तुम मुझे यूं भुला न पाओगे

स्वर सम्राट मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि देश भर में उन्हें याद किया और उनके गीत गूंज उठे। इस मौके पर जयपुर में एमएनआईटी एलम्नी एसोसिएशन ने रविवार रात रवींद्र मंच पर स्वर सम्राट मोहम्मद रफी की याद में 'मेरी आवाज सुनो" कार्यक्रम आयोजित किया। इसके सीधे प्रसारण के साथ रफी के गानों पर आधारित वेबसाइट चैनल की शुरुआत हुई। फ्यूचर टैक्नोलॉजी कंपनी के इस वेबसाइट चैनल का लोकार्पण संगीतकार समीर सेन ने किया। समीर सेन ने अपने कंपोज किए गीतों, रफी के गीतों 'हम तुमसे न कुछ कह पाए" तथा 'देवता तुम हो मेरा सहारा" सहित कई गीतों को अपनी आवाज दी।
नौशाद को भा गए थे रफी
हिंदी सिनेमा का यह वह दौर था जब कमोबेश सभी पाश्र्वगायक कहीं न कहीं सहगल के मैनेरिज्म से प्रभावित थे, रफी भी इसके अपवाद न थे। एक बात जो उन्हें अपने समय के चुनिंदा गायकों से बिल्कुल अलग करती थी वह थी उनकी आवाज की विविधता और रेंज। संगीत के जानकार बताते हैं कि के. एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे समेत जैसे गायकों के पास शास्त्रीय गायन की विरासत थी, संगीत की समझ थी लेकिन नहीं थी तो आवाज की वह विविधता जो एक पाश्र्वगायक को परिपूर्ण बनाती है। इस कमी को रफी ने पूरा किया। सन 1952 में आई फिल्म 'बैजू बावरा' से उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की। इस फिल्म के बाद रफी नौशाद के पसंदीदा गायक बन गए। उन्होंने नौशाद के लिए कुल 149 गीत गाए जिनमें से 81 एकल थे।
बिछड़े सब बारी बारी...
इसके बाद रफी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और हिंदी फिल्म जगत के प्राय: सभी धुरंधर संगीतकारों ने उनकी जादुई आवाज को अपनी धुनों में ढाला। इनमें श्याम सुंदर, हुसनलाल भगतराम, फिरोज निजामी, रोशन लाल नागर, सी. रामचंद रवि, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, ओ.पी. नैय्यर, शंकर जयकिशन, सचिन देव बर्मन, कल्याण जी आनंद जी आदि शामिल थे। यूं तो रफी के गाए शानदार गीतों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन 'यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है- जुगनू', 'इस दिल के टुकड़े हजार हुए- प्यार की जीत', 'सुहानी रात ढल चुकी- दुलारी', ओ दुनिया के रखवाले, मन तड़पत हरि दरसन को आज'-बैजू बावरा', 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए-प्यासा', 'बिछड़े सभी बारी बारी'-कागज के फूल आदि उनके कुछ सार्वकालिक महान गीतों में शुमार किए जाते हैं।


Click it and Unblock the Notifications