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दर्शक तब भी तैयार थे और अब भी तैयार है

By Super

लंदन में बस चुके शेखर कपूर ने 1998 में “एलिज़ाबेथ" बनाकर हॉलीवुड के बेहतरीन निर्देशकों में अपना नाम लिखवा लिया. इस फिल्म ने यूं तो काफी अवार्ड्स जीते मगर हिंदुस्तान में अपनी पैठ नहीं बनाई. इसकी वजह थी हिंदुस्तान में इसका रिलीज़ न होना. फिलहाल “एलिज़ाबेथ" द्वितीय के साथ शेखर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. मगर इस बार उसकी असली वजह है इस फिल्म का 23 नवंबर को भारत के हर शहर में रिलीज़ होना. कई खूबसूरत फिल्मों के माध्यम से हिंदुस्तानी दर्शकों की जान शेखर कपूर का अपनी हॉलीवुड फिल्म के साथ एक बार फिर भारत लौटना कई संभावनाओं को पैदा कर रहा है. फिल्म “एलिज़ाबेथ - द गोल्डन एज" के साथ उन्हीं संभावनाओं पर हमनें उनसे बात की.

इस फिल्म के लिए, विशेष रूप से कपडों का चयन किस तरह से किया है, जिसके लिए आपकी पिछली एलिज़ाबेथ को ऑस्कर एवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया था ?
जी हां इस फिल्म के लिए हमनें काफी शोध किया. मैं काफी लोगों से मिला. उस समय “क्या रहा होगा" यह सोचने की बजाय हमनें यह सोचा कि “कैसा हो सकता है". उदाहरण के तौर पर अपने तथा अपने कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर के बीच कपडों के कलर को लेकर हुए विवाद का ज़िक्र करना चाहूंगा. यदि आप मां मरियम को देखें तो पाएंगी कि वह अक्सर नीले रंग में दर्शाई जाती हैं जिससे वह अधिक पवित्र जान पडती है. सो मैंने भी अपनी प्रमुख नायिका के लिए उसी रंग का चुनाव किया. हालांकि इंग्लैंड में इस रंग को पवित्र नहीं बल्कि इच्छा के समकुल माना जाता है. सो मेरे कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर ने मुझे इस कलर को न लेने का सुझाव दिया मगर उसके विपरित मैंने इसी कलर का चयन किया. हमारे शोध में यह बात भी सामने आई थी कि उस समय नीला रंग काफी महंगा हुआ करता था.

ब्रिटिश सरकार ने हम पर दो साल तक राज किया है आपको लगता है ब्रिटेन की महारानी पर आधारित इस फिल्म को भारतीय सकारात्मक नज़रिए से देखेंगे ?
यह तो मुझे नहीं पता.

सुना है आप एक बार फिर पन्द्रह साल पहले बंद हो चुकी फिल्म “टाइम मशीन" बनाने जा रहे हैं ?
जी हां. इस फिल्म की कहानी मैंने और मेरे मित्र करन राजदान ने मिलकर लिखी थी. इन पन्द्रह सालों में मेरे तथा करन के पास इस कहानी के लिए कई प्रस्ताव आ चुके हैं. सो हमनें सोचा कि चलो हम ही इस फिल्म को बना लें. दरअसल उस वक़्त कई लोगों का यह भी कहना था कि यह कहानी अपने वक़्त से बहुत आगे है. हालांकि मेरी सभी कहानियां वक़्त से आगे की रहती हैं. इस फिल्म के बंद होने की दूसरी वजह निर्माता तथा सितारों के बीच तारीख को लेकर हुई झडप थी.

“टाइम मशीन" की कहानी और सितारे वही होंगे या कुछ अलग होंगे ?
कहानी तो वही है. आज के परिदृश्य में वह कहानी बिल्कुल फिट है. हां सितारे ज़रूर अलग होंगे. जिन सितारों का चयन उस वक़्त किया गया था वह आज उस फिल्म के लिए फिट नहीं है. फिलहाल मैं इस फिल्म के लिए निर्देशक की तलाश में हूं.

