एक मुलाक़ात रघु राय के साथ

By संजीव श्रीवास्तव

रघु राय अपने छायाचित्रों के लिए दुनियाभर में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं
इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं, बहुत प्रतिभाशाली, जानी मानी शख़्सियत, कैमरे के जादूगर और दिलचस्प तस्वीरों को अपने कैमरे में क़ैद करने वाले रघु राय.

इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं, बहुत प्रतिभाशाली और जानी मानी शख्सियत और दिलचस्प तस्वीरों को अपने कैमरे में क़ैद करने वाले रघु राय.

सबसे पहले ये बताएँ, आपको फ़ोटोग्राफ़ी को करियर बनाने की कैसे सूझी?

दरअसल, हम पंजाब के रहने वाले हैं. सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने के बाद पंजाब में एक साल सरकारी नौकरी भी की, लेकिन नौकरी में मज़ा नहीं आया. तब मैं अपने भाई एस पॉल के साथ दिल्ली में रहने आया. वहाँ देखा कि भाईसाहब और उनके दोस्त हर समय फ़ोटोग्राफ़ी, कैमरा, लेंस की बातें किया करते थे. भाई साहब के एक मित्र योग जॉय अपने गाँव जा रहे थे तो मैंने कहा कि मैं भी आपके साथ जाना चाहता हूँ. मैने भाईसाहब से एक कैमरा माँगा और गाँव चल दिया. गांव पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई थी. वहाँ मैं गधे के एक छोटे से बच्चे की तस्वीर लेना चाहता था, लेकिन वो भाग गया. मैंने उसका पीछा किया और थक हारकर जब वो रुक गया तो मैंने तस्वीर खींच ली. जो बाद में लंदन टाइम्स में छपी.

पहली तस्वीर ही लंदन टाइम्स में छप गई?

जी. देखिए आज बच्चों में बचपन से ही प्रोग्रामिंग फिट कर दी जाती है. मेरे साथ मसला दूसरा था. न मेरा फ़ोटोग्राफ़र बनने का कोई इरादा था. मुझ पर फ़ोटोग्राफ़र बनने का कोई दबाव नहीं था. क्रिएटिविटी अनुभव करने, महसूस करने से पैदा होती है, नॉलेज़ से कुछ नहीं होता.

एक मुलाक़ात का सफर आगे बढ़ाएं, अपनी पसंद के कुछ गाने बताएँ?

'दिल तड़प-तड़प के कह रहा है..' मुझे काफ़ी पसंद है. इसके अलावा 'कल हो न हो', 'ये दिल दीवाना दिल' भी मुझे काफ़ी पसंद हैं.

आपकी लगभग सभी तस्वीरें भारत से जुड़ी हैं. आप जाने-माने अंतरराष्ट्रीय फ़ोटोग्राफ़र हैं, ऐसे में आपने ख़ुद को भारत तक ही क्यों सीमित रखा?

मैं जब 20-22 साल का था. एक ग़ज़ल सुना करता था, 'किसी इंसां को अगर, एक भी इंसां की अगर, सच्ची बेला की मोहब्बत कहीं हो जाए नसीब...'. एक ही देश में एक ही धरती पर मेरी दुनिया मिल जाए तो मुझे क्या चाहिए. और हिंदुस्तान को समझने के लिए मुझे कई जन्म चाहिए.यूं तो दुनिया में रोम, एडिनबरा, पेरिस कई खूबसूरत शहर हैं, लेकिन भारत की बात ही अलग है. मुझे अपने देश से प्यार है, तो फिर मुझे बाहर भटकने की क्या ज़रूरत है.

दिल्ली में मेरे भाईसाहब और उनके दोस्त हर समय फ़ोटोग्राफ़ी, कैमरा, लेंस की बातें किया करते थे. भाई साहब के एक मित्र योग जॉय अपने गाँव जा रहे थे तो मैंने कहा कि मैं भी आपके साथ जाना चाहता हूँ. मैने भाईसाहब से एक कैमरा माँगा और गाँव चल दिया. गाँव पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई थी. वहाँ मैं गधे के एक छोटे से बच्चे की तस्वीर लेना चाहता था, लेकिन वो भाग गया. मैंने उसका पीछा किया और थक हारकर जब वो रुक गया तो मैंने तस्वीर खींच ली. जो बाद में लंदन टाइम्स में छपी
आपने लोगों, शहरों की रौनक की जीवंत तस्वीरें ज़्यादा ली हैं, पहाड़, नदियों की तस्वीरों में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. इसके पीछे कोई ख़ास वजह ?

