75 साल के गुलज़ार साहब का दिल आज भी बच्चा है

गुलज़ार ने अभी तक 20 से अधिक फिल्मफेयर,कई राष्ट्रीय पुरुस्कार के और अंतर्राष्ट्रीय ग्रैमी अवार्ड अपने नाम कर चुकें हैं। साहित्य में बेहतरीन योगदान के चलते उन्हें पद्मभूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा चा चुका है। आइये जब जिक्र गुलज़ार साहब का हो रहा है तो कुछ नग्मों को हम भी गुनगुना लेते हैं। क्योंकि बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...
गुलज़ार साहब का आगमन 1961 में गंगा आए कहां से के एक गीत से हुआ जो फिल्म काबुलीवाला से था, और तब से आज तक यानी पांच दशकों से गुलज़ार साहब ने हमें अपना दिवाना बनाया हुआ है।
60-70 के दशक में... मोरा गोरा अंग लई ले 'बंदिनी', तुम्हें जिंदगी के उजाले मुबारक 'पुर्णिमा', वो शाम कुछ अजीब थी... फिल्म सफर और हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबु 'खामोशी' ये एक ऐसे नग्में हैं जिसे हर वो शख्स गुनगुनाता है जब वो तनहाई में होता है।
70-80 के दशक में आई कुछ फिल्मों में ... हालचाल ठीक ठाक है 'मेरे अपने', तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा 'आंधी ' दिल ढूंढता है फ़िर वहीं 'मौसम' जैसे गीतों ने धमाल मचा दिया। इस दशक में गुलज़ार को मौसम के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। दो दीवाने शहर में 'घरौंदा', और आने वाला पल जाने वाला है 'गोलमाल' को सर्वश्रेष्ठ गीत का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। इस तरह से संगीत जगत में एक नयी आंधी आ गयी। आज भी लोग आंधी के गाने सुनना पसंद करते हैं।
फिर आया दौर 80-90 के दशक का, इसमें थोड़ी सी बेवफ़ाई, बसेरा, मासूम, सदमा, इजाजत, लिबास जैसी फ़िल्मों में गुलज़ार ने कई गीत लिखे। आंखों में हमने आपके सपने सजाये हैं... इस गीत से कई लोगों की आंखों में एक नया रंग दिखाई देने लगा तो वहीं, इनके गानों में उदासी भी देखी गयी। फिल्म इज़ाजत का गाना ... मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है.... आज भी जब बजता है तो आंखें नम हो जाती हैं।
1990-2000 के दशक में बनी फिल्मों का सबजेक्ट चेंज हो चला था। इस दौर में बॉलीवुड में गीतकारों की कई जमात आई लेकिन गुलज़ार ने इस दौर में भी यह साबित कर दिया कि ओल्ड इज़ गोल्ड । वो फिल्म इंडस्ट्री में उस बूढ़े बरगद की तरह हैं जिनकी जड़े आज भी गहरी हैं। हां इस दौर में उन्होंने फ़िल्मों की संख्या जरुर कम कर दी। इस दशक में उन्होंने लेकिन फिल्म में 'यारा सीली सीली' लिखा तो वहीं सत्या में 'गोली मार भेजे में'से युवाओं का दिल जीत लिया। फिल्म माचिस के चप्पा चप्पा चरखा चले और छोड़ आये हम वो गलियां लिख कर गुलज़ार ने जता दिया कि उनकी शायरी में आज भी कशिश है। फिल्म चाची ४२० में 'चुपड़ी चुपड़ी चाची' के जरिए उनका बालसुलभ अंदाज लोगों के सामने आया। इसके बाद दिल से. . के सभी गाने लोगों ने पसंद किये और. . चल छैयां छैयां को फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला।
वर्तमान दौर यानी 2000- 2010
आज के दौर में भी गुलज़ार की आग कम नहीं हुई बल्कि और तेज हुई है। फ़िजां, अक्स, फ़िलहाल, अशोका, साथिया, चुपके से, पिंजर, मकबुल, रु-ब-रु, बंटी और बबली, झुम बराबर झुम, नो स्मोकिंग, दस कहानियां, युवराज, बिल्लु, स्लमडाग मिलेनर, कमीने जैसी फिल्मों के लिए भी गुलज़ार ने गाने लिखे हैं।
इस दौर में गुलज़ार की गूंज विश्व भर में गूंजी। कभी. . हल्के हल्के बोल दिल के. . और भी करीब होते गये तो, कमीने के .. धन ते नान से अपनी कलम का लोहा मनवा लिया। कजरारे कजरारे गाने से तो इन्होंने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्डस तोड़ दिये। इसके अलावा ये 2011 में अभी सात खुन मांफ, रावण, इश्किया, और वीर के लिए भी गाने लिखें है।
हिन्दी सिनेमा में आज गीतकार के रूप में पचास साल पूरा करने जा रहे हैं गुलज़ार ने कई फिल्मों के लिए गीत लिखें हैं
इन गीतों में काफी विविधता है लेकिन उनका जुड़ाव रात, चांद, धूप, प्रेम, और विरह से ही रहता है। यही तो ज़िदगी है। हमें गुलज़ार ने अपने गीतों के ज़रिए ही सही लेकिन जिंदगी के अकेलेपन, उदासी से बाहर लाते है। 2010 आज इतने दशकों के बाद भी गुलज़ार दिल से जवां ही हैं मुहब्बत उनकी कलम की ताकत है इनके लिए यह कहना ही काफी है....
वो पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट
कानों में एक बार पहन के लौट आई थी
पतझड़ की वो शाख अभी तक काँप रही है
वो शाख गिरा दो,
मेरा वो सामान लौटा दो...


Click it and Unblock the Notifications











