहा कि आपने ‘अर्धसत्य के लिए मना किया था, जो बाद में गोविंद निहलानी ने मुझे दी.

ओम पुरी का अभिनय हॉलीवुड में भी सराहा गया है

नसीरुद्दीन शाह को आप कैसा अभिनेता मानते हैं? वो बहुत शानदार अभिनेता हैं. खुद से उनकी तुलना करूं तो कहूँगा कि वो ज़्यादा समझदार हैं. उन्होंने मुझसे ज़्यादा पढ़ा है. हम दोनों में फ़र्क ये है कि मैं शायद थोड़ा भावुक हूँ और नसीर ज़्यादा नज़ाकत से काम करते हैं.

नसीर के साथ कोई प्रतिद्वंद्विता?

बिल्कुल नहीं. नसीर की बीवी को भी ताज्जुब होता है कि हम 1970 से साथ काम रहे हैं और अब भी एक-दूसरे से बहुत प्यार से मिलते हैं. इसीलिए शायद इंडस्ट्री में हम दोनों को लेकर किसी तरह का विवाद नहीं हुआ.

कोई ऐसा किरदार जो आपकी शख़्सियत से अलग हो. क्या अर्धसत्य, आक्रोश के किरदार आपके व्यक्तित्व के नज़दीक हैं?

हाँ, उस वक़्त था. मुझमें समाज की खामियों, असमानता को लेकर बहुत रोष था. अखबार पढ़ते थे तो तकलीफ होती थी. आज भी होती है, लेकिन तब खून भी गरम था. अब कुछ बदल भी रहा है. जेसिका लाल का ही मामला लें, उस मामले में अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया था, लेकिन मीडिया और लोगों ने आवाज़ उठाई और उस लड़की को इंसाफ मिला.

शाहरुख़ ख़ान या अमिताभ बच्चन?

दोनों स्टार हैं. लेकिन फ़र्क ये है कि अमिताभ बहुमुखी अभिनेता हैं, शाहरुख की सीमाएं हैं. शाहरुख़ बहुत अच्छे डांसर हैं, अमिताभ डांस में शायद शाहरुख से कम पड़ेंगे. लेकिन अमिताभ बेहतरीन अभिनेता हैं और आर्ट फ़िल्में भी कर सकते हैं.

दिलीप, नसीर, अमिताभ को छोड़कर और कोई आपका पसंदीदा अभिनेता?

मैं आमिर ख़ान को बहुत पसंद करता हूँ. सिर्फ़ अभिनय के लिए नहीं. इसलिए भी कि वह ख़ुद के लिए मौके बनाते हैं. ये बहुत कम लोगों में होता है. वो उन लोगों में शामिल है जो मौके का इंतज़ार नहीं करते, मौके लपक लेते हैं. इसके लिए उन्हें अतिरिक्त प्रयास भी करने पड़े हैं. उनमें अनुशासन है. वो सिर्फ़ पैसों के लिए कोई भी फ़िल्म नहीं करते. उन्होंने चुनिंदा फ़िल्में की हैं. इसलिए मैं उनका बड़ा प्रशंसक हूँ.

हमने शुरू में आपकी शक्ल-सूरत की बात की थी. क्या कभी इसको लेकर कुछ ख़्याल?

मुझे जो चेहरा कुदरत ने दिया है मैं उसे स्वीकार करता हूँ और मुझे अपनी मोटी नाक और चेहरे के छेदों पर नाज है
1978-79 की बात है एक साहिबा थी पर्ल पदमसी. उन्होंने मुझे कहा था कि तुम चाहो तो हम तुम्हारे चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करा सकते हैं. तब मैने कहा कि मैं कैसे प्लास्टिक सर्जरी करा सकता हूँ. तब उन्होंने कहा कि वो आप हमारे ऊपर छोड़ दीजिए. लेकिन मैने कहा कि मुझे जो चेहरा कुदरत ने दिया है मैं उसे स्वीकार करता हूँ और मुझे अपनी मोटी नाक और चेहरे के छेदों पर नाज है.

एक दिलचस्प वाकया बताता हूँ महमूद साहब ने एक बार इंटरव्यू में कहा था....यार एक वो एक्टर है..क्या नाम है उसका....जिसके चेहरे पर एक किलो कीमा भी भरो तो भी गड्ढे नहीं भरेंगे, लेकिन क्या एक्टर है यार.....

क्या ये सही है कि एक स्तर के बाद लड़कियों को पारंपरिक चेहरे से अलग हटकर चेहरा अच्छा लगने लगता है?

जी...मैं ये कहूँगा कि मैं भाग्यशाली हूँ कि लोगों ने मुझे इसी रूप में स्वीकार किया. मेरी कई महिला मित्र हैं, जो काफी खूबसूरत हैं. मुझे उनसे अपने बारे में काफी हौसला मिला. मैने भी अपनी सीमाएं जानीं और जाना कि हम भी कुछ दम रखते हैं.