इसमें दो बातें हैं. जो चीज़ खूबसूरत है, वो तो है ही. उसमें खोजने के लिए नया कुछ नहीं है. प्रकृति का कोई नया अंदाज या नया अनुभव अगर आपके कैमरे में क़ैद नहीं हुआ जो आपको रोमांचित कर दे, जागरूक कर दे, तो उस तस्वीर का क्या.

मैं जल्द ही फ़ोटो पत्रकारिता में आ गया था. पत्रकारिता लोगों, संस्कृति, देश से जुड़ा पेशा है. मैंने महसूस किया कि मैं तो इनमें से एक हूँ तो मैं इन्हें अलग कैसे कर सकता हूँ.

आपकी फ़ोटो पत्रकारिता की बेहतरीन तस्वीर जो भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ी है. उसके बारे में कुछ बताएँ?

दरअसल, तस्वीर एक बच्चे की थी, जिसे दफ़नाया जा रहा था. मरने वालों की तादाद इतनी थी कि अलग-अलग क़ब्रों के लिए जगह नहीं थी. दो-तीन लाशों को एक ही क़ब्र में दफ़नाया जा रहा था. इसी तरह की एक क़ब्र में तीन बच्चों को दफ़नाया जा रहा था. एक बच्चे की आँखे खुली हुई थीं और उस पर मिट्टी डाली जा रही थी, तभी मैंने उसकी तस्वीर क़ैद कर ली. इस तस्वीर को जिसने भी देखा, झकझोर दिया कि ऐसा क्यों हुआ...? वैसे तस्वीर का बखान शब्दों में नहीं किया जा सकता.

आम आदमी की आपने अलग-अलग अंदाज़ में तस्वीरें ली हैं. क्या सोचते हैं जब आप आम आदमी के तस्वीर उतारने निकलते हैं?

मैं करीब 20 साल तक पत्रकारिता में रहा. मैंने मदर टेरेसा और इंदिरा गांधी पर किताबें लिखीं. बड़े समारोहों, बड़े लोगों की तस्वीरें ली. इनकी तस्वीरें तो मिल ही जाती हैं, लेकिन संवेदनशीलता और आपके नज़रिए की परीक्षा वहाँ होती है, जब आपको रोजमर्रा के जीवन की तस्वीर उतारनी होती है.

ये भी सच है भारत में अधिकांश लोग गांवों में रहते हैं और अधिकांश लोग सामान्य जीवन जी रहे हैं. उनके जीवन में ऐसा क्या है जो वे अपने जीवन को इतने उत्साह के साथ और आत्मसम्मान के साथ जी रहे हैं. तो फिर उन्हें कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.

क्रिकेट और सिनेमा में आपकी दिलचस्पी नहीं रही?

इंदिरा गांधी के कई ऐसे चित्र रघुराय ने खींचे जो ख़ासे प्रसिद्ध हुए

नहीं ऐसा नहीं है. मैं क्रिकेट को बहुत चाव से देखता रहा हूँ. जब सक्रिय पत्रकारिता में था तो रिलायंस विश्वकप पर किताब भी निकाली थी. भूमंडलीकरण के बाद इसमें इतना पैसा आ गया कि अब तो क्रिकेटर भी बिकने लगे हैं. मुझे ये बहुत ख़राब लगा. सचिन तेंदुलकर, रिकी पोंटिंग और दुनिया के तमाम क्रिकेटरों की नीलामी लग रही है. एक तरह से क्रिकेटर की धज्जियां उड़ा दी गईं.

लेकिन क्रिकेट का ये स्वरूप लोकप्रिय तो बहुत हुआ?

