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    मौलिक और लीक से हट कर

    By Ankur Sharma
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    भावना सोमाया, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक

    बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

    ये तो कमाल हो गया-इस हफ़्ते तीन फ़िल्में रिलीज हुईं और तीनों ही बिल्कुल मौलिक और लीक से हटकर साबित हुईं.

    कुछ साल पहले राहुल ढोलकिया ने एक बहुत ही प्रभावकारी फ़िल्म बनाई थी परज़ानिया. यह फ़िल्म गोधरा दंगों पर थी.

    इस बार वो एक और सशक्त फ़िल्म लेकर आएं हैं जो कश्मीर पर हो रहे सीमा पार आतंकवाद पर है.

    अगर परज़ानिया ने गुजरात में सांप्रदायिक दंगों में हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी तो लम्हा खून से बहती हुई कश्मीर की वादियों पर टीका करती है.

    फ़िल्म के निर्देशक ढोलकिया चार खास कलाकारों-कमांडो संजय दत्त, फिदायीन औरत बिपाशा, अनुपम खेर और क्रांतिकारी कुणाल कपूर के जरिए अहम मसलों को उठाते हैं, जैसे- 1989 ऑपरेशंस, लश्कर-ए-तैबा और विवादास्पद चुनाव.

    जाहिर है कि ऐसी कहानी का कोई आसान समाधान नहीं हो सकता. 'लम्हा' में भी कोई समाधान नहीं है....लेकिन देश के लिए कुछ करने का उत्साह है.

    फ़िल्म की शूटिंग असल जगहों पर की गई है. सभी कलाकरों के प्रदर्शन सराहनीय हैं लेकिन फ़िल्म की रफ्तार जरूरत से ज्यादा तेज है. इस वजह से कुछ चीजें तो पकड़ में आती हैं लेकिन बहुत कुछ छूट जाती हैं.

    अगर आप नामी गिरामी कलाकारों को देखकर मनोरंजन की खोज में हैं तो यह फ़िल्म आपके लिए नहीं है. अगर आपको कश्मीर के मुद्दे में दिलचस्पी है, देश के लिए परवाह है तो 'लम्हा' आपके लिए है.

    अभिषेक शर्मा की 'तेरे बिन लादेन' मीडिया पर कटाक्ष है-कैसे मीडिया खबरें उत्पन्न करता है और फिर अपने ही जाल में फंस जाता है.

    फ़िल्म की पटकथा बड़े ही मजेदार ढंग से लिखी गई है. फिल्मांकन भी काफी बढ़िया है.

    साफ नजर आता है कि फ़िल्म बनाते हुए सभी कलाकारों को बड़ा मजा आता है, और शायद इसीलिए दर्शकों को भी उतना ही मजा आता है फ़िल्म देखते हुए.

    फ़िल्म के विज्ञापन पर लिखा है 'मिलियन डॉलर फेक'. नए कलाकार अली ज़फ़र और सुगंधा गर्ग अपने साथियों के साथ दिल खोलकर हमारा मनोरंजन कराते हैं.

    'उड़ान'

    अनुराग कश्यप निर्मित फ़िल्म उड़ान पिछले साल कान फ़िल्म फेस्टिवल में बड़ी चर्चा में रही.

    फ़िल्म देखने के बाद इसकी वजह समझ में आती है.

    उभरते निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी एक सोलह साल के लड़के के मन में क्या चल रहा है, उससे हमारी पहचान कराते हैं.

    बतौर दर्शक हमें पहली बार समझ में आता है कि एक किशोर सिर्फ़ सेक्स या रोमांस के बारे में ही नहीं सोचता. उसकी और भी उलझनें और तकलीफें होती हैं जो शायद हम कभी भी नहीं समझ पाते.

    काफी साल पहले गुलज़ार साहब ने बच्चों पर एक काफी संवेदनशील फ़िल्म लिखी और निर्देशित की थी. फ़िल्म का नाम था किताब. किताब ने बाल कलाकार राजू को अपनी पहचान दी थी.

    अब इतने साल के बाद अनुराग कश्यप 'उड़ान' के जरिए फिर एक उतनी ही अच्छी फ़िल्म लाए हैं टीनएजर्स पर. 'उड़ान' ने भी रजत बरमेचा को एक नई पहचान दी है जो आगे चलकर उन्हें एक नई उड़ान देगा.

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