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    पॉर्नोग्राफ़िक फ़िल्म है मित्तल vs मित्तल

    By Jaya Nigam
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    भावना सोमाया, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक

    बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

    पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा फ़िल्में भारत में बनती हैं. काश इनमें से आधी भी देखने लायक होतीं.

    इस सप्ताह पाँच फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं, जिनमें फ़िल्म प्यार के गाने ज़िक्र के भी लायक नहीं है.

    फ़िल्म मित्तल v/s मित्तल एक घरेलू हिंसा की कहानी है. इस फ़िल्म में पति रोहित रॉय अपनी पत्नी का यौन उत्पीड़न करता है और पत्नी तंग आकर पति पर 'वैवाहिक बलात्कार' का केस दर्ज करती है.

    कहानी औरत पर होते अत्याचार की है लेकिन निर्देशक करन राजदान की नीयत कुछ और है और इसलिए फ़िल्म झूठी लगती है.

    महिलाओं के उत्पीड़न पर इससे बेहतर फ़िल्में आ चुकी हैं, जैसे मनीषा कोइराला की अग्निसाक्षी और ऐश्वर्या रॉय की प्रोवोक्ड.

    मित्तल v/s मित्तल महिलाओं के मुद्दे की आड़ में एक पॉर्नोग्राफ़िक फ़िल्म है, जिसमें न कोई नई सोच है और न ही सच्चाई है.

    दो फ़िल्में बीच राह की हैं- माई फ़्रेंड गणेश 3डी में बनी तीसरी एनिमेशन फ़िल्म है. पिछले वर्षों में गणेश-1 और गणेश-2 रिलीज़ हुई थीं, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर नहीं चलीं.

    डीवीडी मार्केट में गणेश सिरीज़ की बच्चों में मांग रही और शायद गणेश-3 का भी वही अंजाम होगा.

    हम तुम और गोस्ट एक बार फिर साबित करता है कि विषय वस्तु नहीं तो कुछ भी नहीं.

    ये फ़िल्म बहुत सारी अंग्रेज़ी फ़िल्मों का मिश्रण है जैसे गोस्ट टाउन और सिक्स्थ सेंस, जो अभी तक लोगों को याद हैं.

    अरशद वारसी जो आज तक मुन्नाभाई और इश्किया के अपने रंगीन किरदारों के लिए जाने जाते हैं, इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर होते हुए भी अपने लिए कोई ख़ास किरदार नहीं लाए.

    उन्होंने इस फ़िल्म पर पैसा तो दिल खोलकर लुटाया है, लेकिन बहुत कुछ अच्छा होते हुए भी फ़िल्म में जान नहीं.

    कहानी सुनी-सुनाई है, इसलिए दिल को नहीं छूती.

    तीस साल से भी ज़्यादा समय पहले श्याम बेनेगल ने फ़िल्म अंकुर और बाद में निशांत के माध्यम से सिनेमा देखने वाले लोगों को एक अलग हैदराबाद की पहचान कराई थी.

    आज इतने वर्षों के बाद श्याम बेनेगल वेल डन अब्बा के माध्यम से एक बार फिर हैदराबाद के छोटे गाँवों का सफ़र कराते हैं.

    वेल डन अब्बा मुंबई में काम करते हुए ड्राइवर अरमान अली की कहानी है. अरमान अपने गाँव अपनी बेटी की शादी कराने आते हैं, लेकिन शादी से भी ज़रूरी बातों में मसरूफ़ हो जाते हैं.

    इस फ़िल्म की दिलचस्प बात ये है कि ये कहानी सिर्फ़ अरमान और उसकी बेटी मुस्कान की नहीं बल्कि हम सब और हमारे गाँवों की कहानी है.

    श्याम बेनेगल ने अपनी फ़िल्मों से हमेशा सामाजिक संदेश दिया है. इस बार वो हमें अपने उसूलों के लिए लड़ने को प्रोत्साहित करते हैं.

    30 साल पहले उनकी फ़िल्म अंकुर में एक छोटे बच्चे ने ज़मींदार पर पत्थर फेंक कर आवाज़ उठाई थी, तो वेल डन अब्बा में एक ड्राइवर पूरे गाँव और व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है.

    अगर 75 की उम्र में श्याम बेनेगल हमें ऐसी फ़िल्म दे सकते हैं तो भगवान उन्हें 100 साल की उम्र और अच्छी सेहत दें.

    इस सप्ताह की मार्कशीट में वेल डन अब्बा नंबर वन है, हम तुम और गोस्ट नंबर-2 और माई फ़्रेंड गणेश नंबर-3 है.

    (लेखिका जानीं-मानीं फ़िल्म समीक्षक हैं और फ़िल्मों पर कई किताबें भी लिख चुकी हैं)

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