देखिए कचरा भी लोकप्रिय होता है. अब हिंदी सिनेमा को ही लीजिए. मैंने हाल ही में शाहरुख़ की 'देवदास' देखी. ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित बहुत सुंदर दिखीं, सेट लाज़वाब थे. लेकिन सब बेवकूफी. मेरी राय में शाहरुख़ ख़ान देवदास की भूमिका में कतई फिट नहीं बैठते.

अब 'लगान' को ही ले लीजिए. एक भारतीय होने के नाते ये कहानी मेरी लिए क़ीमती है, लेकिन विश्व सिनेमा के हिसाब से देखें तो पता चलेगा कि हम कहाँ हैं. फिर न जाने किस उम्मीद के साथ हम इसे ऑस्कर के लिए भेजते हैं.

मनोरंजित और आनंदित होना दोनों अलग-अलग बातें हैं. आप आखिरकार कब तक मनोरंजित होते रह सकते हैं. फिर चाहे कहानी गंभीर हो, फिर भी आप कहें कितनी आनंदित फ़िल्म है.

क्यों आप इसे भौंडा मानते हैं, इसलिए आप सिनेमा और क्रिकेट में नहीं उलझे ?

नहीं मैं यह नहीं कहूँगा कि सारा ही सिनेमा भौंडा है. देखिए, हिंदुस्तानी दिमाग बहुत तेज़ और चीज़ों को समझने वाला है. लेकिन चीज़ों को इस्तेमाल करना अच्छा नहीं है. कुछ फ़िल्मों में कई डांस स्टेप्स बेहतरीन होते हैं, लेकिन इसे पूर्णता में देखें तो बेवकूफ़ाना लगता है.

और माफ़ कीजिएगा. क्रिकेट भी कुछ इसी श्रेणी में है. सचिन तेंदुलकर बेहतरीन खिलाड़ी और अच्छे इंसान हैं. लेकिन ये पैसा कमाने में लगे हुए हैं और मेरी राय में ये भ्रष्टाचार का ही एक रूप है. लोग इनके खेल पर निगाहें जमाए रहते हैं और ये लोग क्या करते हैं. देर रात तक पार्टियां करते हैं, शूटिंग करते हैं.

आपके रोल मॉडल?

मदर टेरेसा से मैंने काफ़ी कुछ सीखा, वो मेरे लिए बहुत आदरणीय थी. फ़ोटोग्राफी में मैं हैंडीकार्टिए जैसों को महान फ़ोटोग्राफ़र मानता हूँ. लेकिन मेरे आदर्श एक ही थे और वो थे चाचा ग़ालिब, वह कहते हैं 'रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल, जो आंख से न टपके, वो लहू क्या है.'

इंदिरा गांधी जब अपने कद और रूतबे में चरम पर थी तब आप उनके काफ़ी क़रीब रहे. उनके बारे में कुछ बताएँ?

दिलचस्प बात ये है कि जब इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री बनीं थी लगभग तभी मैंने भी अपना करियर शुरू किया था. मैंने इंदिरा गांधी पर अपनी तीसरी किताब में उनके साथ जुड़ी छोटी-छोटी बातों का जिक्र किया भी है. जब उनकी हत्या हुई तो मैं इंडिया टुडे में था और हमने विशेष संस्करण निकाला था.

रघु राय ने लगभग 20 साल तक एक फ़ोटो पत्रकार के रूप में काम किया है.

इंदिरा गांधी की ख़ासियत थी कि वे पेशेवर और कमिटेड लोगों की कद्र करती थी. इंदिरा जी कला और संस्कृति को बहुत महत्व देती थी. उन्हें इतना पता होता था कि फ़ोटोग्राफ़र किस कोण से उनकी फ़ोटो खींच रहा है.

फिर जब उन्होंने आपातकाल लागू किया तो हम उनसे नाराज़ भी हुए और वह चुनाव भी हार गईं.

चुनाव हारने के बाद आपने इंदिराजी में कुछ फ़र्क देखा?

