'फिल्मों में धूम्रपान के दृश्य हो सकते है'

फिल्मों में धूम्रपान के दृश्यों को प्रतिबंधित करने की केंद्र सरकार की अधिसूचना को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। सरकार ने अक्टूबर 2006 में अधिसूचना जारी कर अखबारों में धूम्रपान का विज्ञापन छापने व फिल्मों में धूम्रपान का दृश्य दिखाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
जिसपर जाने-माने बालीवुड निर्देशक महेश भट्ट ने सरकार के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया है। इस मुद्दे पर सरकार का कहना है कि वह मामले का अध्ययन करने के बाद कोई निर्णय लेगी।
पीठ ने कहा कि धूम्रपान एक तरह की आदत है। जो संबंधित व्यक्ति की सेहत को नुकसान पहुंचाने के अलावा आसपास के लोगों को भी नुकसान पहुंचाता है। यह अलग मुद्दा है। इस पर बहुत बड़े स्तर पर बहस जारी है।
जहां तक फिल्मों की बात है, कई फिल्में जीवन की सच्चाई को दर्शाती हैं। धूम्रपान भी एक तरह से जीवन की सच्चाई है। उसे इस प्रकार से कानूनन नहीं हटाया जा सकता है। पीठ ने कहा कि डायरेक्टर कलाकारों के जरिए फिल्मों में जीवन की सच्चाई को दिखाने की कोशिश करता है।
कई फिल्में शिक्षाप्रद भी होती हैं और नकारात्मक जीवन शैली भी दिखाती हैं। संविधान में जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता दी गई है, उस पर इस प्रकार से रोक नहीं लगाया जा सकता है। फिल्मों में धूम्रपान का दृश्य दिखाए जाने पर प्रतिबंध लगाने से यह फिल्म निर्माताओं की अभिव्यक्ति के मूल अधिकारों का उल्लंघन होगा।
पीठ ने कहा कि फिल्मों पर नजर रखने के लिए सेंसर बोर्ड का गठन किया गया है। जिसके अपने गाइड लाइन होते हैं। सेंसर बोर्ड की अनुमति के बगैर कोई भी फिल्म रिलीज नहीं होती है। इसलिए इस पर अलग से कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है। डायरेक्टरों पर तरह-तरह के प्रतिबंध नहीं लगाए जाने चाहिए। अखबारों में भी विज्ञापन छापने पर प्रतिबंध लगाना धारा 4 का उल्लंघन है।


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