क्या आपको नहीं लगता बॉलीवुड की सभी कहानियां वक़्त से आगे रहती हैं क्योंकि उनमें सच्चाई से अधिक फैंटसी होती है ?
जी नहीं. फैंटसी और वक़्त से पहले दो अलग अलग चीज़ें हैं. फैंटसी अपने वक़्त की भी हो सकती है और आगे की भी हो सकती है. मगर यह तब की बात है जब भारत में फिल्म बनाने के लिए महज़ चार विषय हुआ करते थे. मैं चाहता था उन विषयों से कुछ हटकर फिल्म बनाई जाए मगर मुझे लोग कहते थे “नहीं अभी भारतीय दर्शक इस तरह की फिल्मों के लिए तैयार नहीं है". मगर “रंग दे बसंती", “मुन्नाभाई एम बी बी एस" तथा “चक दे इंडिया" के बाद इस तरह की फिल्मों के लिए संभावनाएं काफी बढ गई है.

क्या आपको नहीं लगता कि बॉनी कपूर की फिल्म “मिस्टर इंडिया" भी अपने समय से काफी आगे थी ?
बिल्कुल थी. मुझे उस फिल्म के लिए भी उस वक़्त काफी लोगों ने कहा था. मगर यह फिल्म काफी हिट रही. मज़े की बात यह है कि “मिस्टर इंडिया" बनाने वाले निर्माता बॉनी कपूर को भी “टाइम मशीन" वक़्त से आगे लगी थी. आज माहौल बदल चुका है. दरअसल फर्क निर्माता तथा वितरकों के नज़रिए में था. दर्शक तब भी अलग फिल्मों के लिए तैयार थी और आज भी है.

फिल्म “मासूम" और “मिस्टर इंडिया" के बाद आपने बॉलीवुड में काफी कम फिल्में बनाई. कोई खास वजह ?
कोई खास वजह तो नहीं है. मुझे लगता है आखिर कितने दिनों तक मैं काम करूंगा. जब से मैं यहां से गया हूं तब से “बैंडिट क़्वीन", “फोर फिदर्स", “एलिज़ाबेथ 1" तथा “एलिज़ाबेथ 2" बनाई. उसके अलावा ए आर रहमान के साथ कुछ दिनों तक काम किया. फिर अपनी एक कॉमिक बुक कंपनी खोली. वह कंपनी काफी सफल रही. मैं इतना व्यस्त था कि मुझे खुद को याद नहीं कि इससे पहले मैं कब दो हफ्ते भारत में फुर्सत से था. पहले मेरे तीन घर हुआ करते थे - लंदन, अमेरिका और भारत. अब लंदन छोड दिया है. अब मैं भारत में अधिक से अधिक रहना चाहता हूं.

तो क्या भारत में रहकर एक बार फिर अपनी जडों की ओर लौटना चाहेंगे ?
मैं तो अपनी जडों से दूर कभी गया ही नहीं. जहां तक फिल्में बनाने की बात है पहले जो मैं पन्द्रह बीस कहानियां लिखा करता था और लोग उसका मज़ाक उडाया करते थे आज वह सभी कहानियां आज प्रासंगिक हो गई है. तब मैं “पानी" नहीं बना सकता था. मगर आज लोग कहते हैं कि वाह क्या कहानी है.

आपके अनुसार यह बदलाव फिल्मकार की तरफ से आए हैं या दर्शकों की तरफ से ?
विशेष रूप से यह बदलाव फिल्मकारों की तरफ से आए हैं. दर्शक तो 1940 में भी तैयार थे और आज भी तैयार हैं. दरअसल दर्शक काफी सुलझे हुए होते हैं. उनकी कल्पना शक्ति काफी ज़बर्दस्त होती है. यदि उन्हें बोर किए बिना दिलचस्प फिल्म दिखाई जाए तो वे अवश्य देखेंगे.