बहुत फ़र्क देखा. चुनाव हारने के बाद मैंने कई बार उनकी तस्वीरें उतारने की कोशिश की, लेकिन मैंने पाया कि वो बेहद असुरक्षित हो गई थीं. जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ आया तो उन्हें जेल में डाल दिया गया. वो बहुत मुश्किल दौर में थीं. लोग संजय गांधी को लेकर तरह-तरह की बातें करते हैं, लेकिन हक़ीकत यह है कि परिवार में सिर्फ़ संजय ही थे जो उनकी मदद कर सकते थे. ऐसा नहीं था कि वे अपने बेटे के लिए बहुत कुछ करना चाहती थी.

लेकिन अगर पीछे मुड़कर देखें तो इंदिरा जी आज के नेताओं से कई गुना बेहतरीन नेता थीं.

मदर टेरेसा के बारे में क्या कहेंगे?

मदर टेरेसा माँ थीं. दुनिया में हम ख़ुद को साबित करना चाहते हैं. वो सामान्य महिला थीं, लेकिन मदर टेरेसा ने माँ की नई परिभाषा दी. वो ऐसी शख़्सियत थीं जो प्यार से किसी को भी जीत सकती थीं. क्या आप नहीं मानते कि सद्दाम हुसैन हों, बिल क्लिंटन या फिर अटल बिहारी वाजपेयी. वो जिस किसी को भी फ़ोन करती, वे निश्चित तौर पर उनसे बात करने में खुश होते.

कोई ख़ास यादगार?

बहुत सारी यादें हैं. मैं जब पहली बार उनकी तस्वीर उतारने गया. तीन-चार दिन से मैं उनकी तस्वीरें ले रहा था. फिर उन्होंने मुझसे कहा कि आप कल नहीं आएँ क्योंकि कल ईस्टर है. उन्होंने कहा कि वे नहीं चाहतीं कि प्रार्थना के दौरान कोई फ़ोटोग्राफ़र बीच में घूमते फिरें.

लेकिन मदर में एक अच्छी बात थी कि अगर उन्हें लगता था कि आप बहुत कमिटेड हैं तो बात अलग हो जाती थी. मैंने उनसे कहा कि आप ग़रीबों को संभालती और उनकी देखभाल करती हैं और बाद में उनके लिए प्रार्थना करती हैं. मैंने तो गॉड को कभी नहीं देखा, लेकिन महसूस किया कि जब आप प्रार्थना करती हैं, तो वे दिखाई देने लगते हैं. उन्होंने कहा कि एक शर्त पर आ सकते हो कि एक ही जगह पर बैठकर तस्वीरें उतारोगे. मेरी मुश्किल थी कि हिले बग़ैर फ़ोटो कैसे खीचूँ. लंबे अंतर्द्वंद्व के बाद मैं आगे बढ़ा और अलग-अलग कोणों से तमाम तस्वीरें खींच दी.

जब मदर ईसा मसीह के पैर चूमने के लिए उठीं तो मैं भी उठा और तस्वीरें उतारीं. बाद में मैंने मदर से कहा कि मुझे माफ़ कर दीजिए मैं अपना वादा पूरा नहीं कर सका. जानते हैं मदर का जवाब क्या था-ईश्वर ने तुम्हें ये काम दिया है, तुम्हें ये काम अच्छी तरह से करना चाहिए.

जब मदर के इतने नज़दीक होते थे तो क्या ऐसा लगता था कि किसी संत के पास हैं ?

मदर के पास जाने से बहुत ऊर्जा मिलती थी. जब हम उन्हें किताब देने गए तो वो काफ़ी अस्वस्थ रहने लगी थीं और लोगों से कम ही मिलती-जुलती थीं. हम सिस्टर्स के पास गए और कहा कि मदर को ये किताब देनी है. सिस्टर्स ने हमें बताया कि डॉक्टर आ रहे हैं और अगर वह इजाज़त देते हैं तभी मदर बाहर आएँगी.

मैं ये कहना चाहता हूँ कि जब कोई संत रोज सैकड़ों-हज़ारों लोगों से मिलता है तो उसकी ऊर्जा में कुछ कमी आती है, लेकिन मदर के साथ ऐसा नहीं था. जब वो व्हीलचेयर पर बाहर आईं तो उनके चेहरे के नूर से मैं चौंधिया गया.

