'तेज़ाब जैसी भूमिकाएँ बार-बार नहीं मिलतीं'

इसी पखवाड़े जब ब्रितानी निर्देशक डैनी बौयल की अंग्रेज़ी फ़िल्म स्लमडॉग मिलियनेयर रिलीज़ हुई तो अनिल कपूर एक बार फिर से चर्चा में आए. उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंशः
इस साल आपकी टशन और युवराज जैसी फ़िल्में नही चलीं लेकिन डैनी बौयल की स्लमडॉग मिलियनेयर ने आपकी चर्चा दुनिया भर में करवा दी. आख़िर ऐसा क्या है उसमें?
यह रोमांचक लगता है हालाँकि उसका हीरो मैं नही हूँ. मैंने तो उसमे प्रेम कुमार नाम के ऐसे एंकर की भूमिका की है जो एक गेम शो 'हू वांट्स टु बी ए मिलियनेयर' का संचालक है. ये जमाल नाम के ऐसे लड़के की कहानी है जो मुंबई के गंदे इलाक़ों में पला बढ़ा लेकिन जब एक गेम शो का विजेता बन जाता है तो पुलिस उसे चीटिंग के आरोप में गिरफ़्तार कर लेती है.
बाद में जब वो अपनी कहानी सुनाता है तो लोगों को पता चलता है कि ग़रीबी और उसका अनुभव कैसे किसी को ख़ुद एक सवालों की गुंजल और जवाबों की किताब बना देता है.
ब्लैक एंड व्हाइट, टशन और युवराज की नाकामी के बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मैं लोगों की पसंद को नही समझ पाता. मैंने इन तीनों फ़िल्मों में जो भूमिकाएं की वो मैंने इससे पहले कभी नहीं की थीं. टशन मैं तो मैंने पहली बार निगेटिव भूमिका की जबकि निगेटिव चरित्र मुझे बिल्कुल रोमांचित नही करते. मैं हमेशा नया प्रयोग करना चाहता हूँ. इसीलिए मैं ब्लैक एंड व्हाइट और युवराज भी कर लेता हूँ और टशन भी.
आपको सुभाष घई का पसंदीदा अभिनेता कहा जाता है?
नही, मैंने जब उनके साथ कर्मा और ताल जैसी फ़िल्में की तो पहले मेरी भूमिकाएं गोविंदा जैसे दूसरे लोग करने वाले थे. मैं सुभाष जी की पहली पसंद केवल ब्लैक एंड व्हाइट और युवराज में ही रहा. यह अलग बात है कि मैं उनकी हर फ़िल्म करना चाहता हूँ.
बतौर निर्माता अपने जब गाँधी माय फ़ादर बनाई तो आपने न तो बोनी कपूर और न ही सतीश कौशिक को साथ लिया?
ऐसा मत कहिए. मैं उनके बगैर काम करने के बारे में सोच भी नही सकता था. सतीश के साथ हमने 'रूप की रानी…' से लेकर 'बधाई हो बधाई' जैसी फ़िल्में बनाई थी. लेकिन गाँधी माय फ़ादर को मैं अलग ट्रीटमेंट के साथ बनाना चाहता था और मैंने फिरोज़ खान का नाटक देखा था.
यह फ़िल्म गाँधी को ग्लोरिफ़ाई करके नही दिखाती थी. यह उनके परिवार और रिश्तों की कहानी वाली फ़िल्म थी. मुझे लगा कि जो आदमी इसकी आत्मा को समझता है वो ही इसे बना सकता सकता है.
अपने लंबे करियर में आपने तेज़ाब जैसी भूमिकाएँ फिर नहीं कीं?
अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर भी फ़िल्मों में क़दम रख चुकी हैं
तेज़ाब या ईश्वर जैसी भूमिकाएँ बार-बार नही लिखी जातीं और अब मैं चाहकर भी तेजाब जैसी भूमिका नही कर सकता. लेकिन मुझे याद है कि अमरीका में जब 'लम्हे' और '1942 ए लव स्टोरी' फ़िल्में दिखाई गई तो वहां छात्र महीनो तक उन्हें देखने आते रहे. मुझे जब पुकार के लिए राष्ट्रीय अवार्ड मिला तो मुझे बधाई देने वाले लोगों में ऐसे लोग अधिक थे जो आज भी मेरी 'वो सात दिन' वाली भूमिका को नही भूले थे.
