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जो फिल्म की भाषा है, वही भाषा संगीत बोलेगा

By Super
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“दर्दे डिस्को" से एक बार फिर चर्चा में आए सुखविन्दर पहली बार राजकुमार संतोषी की फिल्म “हल्ला बोल" में न सिर्फ संगीत दे रहे हैं बल्कि बैकग्राउंड संगीत भी दे रहे हैं. इस सिलसिले में हमनें उनसे बात की और उनके विचार जानें.

फिल्म “हल्ला बोल" के माध्यम से पहली बार आपने बैकग्राउंड म्यूज़िक दिया है। उसका अनुभव कैसा रहा ?

बहुत ही अच्छा रहा. कई बार निर्देशक गीत के संगीत से बैकग्राउंड म्यूज़िक को भी पसंद कर लेते हैं. जब मैंने संतोषी जी की फिल्म “हल्ला बोल" के लिए संगीत तैयार किया तभी संतोषी जी ने गीत के संगीत के आधार पर मुझे बैकग्राउंड म्यूज़िक का काम भी सौप दिया. उन्हें लगा कि जिस दीवानगी से उन्होंने फिल्म निर्देशित की है, उसी दीवानगी से मै उनके फिल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक भी तैयार करूंग. मुझे खुशी है कि मैंने उन्हें निराश नहीं किया.

बैकग्राउंड म्यूज़िक तथा म्यूज़िक, इन दोनों में कौन सी चीज़ आसान है ?

देखिए कठिन तो दोनों ही है. हां बैकग्राउंड म्यूज़िक तैयार करने के लिए वक्त के साथ साथ काफी जानकारियों की भी ज़रूरत होती है. इस बैकग्राउंड म्यूज़िक को तैयार करने में मुझे 90 दिन लगे. इसे मैंने काफी दिलों जान से बनाया है. 90 दिन काम करने के बावजूद इसमें मेरी दिलचस्पी बरकरार थी. यदि मुझे इसमें 150 दिन भी लगते तब भी मेरी दिलचस्पी इसमें कम नहीं होती बल्कि उतनी ही रहती जितनी पहले थी. कई बार चार मिनट का गाना तैयार करने में भी हम ऊब जाते हैं और कई बार दो ढाई घंटे की फिल्म भी बोझिल नहीं लगती.

इस फिल्म में आपने गुरुबानी गाई है. यह आपका फैंसला था या राजकुमार संतोषी जी का फैंसला था ?

इस फिल्म में गुरुबानी रखने का फैंसला हम दोनों का था. संतोषी जी ने इस फिल्म में एक ऐसा सिक्वेंस रखा था, जिसमें कोई पाकिज़ा गीत ही अच्छा लगता सो मैंने गुरुबानी रखने का सुझाव दिया. उसके बाद मैंने उसका प्रस्तुतीकरण किया तो वे न सिर्फ खुश हुए बल्कि उसे गाने की ज़िम्मेदारी भी मुझ पर सौंपी. जब उन्होंने मुझे इसे गाने को कहा तो मेरे रोंगटे खडे हो गए. इस फिल्म में एक तरफ मैंने एक क्रांतिकारी गीत “अंग अंग ज़ख्मी है मेरा" गाया है तो दूसरी तरफ मैंने गुरुबानी भी गाई है. इस फिल्म में गुरुबानी गाना मेरे लिए सौगात है. यह गुरुबानी इस बात की तरफ इशारा करती है कि समाज से नकारात्मक पक्ष को हटाने के लिए हथियार की ज़रूरत नहीं है. हथियार आतंकवादी उठाते हैं, उग्रवादी नहीं. हम चाहें तो शांत रहकर भी अपनी बात कह सकते हैं.

इस फिल्म से पहले भी आपने “द लिजेंड ऑफ भगत सिंह" में राजकुमार संतोषी के साथ काम किया है. उनकी तरफ से कितना योगदान रहा ?

“द लिजेंड ऑफ भगत सिंह" के वक़्त हमारी इतनी जान पहचान नहीं थी. उन दिनों मैं अधिक ए आर रहमान के साथ रहता था। एक बार यूं ही किसी पार्टी में हमारी मुलाकात हुई. मुझे इस फिल्म के निर्माता सामी सिद्दीकी जी ने फिल्म “हल्ला बोल" के सिलसिले में संतोषी जी से मिलवाया. इस फिल्म के बारे में मैं पहले ही किसी से सुन चुका था. जहां तक संतोषी जी की बात थी, मैं जानता था कि ये एक्शन फिल्म ही बनांते हैं. सो हो न हो यह भी एक्शन फिल्म होगी. उसके बाद मैंने उस फिल्म का कुछ भाग देखा और उन्होंने मुझे फिल्म की पूरी कहानी सुनाई. उसके बाद मैंने उन्हें यूं ही कुछ सुनाया और यह चीज़ उन्हें पसंद आ गई. इसके बाद इस फिल्म के संगीत की ज़िम्मेदारी उन्होंने मुझ पर सौंप दी.

इस फिल्म में संगीत के साथ बैकग्राउंड संगीत और गुरुबानी आपने गाई है. आपके अनुसार “हल्ला बोल" के संगीत की खासियत क्या है ?

जो हर संगीतकार सोचता है - अच्छा.

ये तो अपेक्षा हुई. मैंने खासियत पूछी है ?

