जब तक है जान के 8 साल: शाहरुख खान संग थी यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म, ए आर रहमान ने बताई खास बातें
यश चोपड़ा की टाइमलेस रोमांटिक फिल्म 'जब तक है जान' के लिए कंपोज की गई ए.आर. रहमान की मनमोहक धुनों ने हर भारतीय के दिल को छू लिया था। शाहरुख खान, कैटरीना कैफ और अनुष्का शर्मा स्टारर यह फिल्म यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म थी और इसी के साथ भारतीय सिनेइतिहास के एक महान फिल्मकार बनने का गवाह रहे उनके करियर का परदा भी गिर गया था। वाईआरएफ की 'जब तक है जान' लीजेंडरी फिल्म-मेकर यश चोपड़ा और ऑस्कर-विजेता ए.आर. रहमान के पहले रचनात्मक गठजोड़ की निशानी बन गई।
आयकॉनिक फिल्मकार यश चोपड़ा के साथ करने का अपना प्यारा अनुभव याद करते हुए रहमान कहते हैं, "मुझे लगता है कि इतनी दिग्गज हस्ती के साथ काम करना अपने आपमें एक बहुत बड़ा सम्मान था। उनका (यश चोपड़ा का) हर दिलकश चीज को लेकर बच्चों जैसा उत्साह हुआ करता था। यह जानते हुए कि वाईआरएफ स्टूडियोज और फिल्में उनके ही विजनरी दिमाग की उपज थीं, यह देखना बेहद दिलचस्प था कि वहां सब कुछ कितना सुव्यवस्थित है। यह एक सुखद अहसास भी था। आपको पता ही है कि इतने अनुभवी व्यक्ति से आप कुछ खास चीजों की उम्मीदें करते ही हैं, लेकिन इसके आगे बढ़कर वह हमेशा सबसे इनोवेटिव आइडिया चुनते थे। एकदम नई-नई चीजें उठाने के बावजूद उनको परंपरा में ढाल देने की उनमें जबर्दस्त खासियत मौजूद थी''

'जब तक है जान' की 8वीं सालगिरह पर रहमान बता रहे हैं कि यश जी के साथ उनकी रचनात्मक सहभागिता कैसी थी। उनका कहना है- "मैं समझता हूं कि यशराज फिल्म्स की हर मूवी कुछ खास चीजों को फॉलो करती है। मैं बस यह देखना चाहता था कि इसमें मेरा क्या योगदान हो सकता है। मैं इस फिल्म के ज़ोन में गहरे उतर गया और यकीनन एक दिलचस्प फिल्म तैयार हुई थी। चूंकि फिल्म का सब्जेक्ट मेरा फेवरिट था इसलिए मैं फ्लो के साथ बहता चला गया।''
रहमान आगे बताते हैं, "मुंबई में म्यूजिक तैयार करने की प्रक्रिया, मेरे स्टूडियो और उनके स्टूडियो के बीच जारी रही... हम एक जगह से दूसरी जगह लगातार आते-जाते रहे। मुझे पता था कि वह (यश चोपड़ा) दूसरों के स्टूडियो में कभी नहीं जाते थे, लेकिन दयालुतापूर्वक वह मेरे यहां पधारे और गुलजार साहब के साथ ठहरे रहे, बस हम तीनों ही थे। संगीत तैयार करने का प्रोसेस बेहद यादगार था।"
गुलजार साहब और 'जब तक है जान' को लेकर अपने विजन के बारे में रहमान बताते हैं- "आपको पता है, जनाब गुलजार साहब के साथ आप जब भी काम करें... वह खुद एक किस्म की पोएट्री रचते जाते हैं। उनके हाव-भाव... जिस तरह से वह बात करते हैं... उनकी आंखें मोहब्बत और अक्लमंदी से लबरेज होती हैं। तो, उन दोनों के साथ काम करना बेहद दिलचस्प रहा। कई बार हम तीनों काम करने के बाद एक साथ रोजा खोलते थे, इस तरीके से यह बड़ा जबर्दस्त अनुभव था।''
रहमान के दिल में अपने रचे हर गाने/एल्बम की एक खास जगह है। उनका कहना है, "मेरी नजर में 'हीर हीर' सॉन्ग मेरे लिए बेहद खास था, क्योंकि इसको तैयार करने के लिए उन्होंने मुझे काफी आजादी दे रखी थी। उन्होंने मुझे बस इस गीत के बोल थमा दिए थे और कहा था कि 'यह भर्ती वाला गाना है। हमें इसके केवल 30 सेकेंड चाहिए।' और जब हमने इसे रिकॉर्ड कर लिया तो यश जी ने मुझसे पूछा- 'आप तो पंजाबी नहीं हैं।
तब आपने पंजाब की सारी बारीकियां कैसे पकड़ लीं?' मेरा जवाब था- 'संगीत को इसकी जरूरत नहीं पड़ती...कोई पंजाबी गाना कंपोज करने के लिए आपका पंजाब में रहना जरूरी नहीं है। क्योंकि भारत में हम सब एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। हमारी परंपराएं एक-दूसरे के साथ गहराई तक जुड़ी हुई हैं, हम एक-दूसरे के कल्चर की कदर करते हैं"।' तो, इस सबका आपके ऊपर असर पड़ता ही है। इसका अपना एक खास अहसास भी होता है, लेकिन अभी तक इसकी कोई ठोस शक्ल नहीं उभर पाई है।''


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