..................... हिमालय तब तोडूंगी जब मेरा हिमालय कोई तोडे़गा, Nobody is in my place right now - Hindi Filmibeat

हिमालय तब तोडूंगी जब मेरा हिमालय कोई तोडे़गा

By Super

'तुलसी" से 'वृंदा" का सफर तय करती स्मृति ईरानी आज पसंदीदा कलाकार से पसंदीदा निर्माता बन चुकी है. कम उम्र में अधिक उपलब्धियां पाने वाले लोगों में स्मृति का शुमार होना किसी उपलब्धि से कम नहीं है यह स्वयं स्मृति भी मानती हैं. फिलहाल 'विरुद्ध" के बाद 'मेरे अपने" की सफलता का आनंद उठाती स्मृति से हमनें बात की उनके शो और भविष्य की योजनाओं पर.

'तीन बहुरानियां" में प्रवेश कैसे मुमकिन हुआ ?

दरअसल इस शो के निर्माता विमल भाई इस शो का प्रस्ताव लेकर मेरे पास आए. सास बहू से संबंधित कार्यक्रमों में अक्सर महिलाओं को प्रताडित होते दिखाया जाता है मगर जो किरदार उन्होंने मुझे दिया वह महिला आज की महिला को प्रदर्शित कर रही है. वह काम काज़ी है और अपनी बेटी के ससुराल में जाकर अधिकारों की बात करती है. हमारे समाज की यह मान्यता रही है जब महिलाएं अधिकार की बात करती है तो घर टूट जाता है. मगर वृंदा एक संदेश लेकर आती है कि महिलाएं घर को एक सूत्र में बांधे रखने के साथ साथ अपने अधिकारों के लिए भी लड सकती हैं.

क्या आपको उम्मीद है 'तीन बहुरानियां" में आपका प्रवेश बहुओं को राहत दिलाने में कामयाब हो पाएगा ?

मुझे लगता है यह एक अनोखी शुरूआत है. सास बहू के माध्याम से महिलाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि आप अपने सस्कारों तथा मूल्यों को अपने साथ लेकर चल रही हैं तो अच्छी बात है मगर अपने अधिकारों के बारे में जानने में हानि क्या है. मैं समझती हूं यह संदेश यदि हर घर की बेटी ले तो ले तो सास बहू के संबंधों में काफी सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं. बेटी को विदा करने से पहले हाम उसे काफी कुछ सीखाते हैं जिससे ससुराल में जाकर उसकी ज़िंदगी बेहतर हो. बेटी को यह कहा जाता है कि ससुराल को घर समझना जिससे ससुराल के लोग आपको बहू नहीं बेटी समझें.

स्मृति यह तो आपके किरदार की बात हुई, आपके नाम के संदर्भ में पूछना चाहूंगी। इस शो में आपका नाम 'वृंदा" है और 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी" में तुलसी था. दोनों का मतलब एक है. क्या यह को इंसिडेंट है ?

(हंसते हुए) देखिए दोनों कार्यक्रमों की न मैं निर्माता हूं और न लेखिका हूं. दोनों ही नाम मेरे दिए हुए नहीं हैं. मुझे लगता है यह सवाल आप इस शो के निर्माता से या चैनल से पूछे तो बेहतर होगा.

दर्शकों के लिए 'तुलसी" आज पौधे से शख्सियत बन चुका है. आपको लगता है 'वृंदा", नाम के माध्याम से आप उस मुकाम पर पहुंच पाएगी ?

जो नाम मैंने सात सालों में कमाया है उस ख्याति तक आज तक कोई नहीं पहुंचा है. मैं अपना हिमालय तब तोडूंगी जब मेरा हिमालय कोई पार कर लेगा.

इस शो के साथ प्रतियोगिता रखते हुए एकता कपूर 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी" में पार्वती को लाने वाली हैं. क्या लगता है उससे आपके शो की टी आर पी पर कितना फर्क पडेगा ?

