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    कभी ऑस्कर का हिस्सा रहे, आज दर दर भटक रहे हैं

    By हिना कुमावत - मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉ
    |
    रूबीना
    Heena Kumawat
    रूबीना

    "पेट भरने के लिए मैं कोई भी काम कर लूंगी जिससे मुझे सात से आठ हज़ार मिल जाए. मैं किसी काम को छोटा बड़ा नहीं समझती."

    ये शब्द उस कलाकार के हैं जो ऑस्कर जीत चुकी फ़िल्म का हिस्सा रही हैं.

    रूबीना ने नौ साल की उम्र में साल 2008 की आठ ऑस्कर जीतने वाली फ़िल्म स्लमडॉग में काम किया था.

    मुंबई के बांद्रा इलाके के स्लम में रहती रूबीना की ज़िंदगी उस फ़िल्म ने बदल दी. नाम, शोहरत और सर पर छत सब कुछ मिला.

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    "मुझे लगता था कि मेरी ज़िंदगी एकदम पलट गई है. मै सेलिब्रेटी हूं ऐसा महसूस करती थी. लोग मुझे पहचानते थे तो मुझे बहुत अच्छा लगता था. 2011 में बांद्रा इलाके में लगी भीषण आग में रूबीना ने अपना मकान और ऑस्कर की सारी यादें गवां दी."

    रूबीना की ज़िंदगी का आलम आज ये है कि वो किसी को ये तक बताना नहीं चाहती कि वो कहाँ रहती है. आज बीए फर्स्ट ईयर की छात्रा 18 साल की हो चुकी रूबीना की ज़िंदगी की हक़ीक़त सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे.

    अकेले संघर्ष करने को मजबूर

    रूबीना अली की ज़िंदगी पिछले नौ सालों में इतनी बदल गई कि माथे की शिकन को मुस्कुराहट से कैसे छुपाया जाए वो उन्होंने बख़ूबी सीख लिया है.

    हिना कुमावत
    Heena Kumawat
    हिना कुमावत

    सब कुछ आग में गंवाने के बाद फ़िल्म के निर्देशक डैनी बॉयल के जय हो ट्रस्ट ने उन्हें घर दिया. लेकिन आज वहाँ उसके डैडी और सौतेली माँ रहते हैं. घर खाली कराए जाने पर पिता ख़ुद को फाँसी लगा लेने की धमकी देते हैं. वहीं बाप से अलग हो दूसरी शादी कर चुकी मां तो रूबीना को पूछती ही नहीं.

    पिछले डेढ़ सालों से अकेली रहने वाली रूबीना आज पेट भरने के लिए पार्ट टाइम जॉब की तलाश कर रही है.

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    "कोई सगा पिता ऐसा कैसे कर सकता है वो घर के साथ साथ फिक्सड डिपोजिट में 50% का हिस्सा चाहे? पिछले एक साल चार महीने से मेरे पास मेरी माँ का फ़ोन तक नहीं आया कि तू कैसी है, कहाँ रह रही है? मैं अकेली हूं. मेरी ज़िंदगी में कुछ नहीं बचा है. वो लोग अपनी ज़िंदगी में ख़ुश हैं तो मुझे लगा कि मैं भी अपनी ज़िंदगी में ख़ुश रहूं."

    पेट भरने की चुनौती

    स्लमडॉग का हिस्सा रहे अज़हर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.

    अज़हर फिलहाल इस असमंजस में हैं कि सपने के पीछे दौड़ें या पेट भरने के पीछे. वो भी रुबिना की ही तरह बांद्रा इलाके की स्लम में रहते थे, लेकिन स्लमडॉग मिलिनेयर के बाद उन्हें भी सर पर छत मिली जहाँ वो अपनी माँ के साथ रहते हैं, लेकिन सपने तो आज भी अधूरे हैं.

