मोहम्मद रफी : वो जब याद आये..बहुत याद आये
संगीत के पुरोधा कहते हैं.. बॉलवुड में कभी के. एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे समेत जैसे गायकों के पास शास्त्रीय गायन की विरासत थी, संगीत की समझ थी लेकिन नहीं थी तो वो थी आवाज । जिसे रफी ने पूरा किया। सन 1952 में आई फिल्म 'बैजू बावरा' से उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान बनायी ।
1965 में पद्दमश्री से नावाजे जा चुके रफी साहब को 6 बार फिल्मफेयर अवार्ड मिल चुका है। उनके गाये गीत .. चौदहवीं का चांद हो, हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं, तेरी प्यारी प्यारी सूरत को (फ़िल्म - ससुराल), ऐ गुलबदन (फ़िल्म - प्रोफ़ेसर), मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की क़सम (फ़िल्म - मेरे महबूब ), चाहूंगा में तुझे, छू लेने दो नाजुक होठों को (फ़िल्म - काजल), बहारों फूल बरसाओ(फ़िल्म - सूरज)
बाबुल की दुआएं लेती जा (फ़िल्म - नीलकमल), दिल के झरोखे में (फ़िल्म - ब्रह्मचारी), खिलौना जानकर तुम तो, मेरा दिल तोड़ जाते हो(फ़िल्म -खिलौना ), हमको तो जान से प्यारी है (फ़िल्म - नैना), परदा है परदा (फ़िल्म - अमर अकबर एंथनी), क्या हुआ तेरा वादा (फ़िल्म - हम किसी से कम नहीं ), आदमी मुसाफ़िर है (फ़िल्म - अपनापन), चलो रे डोली उठाओ कहार (फ़िल्म - जानी दुश्मन), मेरे दोस्त किस्सा ये (फिल्म - दोस्ताना), दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-ज़िगर(फिल्म - कर्ज), मैने पूछा चांद से (फ़िल्म - अब्दुल्ला).. आज भी बजते हैं तो लोग उनकी आवाज में खो जाते हैं।


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