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सागर जैसी आँखों वाली का जादू बरकरार

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सागर जैसी आँखों वाली का जादू बरकरार

भावना सोमाया, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

भारतीय फ़िल्मों में जब कभी हिंदुस्तान-पाकिस्तान की प्रेम कहानी बनी है तो लड़की हमेशा पाकिस्तान की और लड़का हमेशा हिंदुस्तान का होता है. जैसे शहीद-ए-मोहब्बत, गदर, वीर ज़ारा और सदियाँ.

ऐसे ही जब कभी हिंदु- मुस्लिम की प्रेम कहानी बनाई गई है तो लड़की हमेशा मुस्लिम और लड़का हिंदू बताया जाता है. जैसे बॉंम्बे और लव यू हमेशा.

इस हफ़्ते रिलीज़ हुई फ़िल्म सदियाँ हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बटवारे की एक और कहानी है. बटवारे के दौरान हुए दंगों में मुसलमान परिवार का एक छोटा बच्चा परिवार की अमृतसर वाली हवेली में रह जाता है जिसे एक हिंदू परिवार अपना लेता है.

सालों गुज़र जाते हैं और एक दिन बच्चे के असली माँ-बाप उसे खोजते हुए पाकिस्तान से हिंदुस्तान आते हैं. कहानी 60 के दशक की फ़िल्मों की याद दिलाती है.

फ़िल्म 70 के दौर के सुपरस्टार-रेखा, हेमा मालिनी और ऋषि कपूर को लेकर बनाई गई है. मगर बात कुछ ख़ास जमती नहीं है.

निर्देशक राज कंवर जिन्होंने इसके पहले अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्य राय की ढाई अक्षर प्रेम के बनाई थी, इस बार दो नए चेहरों- लव सिन्हा और फ़रेना वज़ीर को लेकर आए हैं. लव सिन्हा शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे हैं.

फ़िल्म का ट्रीटमेंट घिसा-पिटा है. कुछ दृश्य और डॉयलॉग जानी पहचानी फ़िल्मों से लिए गए हैं जैसे अमिताभ बच्चन की शान और मणि रत्नम की साथिया.

फ़िल्म का संदेश बेशक़ नेक है और दोनों देशों के अमन के लिए हैं. काश दो मुल्क़ों के बीच संबंध सुधारना इतना आसान होता जितना कि राज कंवर की फ़िल्म में दिखाया गया है. मैं इस फ़िल्म को दूँगी दो स्टार- ऋषि कपूर और रेखा के लिए.

कबीर सदानंद की फ़िल्म तुम मिलो तो सही तीन जोड़ियों की कहानी है.

पहली जोड़ी है रेहान खान और अंजना सुखानी की जो कॉलेज में पढ़ते हैं और अपने एक प्रोजेक्ट के दौरान दिल जोड़ने की कोशिश में लगे हैं.

दूसरी जोड़ी सुनील शेट्टी और विद्या मालवड़े की है जो शादी-शुदा हैं. ये दोनों अपने रिश्ते को संभालने और अपनी सोच बदलने की कोशिश में लगे हैं.

तीसरी जोड़ी है नाना पाटेकर और डिंपल कपाड़िया की जो बिल्कुल अलग इंसान होते हुए भी एक बंधन में बंध जाते हैं और दोस्ती निभाते हैं.

इन सब जोड़ियों को मिलाता है मुंबई का एक जाना पहचाना और सबका प्यारा अड्डा लकी कैफ़े. यहाँ का कैरेमल कस्टर्ड, कॉमिक्स और दिलशाद ऑंटी मशहूर हैं.

फ़िल्म की समस्या है कि इसमें बहुत सारे किरादर हैं और उनकी अपनी अपनी कहानियाँ हैं जिस वजह से फ़िल्म का प्लॉट भटक जाता है.

थिएटर के बाहर निकल कर हम याद करते हैं तो गोवा में रहने वाली फ़िल्म सागर की बार मालिक डिंपल कपाड़िया को.

आज वही डिंपल एक कॉफ़ी हाउज़ की पारसी महिला बनी हैं. बहुत कुछ बदल गया है इन सालों में मगर सागर जैसी आँखों वाली डिंपल में आज भी बात है.

मैं इस फ़िल्म को दूँगी दो स्टार जिसमें से एक डिंपल के लिए और एक लकी कैफ़े के लिए.

(लेखिका जानी-मानीं फ़िल्म समीक्षक हैं और फ़िल्मों पर कई किताबें भी लिख चुकी हैं)

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