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INTERVIEW: भारत में औरतों को आज भी 'सेकेंड क्लास सिटिज़न' ही माना जाता है- सोनम कपूर

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सोनम कपूर और दुलकर सलमान अभिनीत फिल्म 'द जोया फैक्टर' इस शुक्रवार रिलीज़ होने वाली है। ऐसे में फिल्मीबीट ने एक्ट्रेस सोनम कपूर से मुलाकात की, जहां उन्होंने अपनी फिल्मों के चुनाव से लेकर कई विषयों पर खुलकर अपना पक्ष रखा। सामाजिक मुद्दों पर मुखरता से बात करने वालीं सोनम कपूर ने कहा, भारत में आज भी महिलाओं को सेकेंड क्लास सिटीज़न ही समझा जाता है, आज भी महिलाएं अपनी जगह बनाने के लिए जूझ रही हैं। यह बदलने की जरूरत है।

सोनम कहती हैं, फेमिनिस्ट होने का मतलब यह नहीं कि आप मूछें उगा लें या ब्रा जलाने लगें। इसका मतलब होता है बराबरी (equality), हर क्षेत्र में। समाज में महिलाओं के साथ हमेशा से भेदभाव होता आया है। अच्छी बात है कि अब धीरे धीरे बदलाव आ रहा है। लोग इस पर बात कर रहे हैं।

यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

असल ज़िंदगी में क्रिकेट से कितनी जुड़ी हैं या उसे कितना एन्जॉय करती हैं?

असल ज़िंदगी में क्रिकेट से कितनी जुड़ी हैं या उसे कितना एन्जॉय करती हैं?

मुझे लगता है हमारे जेनरेशन का क्रिकेट से एक अलग ही कनेक्शन था। मुझे ये आईपीएल या 20-20 फॉर्मेट समझ में नहीं आता। मेरे लिए आज भी क्रिकेट का मतलब वन डे मैच होता है। शायद इसीलिए अब क्रिकेट से वैसा कनेक्शन नहीं रह गया है। उतना फॉलो नहीं कर पाती हूं, लेकिन हां, वर्ल्ड कप मैंने देखा था।

द ज़ोया फैक्टर की किस बात ने आकर्षित किया?

द ज़ोया फैक्टर की किस बात ने आकर्षित किया?

दरअसल, लंबे समय से मैंने कोई हल्की फुल्की रोमांटिक फ़िल्म नहीं की थी। मेरी ऐसी आख़िरी फ़िल्म 'खूबसूरत' थी। उसके बाद नीरजा हो, मिल्खा सिंह हो या एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, सभी फ़िल्में गंभीर विषय से जुड़ी थीं। इसीलिए मैंने द ज़ोया फैक्टर को हां कहां। साथ ही इस फिल्म से जुड़े लोग मुझे पसंद हैं।

फ़िल्मों के चयन को लेकर आप हमेशा काफ़ी चुनिंदा रही हैं, कम फ़िल्में करती हैं। ऐसे में किसी फ़िल्म को साइन करते समय किन बातों पर फ़ोकस रहता है?

फ़िल्मों के चयन को लेकर आप हमेशा काफ़ी चुनिंदा रही हैं, कम फ़िल्में करती हैं। ऐसे में किसी फ़िल्म को साइन करते समय किन बातों पर फ़ोकस रहता है?

अच्छी कहानी और अच्छी टीम। किसी फ़िल्म की स्क्रिप्ट मुझे कितनी भी अच्छी लगे, लेकिन अगर उसके निर्देशक या उसकी टीम मुझे पसंद नहीं आएगी तो वो फ़िल्म मैं साइन नहीं करूंगी। मुझे खुशी खुशी काम पर जाना पसंद है। इसके अलावा मैं देखती हूं कि फिल्म की कहानी में मेरे किरदार की कितनी अहमियत है। रोल छोटा हो या बड़ा, किरदार में दम होना चाहिए।

फ़िल्म पैडमैन को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके लिए आपको भी ढेरों बधाई। कैसा महसूस कर रही हैं?

फ़िल्म पैडमैन को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके लिए आपको भी ढेरों बधाई। कैसा महसूस कर रही हैं?

बहुत खुश हूं। यह हम सभी के लिए काफ़ी खास फ़िल्म थी। यह सामाजिक मुद्दे से जुड़ी हुई थी और इसका मेसेज काफ़ी महत्त्वपूर्ण था। लिहाजा ऐसी फ़िल्मों को जब पहचान मिलती है तो बहुत ही संतुष्टि महसूस होती है। हम चाहते थे कि यह फ़िल्म ज़्यादा से ज़्यादा लोग देखें और इसके मेसेज को समझें।

आपकी फ़िल्म द जोया फैक्टर क्रिकेट से जुड़ी हुई है, ऐसे में आपको नहीं लगता कि महिला क्रिकेट टीम को भी आगे लाने के लिए कुछ किया जाना चाहिए?

