आज भी सदाबहार हैं खय्याम
पांच दशक लंबे संगीत सफर के दौरान खय्याम के खाते में लगभग 60-70 फिल्में आ चुकी हैं, मगर उनका सफर अभी भी जारी है. खय्याम के साथ खास बात यह है कि वे चुनिंदा फिल्मों में ही काम करते हैं. हाल में उनके संगीत का कमाल 'यात्रा' और 'मैं फिर आऊँगा' जैसी फिल्मों देखने को मिला.
खास बात यह है कि उन्हें इस साल महाराष्ट्र शासन की ओर से लता मंगेशकर पुरस्कार दिया जाएगा. फुटपाथ के 'शामे गम की कसम' में दुःख को प्यार से सहलाते, सहेजते विरह गीत से खय्याम सीधे लोगों के दिलों को छू गए. 'फिर सुबह होगी' के गीत सुनकर तो खुद आशा भोंसले ने उनको सराहा था.
बहारों मेरा जीवन भी संवारो (आखिरी खत) का गीत हो या फिर 'सिमटी हुई ये घड़ियां' जैसे बेचैन गीत हों, उनका अंदाज अलग है. उनके कुछ गीत हैं-'जीत ही लेंगे बाजी हम तुम'/'पर्वतों के पेड़ों पर साँझ का सवेरा है'/ 'और कुछ ठहर अभी'/ 'मैं पल दो पल का शायर हूँ'/ 'कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है'/ 'ठहरिए होश में आऊँ'/ 'आप यूँऽऽ, आप यूँ से चमकते रहे'/ 'दिखाई दे यूँ कि बेखुद किया'/ 'फिर छिड़ी रात बात फूलों की'/ 'ऐ-दिल-ए नादाँ या फिल्म त्रिशूल, उमराव जान, नूरी आदि ऐसे तमाम गीतों की चर्चा रही क्योंकि ये सभी बॉक्स ऑफिस पर हिट रहे.
कमाल अमरोही से उनका खास रिश्ता था. 'रजिया सुल्तान' के सभी गीत बेजोड़ रहे जिसमें 'ए-दिल-ए-नादां' तो सीधे आपके अंतर्मन से बातें करता है. 'शंकर हुसैन' का 'कहीं एक मासूम नाजुक-सी लड़की' गीत भी उनके चाहने वालों को याद ही होगा.


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