जीवन में रस का ज़्यादा महत्व है कि दर्शन का ?

मेरी राय में दोनों का महत्व है. जीवन के हर सफर में कुछ न कुछ अनुभव मिलता है, कहानी मिलती है, कोई न कोई संदेश मिलता है. लेकिन रस और दर्शन बहुत कम होता है.

रघु राय की शख़्सियत में कुछ ऐसी बात भी है कि वो वास्तव में बहुत रोमांटिक हैं और लोग उन पर फ़िदा रहते हैं. पिछले दिनों जब आपकी प्रदर्शनी का शुभारंभ हो रहा था तो अंबिका सोनी ने भी कहा था कि हम लड़कियाँ देखती रह जाती थीं कि वह हैंडसम लड़का कौन है जो इंदिरा गांधी की तस्वीरें उतार रहा है ?

उम्र और समय किसी को माफ़ नहीं करता. रचनात्मक व्यक्ति की एक सबसे बड़ी ताक़त ये होती है कि आप जितनी ऊर्जा ख़र्च करते हैं, उससे अधिक ऊर्जा और ज़िंदादिली उन्हें कला और रचनाशीलता से मिलती है. ठीक है क्रिएटिव ऊर्जा कायम रहती है, लेकिन उम्र का असर तो फिर भी होता ही है.

उम्र और समय किसी को माफ़ नहीं करता. रचनात्मक व्यक्ति की एक सबसे बड़ी ताक़त ये होती है कि आप जितनी ऊर्जा ख़र्च करते हैं, उससे अधिक ऊर्जा और ज़िंदादिली उन्हें कला और रचनाशीलता से मिलती है. ࢠीक है क्रिएटिव ऊर्जा कायम रहती है, लेकिन उम्र का असर तो फिर भी होता ही है
मदर टेरेसा और इंदिरा गांधी के अलावा फ़ोटो पत्रकारिता के दिनों की और कौन सी बड़ी घटना थी?

जेपी मूवमेंट. मैं बिहार में जयप्रकाश नारायण के साथ काफ़ी घूमा. आंदोलन के दौरान में मैं स्टेट्समैन अख़बार के साथ था. उन पर लाठीचार्ज हुआ था, लेकिन गृह मंत्री ने इसका खंडन किया. जब अगले दिन स्टेट्समैन में पहले पन्ने पर लाठीचार्ज की तस्वीरें छपी तो गृह मंत्री को संसद में माफी मांगनी पड़ी. मेरी इन तस्वीरों से जयप्रकाश नारायण बहुत प्रभावित हुए थे और इसके बाद वो मुझे बड़े प्यार से लोगों से मिलाते थे.

आपने ताज की भी बहुत ख़ूबसूरत तस्वीरें खींची हैं ?

अब देखिए. ताज तो है ही ख़ूबसूरत. एक परंपरा सी बन गई थी कि जो भी आता ताज के सामने फ़ोटो खिंचवाता था. लेकिन अहम बात ये है कि ताज भारत में है, उसकी जो सामाजिक-सांस्कृतिक महत्ता है उसे दर्शाना बड़ी बात थी. जब आप किसी विषय पर काम करते हैं तो ये ज़रूरी है हालात को समझना ज़रूरी है.

आप हमेशा कैमरा अपने साथ रखते हैं?

हां, हमेशा. यहाँ भी लेकर आया हूँ. कहते हैं कि मौत का और तस्वीर के क्षण का कोई ऐतबार नहीं. कहीं भी मिल सकती है.

और भारत में आजकल जिस तरह की फ़ोटोग्राफ़ी हो रही है, उनके बारे में क्या राय है?

मैं फिर वही कहूँगा, सभी प्रोग्रामिंग मशीन की तरह काम कर रहे हैं. जिस तरह का काम हो रहा है वो देखकर दुख होता है. एक बार मैं एक फ़ोटो प्रदर्शनी देखने गया तो लोगों ने मेरी टिप्पणी जाननी चाही. मैंने कहा कि इसमें युवाओं का जोश ग़ायब है. प्रिंट बेशक अच्छे हैं, लेकिन जो सामग्री है, उनमें कोई दम नहीं है.