देश और विदेश दोनों जगह आपका नाम बेहतरीन निर्देशकों में लिया जाता है. क्या वजह है कि भारत से अधिक दूसरे देशों में फिल्में बनाते हैं ?
क्योंकि मैं अलग विषयों पर फिल्में बनाना चाहता था जो उस समय यहां संभव नहीं था. मैं नेल्सन मंडेला पर फिल्म बनाना चाहता था मगर नहीं बना सका. शायद आपको पता हो “बैडिट क्वीन" बनाने के लिए पैसा बाहर से आया था. उस समय अलग फिल्मों के लिए पैसा नहीं मिलता था और पैसों के बगैर फिल्में नहीं बनती. आज ऐसा नहीं है. आज लोग ऐसी फिल्मों के लिए बडी से बडी रकम लगाने को तैयार है.

आपकी फिल्मों को बनने में काफी समय लगता है. इसकी क्या वजह है ?
ऐसा बिल्कुल नहीं है. “एलिज़ाबेथ - द गोल्डन एज" 70 दिन में बनी थी, पिछली “एलिज़ाबेथ" 65 दिन में बनी थी, “फोर फिदर्स" 90 दिन में बनी थी. फिर मासूम मैंने 44 दिन में बनाई थी. मैं तो फिल्में जल्दी बना देता हूं. दरअसल एक शेड्यूल बनाकर फिल्म बनाएं तो फिल्म जल्दी बन जाती है. फिल्म में जब ज्यादा वक़्त लगने लगता है तो मैं बहुत इम्पेशेंट हो जाता हूं. मुझे लगता है फिल्मों के प्रति पैशन है तो जल्दी बनाओ और बनाकर खत्म करो. बीच में रुकावट आने से काम खराब हो जाता है.

अपनी लार्जर दैन लाइफ फिल्मों के लिए सितारों के चयन में क्या कभी कोई परेशानी आई ?
मैंने स्टार्स के साथ कभी फिल्म ही नहीं बनाई सो परेशानी का सवाल ही नहीं उठता. स्टार्स के साथ परेशानी यह होती है कि 15-20 फिल्में करने के बाद उन्हें अपनी शक्ल की आदत पड जाती है, जिसे तोडना काफी मुश्किल होता है. “मासूम" में नसीरुद्दीन और शबाना स्टार नहीं थे. “मिस्टर इंडिया" के वक़्त श्रीदेवी और अनिल कपूर नए थे, वो भी स्टार नहीं थे. फिर उसके बाद “जोशीले", जो मैंने अधूरी छोड दी, उसमें भी सब नए थे. “एलिज़ाबेथ" में बेन क्लांचेट को हम ढूंढकर लाए थे. आज वह भले ही बडी स्टार हो गई हों मगर पहले भाग में एलिज़ाबेथ वह थी सो इस भाग में भी हमनें एलिज़ाबेथ बनाना उन्हें ही मुनासिब समझा. स्टार की तरफ से ही नहीं दर्शकों की तरफ से भी फिर अपेक्षाएं काफी बढ जाती है.

अपनी आगामी फिल्म “पानी" के बारे में बताइइए ?
पानी एक ऐसे शहर की कहानी है, जो दो शहरों में बंट गया है. एक ऊंचा शर है और एक नीचा शहर है. ज़मीन की कमी के कारण कई फ्लायओवर बन गए हैं और उन फ्लायओवर पर एक शहर बन गया है जो ऊंचा शहर कहलाता है. इस शहर में महज़ 15% लोग रहते हैं क्योंकि यह काफी अमीर शहर है. बाकि के 85% लोग नीचे शहर में रहते हैं. फ्लायओवर पर बसे ऊंचे शहर के कारण नीचे शहर के लोगों को ना रात को चांद दिखता है और ना सुबह सूरज की रोशनी मिलती है. ऐसे में ग्लोबल वार्मिंग अधिक होने से नदियां बहनी बंद हो गई हैं. जितना पानी है वह ऊपर वाले खिंच लेते हैं और नीचे वालों को बूंद बूंद करके देते हैं. खाने के बगैर हम हफ्ता रह सकते हैं मगर पानी के बगैर एक दिन भी रहना मुश्किल है. यह कहानी है पानी की महंगाई की. आनेवाले समय में ही क्यों ? आज एक लिटर बोतलबंद पानी की किमत 15-20 रुपए हैं जो सामान्य आदमी के बजट से बाहर की चीज़ है. यह पानी अमीरों के स्विमिंग पूल में बहते पानी से भी महंगा है. पानी उस समय की कहानी है जब इंसान इन सबके खिलाफ विद्रोह करता है.