    अज़हर अपनी मां के साथ
    Heena Kumawat
    अज़हर अपनी मां के साथ

    वे कहते हैं, "मैं एक्टिंग क्लास करना चाहता हूं, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं. आठवीं कक्षा तक स्कूल में मैंने अमोल गुप्ते की एक्टिंग क्लास की लेकिन नौंवी कक्षा में स्कूल छूटने के साथ ही वो भी छूट गई. पिछले साल पैसों की तंगी के कारण स्कूल छूट गया. अब सोच रहा हूं कि प्राइवेट से दसवीं करूंगा."

    अज़हर के सिर से पिता का साया 2009 में ही उठ गया था. एक साल पहले नौवीं कर स्कूल छोड़ चुके अज़हर कहते हैं कि अगर एक्टिंग में कोई चांस नहीं मिला तो ट्रस्ट से मिलने वाली रकम से भाई के साथ मिल कर बिज़नेस करेंगे.

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    वैसे ऑस्कर के रेड कार्पेट पर चले रूबीना और अज़हर आज एक दूसरे के संपर्क में नहीं है. इसी साल 18 साल के हो जाने की वजह से अज़हर और रूबीना को हर महीने जय हो ट्रस्ट की तरफ से मिलने वाली रकम भी अब बंद हो चुकी है.

    हालांकि बहुत ही जल्द ट्रस्ट का दिया घर और पैसा अज़हर के नाम हो जाएगा लेकिन रूबीना के सर पर तो वो छत भी नहीं है.

    ज़िंदगी के कई कड़वे सच देख चुकी रूबीना की ही तरह अज़हर भी इस चकाचौंध भरी ग्लैमर की दुनिया के दूसरे पहलू से भी वाक़िफ हैं.

    अज़हर
    Heena Kumawat
    अज़हर

    स्लमडॉग मिलिनेयर की सफलता के समय मदद के कई वादों ने दोनों की उम्मीदें बढ़ा दी थीं. अनिल कपूर और साथ ही कई जगहों से मदद का आश्वासन मिलने की वजह से रुबिना और अज़हर दोनों ही कुछ साल पहले अनिल कपूर से मिलने गए.

    जहां अज़हर को फिर से एक बार मदद का आश्वासन मिला वहीं रूबीना को तो मिले बिना ही वापस आना पड़ा. हालांकि अज़हर को आज भी उम्मीद है कि मदद मांगने पर मदद शायद मिल जाए.

    उम्मीद पर दुनिया क़ायम है

    अज़हर कहते हैं, "ये दुनिया (फिल्मी दुनिया) ऐसी है जहाँ किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए. लोग फ़ायदा उठाने की कोशिश करते हैं. लोग कहते हैं कि आपकी मदद करेंगे लेकिन कोई करता नहीं. मैं तो सिर्फ़ इतनी मदद चाहता था कि मुझे कोई अच्छी फिल्म में काम मिल जाता."

    अज़हर
    Heena Kumawat
    अज़हर

    रूबीना अपने कल से पीछा छुड़ाने की जद्दोजहद कर रही हैं तो बिना बाप का नौजवान बेटा अज़हर घर चलाने के लिए संघर्ष.

    लेकिन दोनों की ही ज़िंदगी में अगर कोई उम्मीद की किरण है तो वो हैं निर्देशक डैनी बॉयल. वो हर बार भारत आने पर दोनों से मिलना नहीं भूलते.

    आत्मनिर्भर होने का और हंसते हंसते ज़िंदगी का संघर्ष करने का गुर दोनों ने उन्हीं से ही सीखा है.

    इन दोनों ने कभी नहीं सोचा था कि ज़िंदगी की चुनौतियां और ग़म उन्हें इतनी जल्दी बड़ा कर देंगे जहाँ पढ़ने और दोस्तों के साथ घूमने की उम्र उन्हें अपने पेट भरने की चिंता में बितानी होगी.

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    BBC Hindi
    English summary
    Azhar and Rubina of Slumdog millionaire movie are struggling hard to get work.
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