आपकी नज़र में फ़ोटोग्राफ़ी का क्या महत्व है?

इसके कई जवाब हो सकते हैं, लेकिन मेरे लिए फ़ोटोग्राफ़ी का उद्देश्य बहुत सरल है और मैं इसके क़रीब ही जीना चाहता हूँ. फ़ोटोग्राफ़ी यूरोप में करीब 150-160 साल पहले शुरू हुई. ठीक इसी समय भारत में भी शुरुआत हुई. कोलकाता में दो ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़रों वार्न और शेफर्ड ने स्टूडियो बनाया और ब्रिटिश साम्राज्य के लिए तस्वीरें उतारनी शुरू की.

अब महत्ता की बात करें देखिए 150 साल पहले एक अच्छे फ़ोटोग्राफ़र ने चौरंगी स्क्वॉयर की तस्वीर खींची और एक पेंटर ने पेंटिंग बनाई. उन तस्वीरों को जब आज देखते हैं तो हर कोई ताज्जुब करता है कि तब का नज़ारा कैसा हुआ करता था. इतिहास फिर से लिखा जा सकता है, लेकिन फ़ोटो इतिहास को दोबारा नहीं लिखा जा सकता.

आपने कुछ विवादास्पद तस्वीरें भी खींची हैं. आपकी पसंदीदा?

देखिए आपने ये सवाल अगर मुझसे 20 साल पहले पूछा होता तो मेरे लिए जवाब देना आसान होता, लेकिन आज की तारीख में इसका जवाब देना मुश्किल है.

जब मैं शुरू में अख़बार से जुड़ा था तो वहाँ तस्वीरों को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाता था. तब हमारे संपादक कहते थे कि हमारे पास दो छोटी-छोटी तस्वीरों की ही जगह है. लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारता था. दिलोजान से काम करता था. मेहनत से तस्वीरें खींचता था और फ़ोटो प्रिंट बनाता था. जब मैं फ़ोटो प्रिंट लेकर उनके कमरे में पहुँचता था वो दूर से देखकर ही कहते थे कि इतना बड़ा प्रिंट क्यों लाए. फिर थोड़ी की ना-नुकर के बाद आखिर फ़ोटो छप ही जाता था.

दूसरे किन हिंदुस्तानी फ़ोटोग्राफ़रों ने आपको प्रभावित किया है?

रघुवीर सिंह, दयानिता सिंह अच्छे फ़ोटोग्राफ़र हैं. लेकिन इतने बड़े मुल्क में गिने-चुने फ़ोटोग्राफ़र, कितने दुख की बात है.

अच्छा आपने इंदिरा गांधी, मदर टेरेसा की बात की. आज के भारत में और कौन से शख्सियत हैं, जिन्हें आप कैमरे में क़ैद करना चाहते हों?

फ़ोटोग्राफ़र के लिए लालू प्रसाद यादव अच्छी शख्सियत हो सकती हैं. लेकिन सच कहूँ तो ऐसी कोई शख्सियत नहीं है जो दिल को छूकर आसमान तक पहुँचाती हो. दुख की बात ये है कि राजनीति में अब उम्मीद ही नज़र नहीं आती. देश की तरक्की के लिए अच्छे लोग ही काफ़ी नहीं हैं. ऐसे लोगों की ज़रूरत है जिनके पास दूरदर्शी सोच हो और कुछ कर दिखाने का जज़्बा हो.

इतना लंबा सफ़र तय करने के बाद अब अगली मंजिल क्या है?

दर्शन पाने की अभिलाषा है. दो बातें हैं. जब आप साक्षात किसी दृश्य को देखते हैं तो उसे आप क़ैद कर सकते हैं, तो वो फ़ोटोग्राफ़ है. लेकिन सब कुछ आप देख नहीं सकते. वैसे ही पूर्णता हासिल करना हर इंसान की अभिलाषा होती है.

('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी -- मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.)

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