आपके पिता तो ख़ुद एक बड़े निर्माता और वितरक रहे फिर आपने उनकी फ़िल्मों से शुरुआत क्यों नहीं की?
मैं ख़ुद को अपने दम पर साबित करना चाहता था. मैं नही चाहता था कि कोई यह कहे कि मेरे लिए हीरो बनना आसान था. हाँ जब मैं फिल्मों में सफल हो गया तो हमने अपने पिता के बैनर में फिल्में ज़रूर बनाईं.
तो आप अपनी बेटी सोनम को सहारा क्यों दे रहे हैं. ख़बर है कि आप उसे दिशा निर्देश देते हैं?
नही. मैं उसकी चिंता केवल एक पिता की तरह करता हूँ और जो हर पिता को करनी चाहिए. मैं खुश हूँ कि उसका करियर बन रहा है. उसने जब साँवरिया की तो मुझे खुशी हुई कि वो एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री की तरह सामने आईं.
जहाँ तक मेरे उसे प्रमोट करने के बात है तो हम दोनों लंदन के एक समारोह और भारत के लक्मे फ़ैशन वीक के दौरान जरूर साथ दिखे थे लेकिन यह एक पिता और पुत्री का साथ था, अभिनेता अनिल कपूर या अभिनेत्री सोनम का साथ नही.
कौन सी फिल्में और लोग हैं जो आपको इस मुकाम पर आज भी याद आते हैं?
मैं किसी को नही भूलता. अपनी फ़िल्म 'एक बार कहो' के उस संघर्ष को भी नही जिसमे मैंने रेल की एक बोगी से इसलिए छलांग दी कि मैं उस सीन को यादगार बनाना चाहता था पर जब मैंने रशेज देखे तो मेरा दिल टूट गया. मेरा चेहरा धुंए में खो गया था और कैमरा शबाना जी के चेहरे को फ़ोकस कर रहा था.
यही वो पल थे जिन्होंने मुझे हीरो बनने के लिए उकसाया. मैंने टशन की निगेटिव भूमिका भी इसलिए की कि मैं ख़ुद को आजमाना चाहता था. सो मैंने अपने करियर जितनी भी फ़िल्म की मैं उन्हें कभी नही भूल सकता.
आपने कभी निर्देशन के बारे में नही सोचा...
निर्देशन मेरे बस का काम नही...
आपकी तुलना कमल हसन से की जाती रही है और माना जाता है की उनके बाद आप ही ख़ुद की भूमिकाओं में सबसे अधिक प्रयोग करते हैं?
कमल बड़े अभिनेता हैं. मुझे उनकी फिल्म पसंद हैं. यदि उनसे मेरी तुलना होती है तो मेरे लिए बडी बात है. लेकिन आज मेकओवर का ज़माना है. अब लोग मेकओवर को प्रयोग का नाम देते हैं जबकि किसी भूमिका का मतलब केवल कपडों या बालों का स्टाइल बदलना नही होता.
उसके लिए चरित्र और पात्र के भीतर जीना पड़ता है. मुझे याद है कि बधाई हो बधाई और लम्हे के समय कैसे मैंने मोटापे और मूछों के बिना काम किया था.
अपने परिवार के बारे में क्या कहते हैं. सुना है आपने जब विवाह किया तब आप कुछ भी नही थे?
परिवार मेरे लिए सबसे ज्यादा अहम है. मैंने जब सुनीता से विवाह किया तब वो एक जिम चलाती थी. मैं उससे प्रेम करता था और तब से लेकर अब तक उसने मेरे जीवन में एक ऐसी भूमिका निभाई जो किसी फ़िल्म में कोई नही निभा सकता. यह वास्तविक जीवन की भूमिका है और मैं इस भूमिका का सम्मान करता हूँ .
अब आने वाली फिल्में कौन सी हैं?
अभी तो युवराज और स्लमडॉग मिलियनेयर रिलीज़ हुई हैं. इसके बाद नो प्रॉब्लम और और शार्टकट आएँगी.


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