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बजट कम, लेकिन कमाई ज़्यादा

By Staff

अच्छी चल रही है फ़िल्म रॉक ऑन
हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए यह साल अभी तक मिला-जुला रहा है. लेकिन कुछ महीनों में जो बात सामने आई है, वह है कम बजट की फ़िल्मों का कमाल दिखाना.

ख़ान और बच्चन की इस इंडस्ट्री में अब नए कलाकार भी धूम मचाने लगे हैं और निर्देशक भी ये मानने लगे हैं कि बड़े नाम के बिना भी फ़िल्में सफल हो सकती हैं और ख़र्च भी कम आता है.

हाल फ़िलहाल कम बजट की सफल फ़िल्मों में नाम जुड़ा है रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म फूँक और अभिषेक कपूर की फ़िल्म रॉक ऑन.

इस साल कम बजट और बिना किसी मशहूर सितारों की जो फ़िल्में सफल हुई हैं, उनमें आमिर और जाने तू या जाने ना भी शामिल है. फ़िल्म जन्नत भी कम बजट की फ़िल्म थी.

सफलता

फ़िल्म रॉक ऑन और जाने तू या जाने ना की पब्लिसिटी तो काफ़ी हुई लेकिन रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म फूँक इन सबसे अलग साबित हुई. फूँक के कलाकारों का तो शायद ही कोई नाम जानता था.

कई बार बड़े-बड़े सितारों को फ़िल्मों में इसलिए साइन किया जाता है क्योंकि वितरकों में उनकी मांग ज़्यादा होती है. ऐसा इसलिए नहीं होता कि वे चरित्र के लिए फ़िट होते हैं
फूँक की सफलता से गदगद निर्देशक रामगोपाल वर्मा का मानना है कि इससे यही साबित होता है कि फ़िल्मों में ज़रूरत से ज़्यादा पैसा लगाना ही सब कुछ नहीं है.

रामगोपाल वर्मा कहते हैं, "कई बार बड़े-बड़े सितारों को फ़िल्मों में इसलिए साइन किया जाता है क्योंकि वितरकों में उनकी मांग ज़्यादा होती है. ऐसा इसलिए नहीं होता कि वे चरित्र के लिए फ़िट होते हैं."

हिंदी फ़िल्मों के समीक्षक तरण आदर्श का कहना है कि नया ट्रेंड काफ़ी सकारात्मक है. तरण कहते हैं, " थियेटर में अब नई कहानियों से सजी फ़िल्में देखने को मिल रही हैं. फूँक और रॉक ऑन में ए ग्रेड के कलाकार नहीं थे. लेकिन फ़िल्म की अच्छी कहानी ने सफलता में अहम भूमिका निभाई."

शुभ संकेत

फ़िल्म आमिर में प्रमुख भूमिका निभाने वाले राजीव खंडेलवाल भी इससे सहमत हैं. उनका कहना है कि बॉलीवुड में अब अच्छी स्क्रिप्ट वाली फ़िल्में आ रही हैं. जो शुभ संकेत हैं.

फ़िल्म आमिर भी बॉक्स ऑफ़िस पर सफल रही थी

हिंदी फ़िल्मों पर नज़र रखने वाले विनोद मिरानी का अपना तर्क है. वे कहते हैं, "छोटे बजट की फ़िल्म कम रिस्की होती हैं. इसलिए आज के दौर में निर्माता ऐसा करने से घबरा नहीं रहे."

उनका कहना है कि अगर ऐसी फ़िल्में चल जाती हैं तो निर्माता ख़ूब कमाई कर लेता है. विनोद मिरानी कहते हैं कि फूँक की लागत क़रीब दो करोड़ रुपए थी और अभी तक इस फ़िल्म ने लागत से पाँच गुना ज़्यादा की कमाई कर ली है.

इसी अर्थशास्त्र की बदौलत बड़े सितारों को लेकर फ़िल्में बनाने वाले रामगोपाल वर्मा जैसा बड़ा निर्देशक भी उन लोगों में शुमार हो रहा है जो कम बजट की फ़िल्मों में ही अपना दाँव लगा रहे हैं.

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