'कमी है तो सिर्फ़ मेहनत की'

By Neha Nautiyal
'कमी है तो सिर्फ़ मेहनत की'

पूर्व ओलंपियन और धावक मिल्खा सिंह को नहीं लगता कि इस साल अक्तूबर में नई दिल्ली में होने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ऐथलेटिक्स में एक भी स्वर्ण पदक जीत पाएगा.

फ़्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह ने 1958 में कार्डिफ़ कॉमनवैल्थ गैम्स में चार सौ मीटर रेस में गोल्ड मेडल जीता था लेकिन उसके बाद फिर कोई भी नहीं जीत पाया. वो कहते हैं, "आज पैसे, स्टेडियम या कोच की कमी नहीं है, बस कमी है तो सिर्फ़ मेहनत की जो आजकल हमारे बच्चे नहीं कर रहे हैं. 2010 कॉमनवैल्थ गेम्स में एथलेटिक्स में पचास गोल्ड मेडल हैं लेकिन मैं कह रहा हूं कि भारत को एक भी नहीं मिलेगा".

फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह की ज़िंदगी पर अब 'भाग मिल्खा भाग’ नाम की फ़िल्म बन रही है. फ़िल्म की कहानी लिखी है प्रसून जोशी ने और इसका निर्देशन राकेश ओमप्रकाश मेहरा करेंगे.

बीबीसी की संवाददाता शाश्वती सान्याल ने बात की इन तीनों से.

फ़िल्म के बारे में मिल्खा सिंह कहते हैं, "राकेश ओमप्रकाश मेहरा से पहले भी कई निर्देशक मेरे पास आए जिन्होंने मेरी ज़िंदगी पर फ़िल्म बनाने के लिए काफ़ी बड़ी रकम का प्रस्ताव भी रखा. मुझे आजकल की फ़िल्मों के बारे में नहीं पता लेकिन मेरा बेटा जीव मिल्खा सिंह फ़िल्में देखता है और उसने रंग दे बसंती देखी थी. उन्होंने फ़ैसला किया राकेश ओमप्रकाश मेहरा ही सबसे बढ़िया निर्देशक हैं और वही फ़िल्म बनाएंगे और हम इसके भुगतान के तौर पर सिर्फ़ एक रुपया ही लेंगे".

रंग दे बसंती और दिल्ली 6 जैसी फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा मानते हैं कि मिल्खा सिंह की कहानी आज युग में ज़्यादा प्रासंगिक है बजाय तब जब वो मेडल्स जीत रहे थे.

राकेश कहते हैं, "आज के जैसे हालात हैं, आज का युवा बहुत सी चुनौतियों से जूझने से कोशिश कर रहा है. तो मिल्खा जी की कहानी से जो प्रेरणा मिलती है ज़िंदगी से जूझने की, वो कल भी प्रासंगिक थी, आज भी है और आने वाले समय में और भी ज़्यादा होगी".

राकेश ये भी कहते हैं, "ऐसा विषय बहुत ही चुनौतीपूर्ण है और ऐसी कहानी और मौका किसी भी फ़िल्ममेकर की ज़िंदगी में एक ही बार आता है. मैंने प्रसून जी को तीन-चार कहानियां बताई कि मैं इन पर फ़िल्म बनाना चाहता हूं, तो क्या आप लिखेंगे और कौन सी लिखना चाहेंगे. उन्होंने इस बारे में सोचकर कहा कि वो भाग मिल्खा भाग लिखना चाहेंगें".

प्रसून जोशी कहते हैं फ़िल्म मिल्खा सिंह से प्रेरित है लेकिन बायोपिक नहीं है. प्रसून कहते हैं, "फ़िल्म सिर्फ़ मिल्खा सिंह के बारे में ही नहीं है बल्कि उस वक्त सामाजिक और राजनीतिक माहौल कैसा था, पार्टिशन के बाद के जो हालात कैसे थे या फिर आर्मी उस समय कैसी थी, हमारी कोशिश है वो सब बातें हम इस फ़िल्म शामिल करें. इसके अलावा कोशिश ये भी है कि किसी न किसी रुप में आपसे ये फ़िल्म जुड़े, आपको छूए".

मिल्खा सिंह की भी यही इच्छा है कि आने वाली पीढ़ियां उनके जीवन से प्रेरित होकर आगे बढ़े ताकि खेलों में भारत का नाम दुनिया भर में ऊंचा हों.

फ़िलहाल फ़िल्म लिखी जा रही है और इसकी कास्टिंग के बारे में कोई भी निर्णय नहीं लिया गया है. राकेश ओमप्रकाश मेहरा कहते हैं, "इस समय कास्टिंग के बारे में सोचने की बात ही नहीं उठती. अगर आप किसी का चेहरा डाल देंगे तो आपकी कहानी सीमित हो जाएगी. अगले तीन से छह महीनों में कास्टिंग की जाएगी और फिर शूटिंग शुरु होगी. तो फ़िल्म अट्ठारह महीने में तैयार होने की उम्मीद है".

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