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    आदीपुर, जहाँ पूजे जाते हैं चार्ली चैपलिन

    By Ankur Sharma
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    सौतिक बिस्वास

    बीबीसी संवाददाता, आदीपुर से

    पश्चिम भारत के गुजरात राज्य का एक छोटा सा कस्बा आदीपुर मशहूर अभिनेता चार्ली चैपलिन के बहुरुपियों का स्वर्ग है.

    अप्रैल की चिलचिलाती गर्मी में क़रीब एक सौ इस लोग इस छोटे से कस्बे में चार्ली चैपलिन का जन्मदिन मनाने के लिए जमा हुए थे.

    इनमें लड़के-लड़कियाँ, महिला-पुरुष, जवान-वृद्ध थे और मजबूत और कमजोर यानी की सभी तरह के लोग शामिल थे.

    भगवान चार्ली चैपलिन

    इन लोगों ने चार्ली चैपलिन की तरह टूथब्रश जैसी मूंछ, टोपी और काला शूट पहनकर और हाथों में छड़ी लेकर आदीपुर की सड़कों पर एक जुलूस निकाला.

    चार्ली चैपलिन का सिनेमा उन्हें आपस में जोड़ता है. इनमें से अधिकांश लोग चार्ली चैपलिन फ़ैन क्लब ‘चार्ली सर्कल’ के सदस्य हैं.

    इसकी स्थापना 1973 में अशोक आसवानी ने की थी. वे 1966 में चार्ली चैपलिन की फ़िल्म ‘दी गोल्ड रश’ देखकर उनके दीवाने हो गए थे.

    यह क्लब 1973 से हर साल अप्रैल में चार्ली चैपलीन का जन्मदिन मनाता आ रहा है.

    जुलूस में शामिल बहुरुपिए सड़क पर चार्ली चैपलिन की तरह डगमगाते हुए चल रहे थे और एक स्थानीय गायक के गाए हिंदी फ़िल्मी गीतों पर उछल-कूद रहे थे.

    जुलूस के बीच में पारंपरिक रंगीन कपड़े पहन कर चल रही लड़कियाँ गरबा कर रही थीं.

    जुलूस के साथ चल रही दो ऊंट गाड़ियों में से एक पर चार्ली चैपलिन बने छोटे बहुरुपिए बैठे हुए थे.

    फ़िल्म का जादू

    वहीं दूसरी गाड़ी पर चैपलिन की एक छोटी सी प्रतिमा और एक बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ था और हिंदू पुजारी मंत्र पढ़ते हुए उसकी पूजा और आरती कर रहे थे.

    इस क्लब के सदस्य और बस कंडक्टर 52 साल के किशोर भावसार ने अपने प्रिय अभिनेता के लिए एक गीत भी लिखा है. जिसके बोले कुछ इस प्रकार हैं, ‘आवारा मर चुका है, आवारे को लंबी उम्र मिले’

    वे कहते हैं कि 1925 में बनी चार्ली चैपलिन की फ़िल्म 'द गोल्ड रश' ने उनकी ज़िंदगी बदलकर रख दी. इसमें उन्हें अलास्का के बर्फीले जंगलों में भाग्य का पीछा करते हुए दिखाया गया है.

    जुलूस के शोर-शराबे में भावसार चीखते हुए कहते हैं, ''चैपलिन दुखों को सहन कर आपको हँसाते हैं, वे कहते हैं, मैं अपने आँसू छिपाने के लिए बारिश में चलता हूँ, वह एक कवि थे.''

    करीब 70 साल के अरुनजी भीमजी फारिया बस चालक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. वे कहते हैं, ‘‘यह एक ऐसा दिन है जिसका हमें पूरे साल इंतजार रहता है. कई मायनों में यह हमारा सबसे बड़ा महोत्सव है.’’

    फारिया ने चैपलिन की एक मूक फ़िल्म पहली बार 12 वर्ष की आयु में कराची में देखी थी जहाँ वे पैदा हुए थे.

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