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Exclusive Interview स्टार होना बकवास है, मुझे भिखारी बना दो वही स्टारडम है

By Prachi Dixit
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एक भिखारी है जो हर रोज सड़क पर फैली हुई गंदगी को साफ करता है। वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा आदमी है जिसके पास महंगी गाड़ी है। उसका नाम रोज अखबार में छपता है।

वह उसी सड़क पर बैठे हुए मासूम कुत्ते को अपनी लाखों की गाड़ी से ठोकर मार देता है,तो मेरी नजर में वह भिखारी स्टारडम है। मुझे भिखारी बना दो।

Saanand Verma

मेरी कामना रहती है कि भगवान,मुझे स्टारडम से दूर रखें। स्टारडम और स्टार होने का अहसास बकवास है। यह कहना है सानंद वर्मा की। सानंद वहीं है जो कि हर घर में भाभी जी घर पर हैं के सक्सेना जी के नाम से लोकप्रिय हैं।

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बहरहाल,सानंद विशाल भारद्वाज की पटाखा में ठरकी पटेल की मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। सानंद असली जिंदगी में क्रिएटिविटी का खजाना हैं।

किताब बेचने से लेकर अपने स्कूल का 100 साल का इतिहास बदलने तक। सानंद की जिंदगी का हर पड़ाव सही मायने में पटाखा की तरह रहा  है। यहां पढ़िए एक रोचक बातचीत।

घर कैसे चलेगा...खाना कैसे बनेगा...

घर कैसे चलेगा...खाना कैसे बनेगा...

2010 से लेकर 2018 तक का मेरा सफर सुखद रहा है। मेरी जिंदगी की हर घटना मेरे दिल को छू जाती है।मेरा यह मानना है कि जो भी आपके साथ होता है उसका कनेक्शन कर्मों से जुड़ा होता है।मैं अपनी जिंदगी में होने वाली हर चीज पर गर्व महसूस करता हूं। फिर चाहे मेरा 14 घंटे पैदल चलना हो या फिर आठ साल की उम्र में किताब बेचना हो। या फिर मेरी गाड़ी का बिक जाना हो,जो कि मेरे लिए प्यारी थी। कई बार इस बात से परेशानी हुई कि घर कैसे चलेगा। खाना कैसे बनेगा। लेकिन इन सब परेशानी ने मुझे जीना सिखाया है।अब मेरे पास मुंबई में घर है। फैंस की लंबी फेहरिस्त है। विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशक की फिल्म पटाखा है। मेरे पास मेरी मां है। मेरे लिए सबकुछ खूबसूरत है।

10 महीने बाद मुझे दोबारा फोन आया...

10 महीने बाद मुझे दोबारा फोन आया...

पटाखा का मिलना मेरी मेहनत का फल है। मैं 250 से अधिक टीवी एड फिल्म कर चुका था। इसके साथ मैंने प्रदीप सरकार की मर्दानी और अजय देवगन की रेड भी कर चुका था। इन दोनों फिल्मों में मेरा काम सराहा गया। कई कास्टिंग डायरेक्टर मेरे काम से परिचित हैं। पटाखा के कास्टिंग डायरेक्टर की टीम ने मुझे अप्रोच किया। वहां जाकर मुझे पता चला कि मैं विशाल भारद्वाज की फिल्म के लिए ऑडिशन दे रहा हूं। यह सुनकर मैं उत्साहित हुआ,लेकिन दो महीने तक मुझे कोई कॅाल नहीं आया। फोन करने पर पता चला कि विशाल सर इरफान खान के साथ फिल्म पर काम कर रहे हैं। 10 महीने बाद मुझे दोबारा आॅडिशन के लिए कॅाल आया। तीन बार टेस्ट देने के बाद ठरकी पटेल के लिए मेरा नाम तय हो गया।

रामगोपाल वर्मा और राजकुमार हिरानी

रामगोपाल वर्मा और राजकुमार हिरानी

क्रिएटिव संतुष्टि की भूख मुझ में सबसे ज्यादा है। टीवी में दर्शकों की संख्या सीमित है। एक शो से एक दिन में पांच दर्शक जुड़ते हैं और सिनेमा में एक दिन में करोड़ों दर्शक जुड़ जाते हैं। यही वजह है कि मुझे भिन्न किरदार निभाने हैं। मुझे रामगोपाल वर्मा की फिल्में भी करनी है और राजकुमार हिरानी की फिल्में भी। मेरे लिए कहानी ,किरदार और डायरेक्टर, यह तीन अच्छी खूबी है तो लाइफ सेट है।

उधार लेकर फिल्म देखने जाते थे..

