अमिताभ को जन्मदिन की बधाई!

पिछले दिनों रिलीज हुयी 'द लास्ट लियर' में उनकी भूमिका को काफी सराहा गया, हालांकि यह फिल्म केवल कुछ खास दर्शकों को ही थियेटर तक खींच पाई।
लेकिन अब इस महान कलाकार की सफलता को बाक्स आफिस से नापा नहीं जा सकता है। एक कलाकार के रूप में अमिताभ ने हर तरह की भावनाओं को पर्दे पर साकार किया है। किसी भी चरित्र को निभा पाने में उन्हें महारत हासिल है।
अपनी दूसरी पारी में उन्होंने 'मृत्युदाता', 'लाल बादशाह', 'सूर्यवंशम' जैसी गलत फिल्में साइन कर ली, जबकि उस दौर में भी उनके लिए फ्रेस और प्रयोगात्मक चरित्र गढे गए। यही वजह है कि उन्होंने चार दशक से भी अधिक समय तक बालीवुड पर राज किया है। इसका कारण उनकी अदभूत अभिनय क्षमता और गजब की एनर्जी है।
जब उन्होंने टीवी पर 'कौन बनेगा करोड़पति' से छोटे पर्दे पर प्रवेश किया तो उनकी आलोचना की गयी, लेकिन अपनी गजब की संचालन क्षमता से उन्होंने साबित कर दिया कि वे सबसे बेहतर है।
'मोहब्बतें' ने उन्हें दाढी के गेटअप में फेमस किया, उसके बाद से हम उन्हें इस नए अवतार में देखतें है। विचित्र बात है कि 'अजूबा' और 'मैं आजाद हूं' जैसी फिल्मों के जरिए जब उन्होंने नए प्रयोग करने चाहे तो जनता ने अस्वीकार कर दिया।
वहीं जब 'विरूद्ध' में एक दुखी पिता और 'बाबूल' में एक उत्तरदायी ससूर की भूमिका निभाते है तो जनता उन्हे सिर आंखों पर बिठाती है, लोग उन्हें 'बागबां' में पसंद करते है। 'वक्त' में उन्हें हम एक प्यारे पिता के रोल में देखते है।
और इससे अधिक जब राम गोपाल वर्मा के 'निःशब्द' में अपनी पोती की उम्र की लड़की (जिया खान) के साथ रोमांस करते हुए दिखाई देते है तो जनता अचंभित रह जाती है, आलोचना को दरकिनार करते हुए उसी विषय पर 'चीनी कम' साइन करते है जिसमें उनके अपोजिट में तब्बू है, और 'कभी अलविदा न कहना' के सेक्सी सैम को तो कोई भूल ही नही सकता है।
हालांकि 'राम गोपाल बर्मा की आग' तो जलने से पहले ही बुझ गयी लेकिन उन्होंने अपने ड्रीम रोल गब्बर को निभा लिया। उन्होंने भूत (भूतनाथ) और भगवान (गाड तुस्सी ग्रेट हो) का रोल भी बखुबी निभाया।


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