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बॉलीवुड की नई शैली बना अपशब्दों का इस्तेमाल

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प्रियंका शर्मा

नई दिल्ली, 15 फरवरी (आईएएनएस)। बॉलीवुड हमेशा से आम लोगों का सिनेमा रहा है और यही वजह है कि फिल्मों की भाषा और कभी-कभी तो उनके शीर्षकों में भी अपशब्दों का इस्तेमाल होता है।

ये अपशब्द या गालियां आज के समाज में बहुत आम हैं और इन्हें अपने इर्द-गिर्द के माहौल में सुना जाना सामान्य बात हो गई है।

'लफंगे परिंदे' और 'लागा चुनरी में दाग' जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके प्रदीप सरकार कहते हैं, "फिल्मों में हमेशा से गालियों का इस्तेमाल होता रहा है। यदि कोई किरदार इस तरह की स्थितियों में होता है तो उसके संवादों में गालियों के इस्तेमाल में क्या नुकसान है। वैसे इनके इस्तेमाल का एक निश्चित तरीका होना चाहिए। वास्तविक जिंदगी में अपशब्दों का इस्तेमाल बहुत आम बात हो चुकी है।"

फिल्मों में गालियों के इस्तेमाल के उदाहरण ढूंढ़ना मुश्किल नहीं है। 'नो वन किल्ड जेसिका' में टेलीविजन पत्रकार की भूमिका निभाने वाली रानी मुखर्जी ने इस फिल्म में जमकर गालियां दी हैं। 'पीपली लाइव' और सलमान खान की सफल फिल्म 'वांटेड' (2009) में भी अपशब्दों का इस्तेमाल हुआ है।

विशाल भारद्वाज की फिल्म 'ओमकारा' में अजय देवगन और सैफ अली खान गालियों की बौछार करते दिखते हैं। पिछले साल प्रदर्शित हुई 'इश्किया', 'खट्टा मीठा', 'तेरे बिन लादेन' के संवादों और गीतों में भी अपशब्दों का इस्तेमाल हुआ है। अभिनेता शाहरुख खान भी कभी ऐश्वर्या राय के साथ 'इश्क कमीना' जैसे गीत पर थिरके थे। यह 2002 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'शक्ति' का गीत है।

अब तो फिल्मों के शीर्षकों में भी गालियां होती हैं। 'कमीने' और हाल ही में प्रदर्शित हुई 'ये साली जिंदगी' इसके कुछ उदाहरण हैं।

'नो वन किल्ड जेसिका' के निर्देशक राजकुमार गुप्ता कहते हैं, "हम जिस दौर में रह रहे हैं, उसमें गालियों का इस्तेमाल आम बात हो गई है। फिल्मों का परिदृश्य बदलने और उनके अधिक वास्तविक होने के साथ फिल्मकार और अभिनेता शब्दों के इस्तेमाल में आजादी बरत रहे हैं। बोलचाल की भाषा में गालियों का इस्तेमाल सामान्य है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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