उधार लेकर फिल्म देखने जाते थे..

मेरे पिता राजनारायण वर्मा बहुत बड़े कवि और उपन्यासकार रहे हैं। वह क्रिएटिव इंसान थे। वह मुझे एक्टर बनाना चाहते थे। उनके अंदर से आवाज आती थी कि ये जो मेरा बेटा पैदा हुआ है वह एक्टर बनने के लिए पैदा हुआ है। 7 साल की उम्र से वह मुझसे एक्टिंग करवाते थे। डायलॅाग और डांस करने के लिए कहते थे। आर्थिक तौर पर हमारी हालत कमजोर थी। लेकिन मेरे पिताजी ऐसे इंसान थे जो पड़ोसी से पैसा कर्जा कर परिवार को फिल्म दिखाने लेकर जाते थे। बस,वहीं से एक्टिंग मेरे अंदर बसी हुई हैं।

100 साल में पहली बार

100 साल में पहली बार

बचपन में मैंने कहानी लिखना शुरू कर दिया। बड़े अखबार में मेरी कहानियां छपा करती थी। मैंने कम उम्र में पत्रकारिता की शुरुआत कर दी थी। इसके साथ मैंने एक्टिंग पर भी ध्यान दिया। मेरे पहले नाटक में मुझे 100 कलाकारों के बीच में बेस्ट कलाकार का पुरस्कार मिला। किताब बेचने के कारण मैं स्कूल भी कम ही जा पाता था। लेकिन मेरे शिक्षक मुझ से हमेशा प्रभावित रहा करते थे। उन्होंने मुझे स्कूल के डिबेट प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कहा। 100 साल में पहली बार मेरे स्कूल ने राज्यस्तरीय डिबेट प्रतियोगिता जीती। इन सबके लिए मुझे कभी कुछ देखना या सिखना नहीं पड़ा। क्रिएटिविटी मेरे अंदर बचपन से बसी हुई है।

पटाखा बदलते सिनेमा की फिल्म है

पटाखा बदलते सिनेमा की फिल्म है

विशाल सर निर्देशक,कवि लेखक सब है। वह एक साथ कितने काम कुशलता के साथ कर रहे हैं। वहीं असली जीनियस हैं। बतौर एक्टर और इंसान विशाल सर से काफी कुछ सीखने को मिलता है। विशाल सर की पटाखा असल मायने में भारतीय फिल्म है।पटाखा बदलते सिनेमा की फिल्म है। मेरा मानना है कि देश में 70 प्रतिशत लोगों का सिनेमा के प्रति शिक्षित होना जरूरी है।अच्छे सिनेमा की परख करनी अभी बाकी है। जिस दिन देश का हर नागरिक इंटरनेट का इस्तेमाल सही तरीके से करना समझ जाएगा उस दिन वह शिक्षित हो जाएगा। इंटरनेट के जरिए सिनेमा को जबरदस्त एक्सपोजर मिला है। इंटरनेट से दुनिया का सिनेमा आसानी से देख सकते हैं। लेकिन लोगों को इसका इस्तेमाल सही तरीके से करना नहीं आता है। फिर भी कहीं ना कहीं बदलाव हुआ है। पटाखा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह एक सच्ची भारतीय फिल्म है। हमारा देश गांव का देश है। हमारे सिनेमा को पटाखा जैसी रियल फिल्मों की आवश्यकता है।

1000 करोड़ का बिजनेस आसानी से

1000 करोड़ का बिजनेस आसानी से

मैं हॅालीवुड फिल्म भी करना चाहता हूं। वक्त मिलने पर मैं हॅालीवुड फिल्में देखता हूं। हॅालीवुड का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। हॅालीवुड ने दर्शकों का मन पकड़ लिया है। हम यहां 100 करोड़ का बिजनेस करने पर नाचने लगते हैं। वहां पह वे लोग 1000 करोड़ का बिजनेस आसानी से कर देते हैं। उन्हें दर्शकों की पसंद का बखूबी ज्ञान है।उनके पास तैयारी ज्यादा है। पैसे ज्यादा हैं। क्रिएटिव तौर पर वह कभी भी समझौता नहीं करते हैं। लार्ज स्केल पर वह दर्शकों को सटीक तरीके से टारगेट करते हैं।इतना ही नहीं हॅालीवुड फिल्में तो भारतीय फिल्मों का बैंड बजा कर चली जाती हैं।

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    English summary
    In an Exclusive Interview Saanand Verma talk Vishal Bharadwaj pataakha and his overall journey

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