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    भूपेन हजारिका ने अपनी वसीयत कल्पना लाजिमी के नाम की

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    गुवाहाटी। कुछ रिश्तों की तस्वीर संदेह पैदा करती है, लेकिन सच्चाई क्या है ये तो वो ही जाने जिनके किस्से कहानियां बनते हैं। ताजा मसला प्रख्यात असमिया गायक व संगीतकार भूपेन हजारिका का है जिन्होंने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा हिस्सा लम्बे समय से उनकी साथी रहीं फिल्मकार कल्पना लाजमी के नाम लिख दिया है। वह अपने करियर में ऊंचाइयां छूने का श्रेय भी लाजमी को देते हैं लेकिन उनके इस निर्णय से उनके परिवार में नाराजगी है।

    हजारिका ने अपनी वसीयत में लिखा है, 'वर्ष 1977 से ही कल्पना लाजमी मेरी व्यवसायिक हिस्सेदार रही हैं। मेरे करियर में आए चढ़ाव की पूरी जिम्मेदारी उन्होंने उठाई और उनके मेरे साथ आने से पहले मेरे पास कुछ नहीं था और मेरे हाथ में सिर्फ 35 रुपये थे।" वह कहते हैं, "उन्होंने (लाजमी) 1977 से ही बहुत ईमानदारी से मेरी देखभाल की है। जब मैं बीमार था, तनाव में था, मानसिक अवसाद की अवस्था में था तब भी उन्होंने मेरा बहुत ध्यान रखा और उनके अलावा अन्य किसी ने ऐसा नहीं किया।"

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    हजारिका और लाजमी विवाहित हैं या नहीं, इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वैसे दोनों की उम्र में 28 साल का अंतर है। हजारिका ने अपनी फिल्म व टेलीविजन कम्पनियां, बैंक खाते और निजी कम्पनी खाते, निवेश, नकद राशि, सोने के आभूषण और भारत व दुनियाभर में फैली अपनी सम्पत्ति लाजमी के नाम लिख दी है।

    उन्होंने 12 दिसम्बर, 2003 को इस वसीयत पर हस्ताक्षर किए थे। जिसके मुताबिक वह कहते हैं, "मैं कल्पना लाजमी की ईमानदार मदद और सहयोग के बिना अपने बुरे और अवसाद से भरे समय से बाहर नहीं निकल सकता था। मेरे निधन के बाद वह मेरी वर्तमान सम्पत्ति की अकेली हकदार होंगी और भविष्य में भी जो सम्पत्ति इकट्ठी होगी उस पर भी उन्हीं का हक होगा।" दिलचस्प बात यह है कि वसीयत में कहा गया है कि यदि लाजमी की मौत उनसे पहले हो जाती है तो उनकी यह सम्पत्ति लाजमी की मां ललिता जी. लाजमी को मिलेगी। वैसे उन्होंने वसीयत में संयुक्त सम्पत्ति को अपने भाईयों, बहनों और बेटे के नाम भी लिखा है।

    हजारिका के छोटे भाई नृपेन ने आईएएनएस से कहा कि वह सोच भी नहीं सकते कि 1977 में उनके भाई के पास कुछ नहीं था क्योंकि वह तब तक राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके थे। उन्होंने संदेह जताया है कि यह वसीयत किसी के दबाव या प्रभाव में लिखी गई है।वैसे हजारिका के निधन के बाद ही यह वसीयत लागू होगी।

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