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    'काइट्स' की उड़ान

    By Ankur Sharma
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    भावना सोमाया, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक

    बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

    हिंदी सिनेमा में प्रेम कहानियां या तो प्यार के सफ़र के बारे में होती हैं या इज़हार के बाद आपसी रिश्तों की उलझनों के बारे में.

    ‘काइट्स’ प्यार के सफ़र के बारे में भी है और उलझनों के बारे में भी. फ़िल्म इसलिए अलग हैं क्योंकि ये एक हिंदुस्तानी लड़के और मैक्सिको की लड़की की कहानी है.

    जय एक अवारा लड़का है जो ज़िंदा रहने के लिए कुछ भी कर सकता है. कभी वो पॉपकॉर्न बेचता है, कभी स्टंट करता है, कभी डांस और कभी ग्रीन कार्ड हासिल करने की कोशिश में लगी लड़कियों से झूठी शादी रचाता है.

    ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन एक लड़की जय को प्रपोज़ करती है लेकिन वो उसे ठुकरा देता है. जब उसे पता चलता है कि लड़की करोड़पति कि बेटी है तो वो उसे मना लेता है. अब लड़की को जय से प्यार है और जय को लड़की के पैसे से.

    लेकिन इसके बाद जय की मुलाक़ात नताशा से होती है और उसकी दुनिया बदल जाती है.

    ‘गैंगस्टर’ और ‘लाइफ़ इन ए मेट्रो’ जैसी जटिल फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक अनुराग बासु ‘काइट्स’ के ज़रिए हमें एक बार फिर रिश्तों की गुत्थियों में उलझा रहे हैं. अनुराग की ख़ासियत है कि वह अपने किरदारों की छोटी-बड़ी बातें साधारण मगर रसीले शब्दों में ज़ाहिर करते हैं.

    ‘काइट्स’ के कुछ डॉयलॉग हिंदी में हैं, कुछ अंग्रेज़ी में और कुछ स्पेनी भाषा में लेकिन भाषा मायने नहीं रखती क्योंकि पात्रों के हाव-भाव और आंखें उनके दिल का हाल जताती हैं.

    निर्माता राकेश रोशन ने हमेशा कुछ नया करने की कोशिश की है जैसे ‘कोई मिल गया’ और ‘कृष’. इस बार अनुराग बासु के साथ मिलकर उन्होंने ‘काइट्स’ को एक नई उड़ान दी है.

    फ़िल्म में बेशक कमियां हैं, जैसे कथानक में बहुत सारे फ़्लैशबैक हैं जिसकी वजह से फ़िल्म थोड़ा कन्फ़्यूज़ करती है. कहानी में कोई ख़ास उतार-चढ़ाव नहीं हैं और इंटरवल के बाद बहुत लंबी लगती है. मगर इन सब बातों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है क्योंकि फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर की है.

    अयानंका बोस ने कैमरे पर बहुत बढ़िया दृश्य खींचे हैं और संगीत निर्देशक राजेश रोशन का संगीत दिल को छू लेता है, ख़ासतौर कर ‘ज़िंदगी दो पल की’ नाम का गीत. उतना ही अच्छा फ़िल्म में सलीम-सुलेमान की जोड़ी का बैकग्राउंड संगीत भी है.

    कलाकारों में कंगना रानावत, जिन्होंने इससे पहले अनुराग बासु की फ़िल्मों में यादगार काम किया है, इस बार बहुत ही छोटे रोल में हैं. मैं हैरान हूं कि उन्होंने इतने छोटे से रोल के लिए हां क्यों कहा. ये हो सकता है कि उनका रोल काट दिया गया हो.

    मैक्सिको की अभिनेत्री बारबरा मोरी अपने किरदार के लिए बिल्कुल सही हैं. और जब वो फ़र्राटे से स्पेनी भाषा में बोलतीं हैं तो उनका अंदाज़ और भी दिलकश लगता है. जोधा अकबर में एक शहंशाह की भूमिका निभा चुके ऋतिक रोशन एक बार फिर हमारा दिल जीत लेते हैं. जब वो उदास होते हैं उनके होंठ सूख जाते हैं और जब वो ख़ुश होते हैं तो मानो मौसम बदल गया हो.

    फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी कुछ यादगार पल हमारे साथ रहते हैं. जब दोनों उंगलियां जोड़ कर दीवार में साये से खेलतें हैं या फिर जब दोनों देर रात तक बारिश में भीगते हुए सड़कों पर घूमते हैं.

    ये सच है कि काइट्स में राकेश रोशन की अपनी निर्देशित फ़िल्म के मुक़ाबले में भावुकता थोड़ी कम है लेकिन इसकी प्रस्तुति उनकी अब तक की सारी फ़िल्मों से बेहतर है.

    मैं कहूंगी कि काइट्स का सेहरा बंधता है फ़िल्म के तकनीकी सहयोगियों के नाम. फ़िल्म का हर एक भाग जैसे कि कैमरा, कोरियोग्राफ़ी, ऐक्शन, एडिटिंग...सभी बेमिसाल हैं.

    मैं सलाम करती हूं ऋतिक रोशन के अभिनय, अनुराग बासु के ‘विज़न’ और राकेश रोशन के जिगर को.

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