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    पोस्टर्स में बॉलीवुड

    By Ankur Sharma
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    फ़िल्मों के प्रचार के लिए आज भले ही टीवी, रेडियो, इंटरनेट, और मोबाइल का बोलबाला है लेकिन एक समय था जब इसके लिए पोस्टर्स का इस्तेमाल होता था. लेकिन आज पोस्टर्स का प्रचलन ख़त्म हो गया है.

    हिंदी फ़िल्मों के पोस्टर्स के बारे में जानकारी देती है किताब ‘बॉलीवुड इन पोस्टर्स’ जिसका हाल ही में विमोचन हुआ.

    किताब लिखी है पत्रकार और फ़िल्म इतिहासकार एस एम एम औसाजा ने. किताब का विमोचन अमिताभ बच्चन ने किया जिन्होंने किताब की प्रस्तावना भी लिखी है.

    एस एम एम औसाजा से बीबीसी संवाददाता शाश्वती सान्याल ने बातचीत की.

    औसाजा कहते हैं, “अमिताभ बच्चन को मैंने इसलिए भी चुना क्योंकि मैं मानता हूं कि पिछले तीस-चालीस साल में इंडस्ट्री में उनसे बड़ा कोई स्टार नहीं है. उनके हाथ से किताब रीलीज़ होना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है.”

    किताब के बारे में औसाजा बताते हैं, “ये पहली किताब है जिसमें हिंदी सिनेमा की 1931 में आई पहली बोलती फ़िल्म ‘आलमआरा’ से आजतक की यादगार फ़िल्मों के पोस्टर्स शामिल है. तब से अब तक हर दो साल की लगभग पांच फ़िल्में शामिल हैं.”

    औसाजा कहते हैं, “मैंने किताब इसलिए लिखी है कि लोगों को हमारे सिनेमा की संस्कृति और धरोहर के बारे में पता चले जो अब डूबता जा रहा है, किस तरह पुरानी तस्वीरें और पोस्टर्स ख़त्म हो रहे हैं और अगर इन्हें नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ियों को ये नज़र नहीं आएंगे.”

    औसाजा ने पोस्टर्स इकट्ठा करने की शुरुआत अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘कालिया’ से की. वो कहते हैं, “मैं सत्तर और अस्सी के दशक में बड़ा हुआ हूँ और अमिताभ बच्चन का फ़ैन हूं. पहले-पहले शौकिया तौर पर उनके फ़िल्मों के पोस्टर्स इकट्ठा करता था लेकिन बाद में सभी यादगार फ़िल्मों के पोस्टर्स इकट्ठा करने का फ़ैसला किया. धीरे-धीरे हाथ से बनने वाले पोस्टर्स ख़त्म हो गए और आज इसे एक आर्ट या पेंटिंग का दर्जा दिया गया है. इसलिए ज़रुरी है कि लोग जाने कि पहले कैसे पोस्टर्स बनते थे.”

    औसाजा आगे कहते हैं, “अस्सी के दशक में हाथ से पोस्टर बनाने की कला ख़त्म हो गई क्योंकि जबसे डिजिटल प्रिटिंग प्रैस और कम्प्यूटर आ गए तबसे लोग पोस्टर्स को बनाने के लिए उनका इस्तेमाल करने लगे.”

    इस किताब में पोस्टर्स के साथ ही फ़िल्म की और जानकारी भी शामिल है. औसाजा कहते हैं, “आठ साल की मेहनत के बाद ये किताब सामने आई है. 1930 और चालीस के दशक के पोस्टर्स को ढूंढ कर, उसे डिजिटाइज़ करके किताब में डालना अपने-आप में बहुत बड़ा काम था. इसके साथ उस फ़िल्म के निर्देशक, कलाकार, संगीतकार और गीतकार जैसी जानकारी भी दी है. साथ ही फ़िल्म के लोकप्रिय गाने भी बताए हैं क्योंकि गानों के बिना हिंदी फ़िल्म जगत अधूरा है.”

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