“मासूम" और “मिस्टर इंडिया" के बाद बच्चों की कोई फिल्म बना रहे हैं ?
जी हां मैने बच्चों की एक कहानी लिखी है - मंत्रा. इसके लिए मैं एक निर्देशक ढूंढ रहा हूं क्योंकि मेरे हाथ में कई फिल्में हैं. यदि सभी फिल्मों को मैं निर्देशित करूं तो काफी देर हो जाएगी. इससे बेहतर है किसी अच्छे निर्देशक को मैं अपना आधा काम दे दूं.

बॉलीवुड के किस निर्देशक को साइन करना पसंद करेंगे ?
निर्देशक तो नहीं मैं फिल्म ज़रूर बता सकता हूं जो मुझे बहुत अच्छी लगी. इन फिल्मों में “रंग दे बसंती", “मुन्नाभाई एम बी बी एस", “गैंगस्टर", “दिल चाहता है", “जब वी मेट" तथा “ओम शांती ओम" शामिल हैं. इन फिल्मों के अनुसार मैं इन सबके निर्देशक से काफी प्रभावित हूं.

सुना है आप एक एनिमेशन फिल्म भी बनाने जा रहे हैं ?
जी हां. मैं एक कॉक्रोच पर एनिमेशन फिल्म बनाने जा रहा हूं जिसका नाम है “वेरी एस्थेटिक कॉक्रोच". यह चालाक, मासूम तथा दिलचस्प कॉक्रोच की कहानी है. एक कॉक्रोच का नाम है विक्की जो अमेरिका में रहता है और इसके कुछ दोस्त ग्रीक, कुछ स्पेन तथा रशिया में रहते हैं. जैसा कि आम कहावत है सब खत्म हो जाएगा मगर ये कॉक्रोच रह जाएंगे. यही इस फिल्म की कहानी है कि यह बात उनको पता चल जाती है. दुनिया के नष्ट होने के बाद भी उनका जीवित रहना उन्हें काफी रोमांचकारी लगता है. वह सोचते हैं कि मनुष्यों से बेहतर तो हम हैं क्योंकि हम उनके बाद भी इस पृथ्वी पर रह जाएंगे. इस तरह यह पृथ्वी इनकी नहीं हमारी है.

कुछ अपनी कॉमिक बुक कंपनी के बारे में बताइए ?
भारतीय सभ्यता को दूसरे देशों में फैलाने के लिए मैंने कॉमिक किताबें लिखनी शुरू की. पहले मैंने “बॉम्बे ड्रिम्स" लिखी जो काफी सफल रही. उसकी सफलता के बाद मैंने कुछ मज़ेदार कहानियां लिखने का फैंसला किया और अपने कुछ दोस्तों के साथ इस कॉमिक बुक कंपनी की स्थापना की. मेरी पहली कॉमिक बुक यूरोप तथा अमेरिका में काफी सफल रही. अब मैंने बैंगलोर में भी एक कॉमिक कंपनी खोली है जिसमें 300 युवा कलाकार और 20 लेखक काम कर रहे हैं. यहां से प्रकाशित पुस्तकें सारे विश्व में पढी जा रही हैं. अब यूं हो रहा है कि कुछ किताबों से फिल्म बन रही है, कुछ से विडियो गेम और कुछ से एनिमेशन फिल्म बन रही है. हालांकि अब इसकी तरफ से मैं काफी निश्चिंत हो गया हूं क्योंकि इसके लिए मैंने काफी लोगों को नियुक्त कर दिया है जो इसका काम देखते हैं. मैं कभी कभी जाकर कुछ कॉमिक किताबें लिख आता हूं और साथ ही उन्हें लेक्चर दे आता हूं.

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