मैं यही कहूंगी कि यदि यह सब मेरे प्रवेश के कारण हो रहा है तो मुझे लगता है इससे बडा कॉम्प्लिमेंट मुझे एकता के अलावा और कोई नहीं दे सकता था. मुझे पता नहीं था कि एक अदने कलाकार के किसी शो में आ जाने से इतना बडा भूचाल आ जाएगा. अब जहां तक बात टी आर पी की है उसके बारे में यदि आप चैनल से पूछें तो बेहतर होगा.

9x चैनल पर प्रसारित होने वाले शो 'मेरे अपने" की टी आर पी काफी अधिक है. क्या कहना चाहेंगी ?

मुझे खुशी है कि बतौर निर्माता 'विरुद्ध" के लिए पांच पुरस्कार जीतने के बाद मेरे इस शो को काफी पसंद किया जा रहा है. मेरी पहचान एक अच्छी निर्माता के रूप में बनना मेरे लिए बहुत बडी बात है. अब तक मैंने जो भी शो बनाए हैं उनमें दर्शकों को ज़रा भी बोरियत हो यह गुंजाइश नहीं रखी. 'मेरे अपने" के माध्यम से पारंपरिक कहानी कहने का एक अलग ही मज़ा है. मैं खुद उत्तर भारत से हूं सो जानती हूं कि उनका स्वाद कैसा होता है. बतौर निर्माता मेरे प्रोडक्शन ने डेढ साल में न सिर्फ दर्शकों में बल्कि इंडस्ट्री में एक जगह बनाई है.

'मेरे अपने" और 'विरुद्ध" के बाद और कितने शो आप लाने वाली हैं. हालांकि कई नए चैनल्स आ रहे हैं ?

इन दोनों के अलावा मैं और पांच शो लाने वाली हूं. मगर इन शो के बारे में मैं अभी कुछ नहीं कहना चाहूंगी. वादा करती हूं बहुत जल्द इस शो के साथ आपसे बात करूंगी.

इनके अलावा 'कुछ तुम कहो कुछ हम कहें" और 'मणीबेन डॉट कॉम", यह दो शो रहे हैं. इनके बारे में बताइए ?

यह दोनों हिंदी नाटक हैं जिन्हें व्यावसायिक स्तर पर मैंने लाया था. 'कुछ तुम कहो कुछ हम कहे" वर्ष 2006 में काफी सफल रहा. 'मणीबेन डॉट कॉम" गुजरात का अब तक का सबसे हिट व्यावसायिक नाटक रहा है.

क्या भविष्य में इन दोनों नाटकों को बतौर धारावाहिक प्रस्तुत करने का कोई इरादा है ?

(हंसते हुए) मैं हर कहानी को उस माध्यम तक रखती हूं जिसके लिए उसे तराशा गया है. अगर 'कुछ तुम कहो कुछ हम कहे" एक दो घंटे का नाटक है तो मैं उसे नाटक तक ही सीमित रखूंगी. यदि आप मेरे धारावाहिक देखें तो यह सब गुण आप उसमें पाएंगे. मैं बेवजह कहानी को लंबा खिंचने में विश्वास नहीं करती जिससे दर्शकों को बोरियत महसूस हो.

'शारदा पांडे", 'तुलसी विरानी", 'वसुधा" और 'वृंदा मौसी" में से आपके करीब कौन सा किरदार रहा है ?

मेरे हर किरदार में मेरे व्यक्तित्व का कुछ अंश झलकता है. मेरे सारे किरदार काल्पनिक होते हैं मगर मुझे उनसे प्यार है क्योंकि उन सभी ने मेरे जीवन में अपनी एक अलग छाप छोडी है.

आपने कहा था यदि बालाजी बुलाए तो मैं ज़रूर आउंगी. उस तरफ कितना विकास हो रहा है ?

यह सवाल आप बालाजी से पूछें तो बेहतर होगा.

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