इतनी दमदार आवाज़ का राज क्या है?

देखिए ये एक तो कुदरत की देन है. आवाज़ को एनएसडी ने संवारा. एक विषय संगीत का भी होता था. हमें गाना सिखाया जाता था. मैं और नसीर बेसुरे थे इसलिए इससे चिढ़ते थे. लेकिन उनका कहना था कि हम आपको गायक नहीं बनाना चाहते, बल्कि आवाज़ में रेंज के लिए ऐसा करते हैं. फिर मैने खुद भी प्रयास किए.

मैं एनएसडी के ओपन थिएटर में जाता था और लंबी-लंबे भाषण देकर रेंज बढ़ाने की कोशिश करता था. ये सही बात है कि मेरी आवाज़ कई लोगों को भाती है. आपको एक घटना सुनाता हूँ.

मैं एक समय अमरीका के हडसन में इस्माइल मर्चेंट के यहाँ ठहरा था और मेरी पत्नी साथ थी. मेरी पत्नी ने एक दिन और रुकने की इच्छा जताई. मैने जब टिकट की तारीख़ बढ़वाने के लिए जब न्यूयॉर्क एयरपोर्ट फ़ोन किया तो किसी विदेशी लड़की ने फ़ोन उठाया और मेरी आवाज़ सुनने के बाद कहा कि ओमपुरीजी मैने आपकी ईस्ट इज ईस्ट और सिटी ऑफ़ ज्वॉय भी देखी है. आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है.

उसने सिर्फ़ इतना ही नहीं किया. हमारी बिज़नेस क्लास की टिकट थी, जब हम बिज़नेस काउंटर पहुँचे तो पता चला कि हमारी टिकट अपग्रेड कर पहली श्रेणी का कर दिया गया था.

आपने सभी तरह के किरदार निभाएं हैं. आने वाले समय में ओमपुरी किस तरह के किरदार करना चाहेंगे?

मैं अच्छा से अच्छा किरदार करना चाहूँगा. मैं आक्रोश, अर्धसत्य, आघात, द्रोहकाल जैसी फ़िल्में नहीं कर पा रहा हूँ. ये मुझे तकलीफ़ देता है. उम्मीद करता हूँ कि आने वाले समय में ऐसी फ़िल्में फिर बनने लगें और मुझे काम करने का मौका मिले.

ऐसा क्यों हो गया है. अब तो पैसा है. बड़ा कैनवास है?

मुझे लगता है, क्योंकि फ़िल्में महंगी हो गई हैं. छोटी से छोटी फ़िल्म के लिए भी तीन-चार करोड़ रुपये चाहिए. मैं उन फ़िल्मों को ऐसे देखता हूं जैसे अखबार का संपादकीय. अख़बार की हैडलाइन सभी पढ़ते हैं, लेकिन संपादकीय कोई-कोई. इसका मतलब ये नहीं कि संपादकीय बंद हो जाना चाहिए. क्योंकि उसे कुछ लोग तो पढ़ते हैं. वैसे ही जो फ़िल्में जो समाज और हमारे बारे में बात करती हैं, बनती रहनी चाहिए.

दिक्कत ये है कि फ़िल्में बनाने वाले लोग इसे आर्ट से ज़्यादा बिज़नेस मानते हैं. 1950 और साठ के दशक में फ़िल्म बनाने वाले अधिकतर लोग थिएटर से आए थे, लेखक और संगीतकार थे. जैसे-जैसे वक़्त आगे बढ़ा यहाँ ऐसे लोग आए जो इसे बिज़नेस के नज़रिये से देखते थे. बिज़नेसमैन का नज़रिया ये है कि क्या मसाला डालें कि फ़िल्म हिट हो और ज़्यादा मुनाफ़ा मिले.

कोई खूबसूरत अभिनेत्री जिसके साथ आप रोमांटिक भूमिका करना चाहते हों और अभी तक नहीं कर सके हों?

मुझे तो अपनी ही उम्र की ढूंढनी पड़ेंगी.

क्यों साहब ऐसी तो कोई बंदिश नहीं है?

मैं अभी 57 साल का हूँ. इसलिए मैं तो रेखा या डिंपल के साथ ही डांस करना चाहूँगा. वे मेरी हमउम्र होंगी या फिर छोटी कहलाना चाहती होंगी.

और अभी की अभिनेत्रियों में?

मैं माधुरी दीक्षित को पसंद करता हूँ. मुझे रानी मुखर्जी, कोंकणा सेन भी पसंद हैं. वे शानदार अभिनेत्रियां हैं.

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