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    डबिंग कलाकारों को कब मिलेगी पहचान

    By हरिचरण पुडिपेड्डी
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    सिनेमा की मौजूदा 24 कलाओं में डबिंग कला का यदि कोई स्थान है, तो डबिंग कलाकारों की मुख्यधारा के कलाकारों में गिनती क्यों नहीं होती। क्यों डबिंग कलाकारों को अपनी मेहनत और पेशेवर काम के लिए दान स्वरूप मेहनताना दिया जाता है।

    बहुत ही कम देखा जाता है कि फिल्म कलाकारों को अपनी आवाज देने वाले किसी डबिंग कलाकार की अपनी पहचान हो।

    लगभग 700 तेलुगू फिल्मों में डबिंग कलाकार का काम कर चुकीं सुनीता उपाद्रस्था ने आईएएनएस को बताया, "यहां कोई हमारे काम की कीमत और मेहनत को नहीं समझता। किरदार के साथ पूरा न्याय करने के लिए हमें भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। संवाद सीधे-सपाट नहीं होते, हमें रोना भी पड़ता है, अलग-अलग शैली में संवाद बोलने पड़ते हैं और इस सबके बावजूद हमें प्रतिघंटे के हिसाब से मेहनताना दिया जाता है।"

    कई डबिंग कलाकार तो पूर्णकालिक पेशे के रूप में भी डबिंग का काम करते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें किसी भी समय काम पर जाना पड़ता है।

    सुनीता अब तक नयनतारा, कामालिनी मुखर्जी, श्रीया और सोनाली बेंद्रे के लिए फिल्मों में अपनी आवाज दे चुकी हैं। फिल्म 'जलसा' में अभिनेत्री इलियाना डीक्रूज के लिए अपनी आवाज दे चुकीं अभिनेत्री स्वाति रेड्डी कहती हैं कि हमें पश्चिमी सिनेमा जगत से सीखने की जरूरत है।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

    English summary
    Does dubbing have a place in the 24 crafts of cinema? If yes, then why is that regardless of spending hours mouthing dialogues, crying, laughing and even dramatizing, most dubbing artists walk home with a pittance.
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