आपकी फ़िल्म द जोया फैक्टर क्रिकेट से जुड़ी हुई है, ऐसे में आपको नहीं लगता कि महिला क्रिकेट टीम को भी आगे लाने के लिए कुछ किया जाना चाहिए?

सिर्फ़ क्रिकेट ही नहीं, किसी भी क्षेत्र को देखें तो भारत में महिलाओं को बतौर सेकेंड क्लास सिटिज़न ही देखा जाता है। आज भी हम कन्या भ्रूण हत्या से जूझ रहे हैं। हमारे देश के लिए महिलाएं ही मेडल जीतकर ला रही हैं, चाहे वो कोई भी खेल हो। इसीलिए मुझे लगता है सिर्फ महिला क्रिकेट टीम को ही नहीं बल्कि हर महिला खिलाड़ी को और प्रोत्साहन देने और सम्मान देने की ज़रूरत है।

सामाजिक मुद्दों को लेकर आप काफ़ी मुखर रही हैं। आपके अनुसार इस वक्त किन बातों को सामने लाने की ज़रूरत है?

सामाजिक मुद्दों को लेकर आप काफ़ी मुखर रही हैं। आपके अनुसार इस वक्त किन बातों को सामने लाने की ज़रूरत है?

मुझे लगता है कि पहले हमें बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए, जैसे कि औरत और मर्द की बराबरी हर क्षेत्र में, वेतन में बराबरी, भूखमरी, घर - इन सब ज़रूरतों को पहले पूरा करना चाहिए। इसके बाद ही हमें अन्य मुद्दों की ओर रुख करना चाहिए।

आज से 4-5 साल पहले आपने वेतन की असमानता पर आवाज़ उठाई थी। आज इस मुद्दे पर खुलकर बातें हो रही हैं। अब इस बारे में आपका क्या सोचना है?

आज से 4-5 साल पहले आपने वेतन की असमानता पर आवाज़ उठाई थी। आज इस मुद्दे पर खुलकर बातें हो रही हैं। अब इस बारे में आपका क्या सोचना है?

हां मुझे खुशी है कि कम से कम अब इस पर खुलकर बात हो रही है। कई अन्य अभिनेत्रियां भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रख रही हैं। लेकिन साथ ही मुझे लग रहा है कि इस पर काम काफ़ी धीमे हो रहा है। मुझे याद है आज से 9-10 साल पहले, मैंने किसी इंटर्व्यू में कहा था कि हां मैं फेमिनिस्ट हूं, तो कई लोगों ने मुझे सवालिया नज़रों से देखा था। मेरी टीम ने मुझे सलाह दी थी कि मैं ऐसा नहीं बोल सकती। कई अभिनेत्रियों ने भी कहा था कि वो फेमिनिस्ट नहीं हैं। लेकिन मैंने हमेशा से यही समझा है कि फेमिनिस्ट होने का मतलब सिर्फ बराबरी (equality)है। आज सब उन्हीं मुद्दों को लेकर सामने आए हैं। लंबे समय के यह सारी बातें चली आ रही हैं, लेकिन अच्छी बात है कि लोगों में अब इस पर खुलकर बात करने की हिम्मत आ रही है।

किस्मत या अंधविश्वास पर आपको कितना यकीन है?

किस्मत या अंधविश्वास पर आपको कितना यकीन है?

सच कहूं तो मैं भी थोड़ी अंधविश्वासी हूं। काली बिल्ली का रास्ता काटना, नींबू मिर्ची, काले कपड़े पहनना - कहीं न कहीं इन बातों को सभी मानते हैं। लेकिन मेरा यह सोचना है कि कभी किसी बात को लेकर इतना अंधविश्वास नहीं होना चाहिए कि जिससे आपको या दूसरों को नुकसान हो।

फिल्म द जोया फैक्टर अनुजा चौहान की लिखी एक किताब पर आधारित है। इस फिल्म में आप देखेंगे कि कैसे एक युवा लड़की भारतीय क्रिकेट टीम के लिए भाग्यशाली साबित होती है। फिल्म का निर्देशन किया है अभिषेक शर्मा ने।

English summary
In an interview with Filmibeat, actress Sonam Kapoor says, In India women are still considered as a second class citizen, this needs to be changed.
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