खासियत यह है कि इस फिल्म का संगीत बनाते वक़्त हमारे मन में कहीं भी ये बात नहीं थी कि हमें कुछ हटकर बनाना है. जैसा है ठीक है वाली सोच हमनें अपना रखी थी. जो फिल्म की भाषा है, वही भाषा संगीत बोल रहा है. यह अच्छे सिनेमा की पहचान है. मुझे लगता है यह इसकी खासियत है.

“ओम शांती ओम" के “दर्दे डिस्को" के बाद कहा जा रहा है कि आप शाहरूख खान के लिए काफी लकि साबित रहे ?

देखिए ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो यह कहना चाहूंगा कि इस गीत के लिए मेरे अलावा शाहरूख खान और फरहा खान ने भी दिलों जान से मेहनत की है. साथ ही इसमें विशाल शेखर के संगीत और जावेद साहब के गीत का भी योगदान है. यह पहला गीत नहीं है इससे पहले भी मेरे कई गीत पॉप्यूलर हो चुके हैं जो शाहरूख पर फिल्माए जा चुके हैं. उन दिनों भी लोग मुझसे यही कहते थे. मगर पहले मैं लक को नहीं मानता था मगर अब वाकई मानने लगा हूं. यह मेरी किस्मत है जो शाहरूख के साथ चमक उठती है. लेकिन इसके अलावा भी मेरे दूसरे गीत हैं जो पॉप्यूलर हुए हैं, लोग उन्हें क्यों भूल जाते हैं.

मगर यह तो आप भी मानेंगे कि इस गीत ने 42 साल में शाहरूख को और जवां कर दिया ?

देखिए शाहरूख के बारे में मैं यही कहना चाहूंगा कि वो उन कलाकारों में से हैं जो अच्छे अदाकार होने के अलावा बहुत प्रोफेशनल है. उनमें कुछ बात है जो आज वह बुलंदी पर हैं. शाहरूख के साथ मेरे कॉम्बिनेशन का जो जादू चला है वह ठीक है मगर उसके पीछे व्यावहारिक मेहनत को भी हम भूल नहीं सकते.

इस गीत को गाते वक़्त दर्द और डिस्को का कॉम्बिनेशन आपको कैसा लगा ?

मुझे तो यह गीत सूफियाना लगता है. सूफी गीतों में ही दर्द के साथ घुंघरू का ज़िक्र होता है. यही गीत क्यों, “छैया छैया" गीत में भी वही बात है. ये और बात है कि लोगों को वह नज़र नहीं आता. उसी गीत के दूसरे भाग में पीर बाबा बुल्ले शाह का कलाम हमनें लिया था - “तेरे इश्क नचाया कर थैया थैया". दरअसल सूफी गीतों में यही बात होती है वहां सीने में दर्द और पांव में घुंघरू होते हैं. किसी के दिदार की तलाश होती है तो सीने में दर्द उठता है. निगाहें तरसती हैं कि कब वो हमें दिखाई दे और उसे पाने के लिए हमारा मन इस कदर नाचने लगता है कि पांव में घुंघरू आ जाते हैं. “दर्दे डिस्को" गाते वक़्त मैंने वही चीज़ महसूस की. आम तौर पर माइक के सामनें गाते वक़्त हमें हिदायत दी जाती है कि बिल्कुल नहीं हिलना है मगर मैंने इस गीत को पूरी तरह से इंजॉय करके नाच नाचकर गाया. हालांकि यह बात मैंने पहले ही साफ कर दी थी.

इस गीत को सुनकर शाहरूख की क्या प्रतिक्रिया रही ?

हमारी फिल्म इंडस्ट्री में एक बात है. जब हम खुश होते हैं तो दिल खोलकर तारीफ करते हैं और जब नाराज़ होते हैं तो, या तो सलाह देते हैं या फिर बात करना छोड देते हैं. इस गाने के बाद फरहा मुझसे मिली, उसने मुझे दूर से देखकर चिल्लाते हुए कहा “सुख्खी, (जब लोग मुझसे खुश होते हैं तो मुझे सुखविंदर की बजाय सुख्खी कहते हैं) तुमनें तो कमाल कर दिया. तुम्हारी तरह कोई इस गीत को नहीं गा सकता था.“ इसी तरह दुबई के एक कॉंसर्ट में मेरी मुलाकात शाहरूख से हुई. पहले तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया और फिर कहा “यार तू कुछ कर देता है. लोग कहते हैं तू बर्फ खा लेता है, मिर्ची खा लेता है. फिर ये कमाल कैसे करता है यार. मुझे लगता है तेरे हाथों में कुछ जादू है तू कुछ कर देता है.“ यह सुनकर मेरा मन गदगद हो गया. इसका सारा प्रभाव फिल्म “चक दे इंडिया" के शिर्षक गीत पर पडा. मैंने भी सोचा “अब कुछ करिए".

अपनी आने वाली फिल्मों के बारे में बताइए ?

मैं एक बार में एक ही फिल्म करना पसंद करता हूं. इस फिल्म के बाद मैं सुभाष घई की आने वाली फिल्म “ब्लैक एंड व्हाइट" का संगीत तैयार कर रहा हूं. मुझे लगता है इस फिल्म का संगीत वही ऊंचाई पाएगा जो बरसो पहले “हीरो" के संगीत ने पाया था.

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