'वी आर फैमिली' है मूवी ऑफ द वीक

भावना सोमाया, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
इस हफ़्ते तीन फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं.पहली है हॉरर फ़िल्म 'मल्लिका' जो सच में ही भयानक है और दर्शकों को सिनेमाघरों से कोसों दूर रहना चाहिए. दूसरी है आकाश शेरे की 'देव डी' से प्रभावित 'इमोशनल अत्याचार' जो न सिर्फ़ 'इमोशनल' बल्कि 'फ़िज़िकल' और 'साइकोलॉजिकल' अत्याचार भी है.
और आख़िर में करण जौहर की 'वी आर फ़ैमिली' जो 1998 की अंग्रेज़ी फ़िल्म 'स्टेप मॉम' पर आधारित है और करण जौहर ने ये काम क़ानूनी तौर पर किया है. इसके पहले उन्होंने 'प्रिटी वुमन' का गाना भी लीगल राइट्स ख़रीद कर अपनी फ़िल्म 'कल हो न हो' में इस्तेमाल किया था. फ़िल्म का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट उसकी स्टार कास्ट है. काजोल और करीना जो कभी ख़ुशी कभी ग़म में बहनें बनी थीं, इस बार सौतन बनी हैं.
फ़िल्म की सबसे बड़ी निगेटिव प्वाइंट ये है कि 12 साल के बाद भी दर्शक 'स्टेप मॉम' को भूल नहीं पाए हैं इसलिए हर सीन में ऑरिजिनल फ़िल्म और अभिनेताओं को याद करते हैं. ऐसा नहीं है कि काजोल या करीना कपूर ने अच्छा काम नहीं किया है. बल्कि कई दृश्यों में तो तय करना मुश्किल होता है कि कौन किससे बेहतर है. मगर बहुत अच्छे होते हुए भी दोनों ऑरिजिनल फ़िल्म की अभिनेत्रियों, सुज़न सरनडॉन और जूलिया रॉबर्ट्स से कम ही नज़र आते हैं.
और ये एक त्रासदी है.
फ़िल्म में एक और समस्या है. दोनों अभिनेत्रियों के बीच में उम्र का फ़ासला कुछ कम दिखाया गया है. मेरे हिसाब से काजोल की भूमिका में अलग जेनरेशन की नायिका होनी चाहिए थी, जैसे रेखा. अर्जुन रामपाल अच्छे हैं मगर दोनों लड़कियों के बीच में फ़ीके पड़ जाते हैं जो स्वाभाविक है. तीनों बच्चे नैचुरल हैं मगर कुछ हद के बाद उनकी शैतानी से सर दुखता है.
पहली बार किसी फ़िल्म का निर्देशन किया है सिद्धार्थ मल्होत्रा ने. इतनी बड़ी फ़िल्म और बड़ी स्टार कास्ट को उन्होंने बख़ूबी निभाया है. लेकिन उन्हें इस बात की क्रेडिट नहीं मिलेगी क्यूंकि फ़िल्म ऑरिजिनल नहीं है. सिद्धार्थ मल्होत्रा 50 के दशक के नामी दंपत्ति प्रेमनाथ और बीना रॉय के पोते हैं.
हमारी समस्या ये नहीं है कि हम जब अच्छी हॉलीवुड फ़िल्म देखते हैं तो उसे फ़ौरन हिंदी में बनाना चाहते हैं. हमारी समस्या है कि जब हम उसे हिंदी में बनाते हैं तो उसकी तुलना ऑरिजिनल से करते हैं. 'वी आर फ़ैमिली' करण जौहर की बाक़ी प्रोडक्शन की तरह एक शहरी, मल्टीप्लेक्स फ़िल्म है जो भारतायों से ज़्यादा प्रवासी भारतायों के पसंद की है.
शंकर-एहसान-लॉय का संगीत कुछ ख़ास नहीं है जो धर्मा प्रोडक्शन्स के लिए एक नई बात है. इन सारी ख़ामियों के बावजूद फ़िल्म देखनी चाहिए लड़कियों की केमिस्ट्री और उनके अभिनय के लिए. और ये समझने के लिए कि ऐसा क्या है कि रूपांतरण चाहे जायज़ हो या नाजायज़ हमारे दिल को नहीं भाते.


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