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    INTERVIEW मैं आमिर खान की जगह पहुंच पाता हूं या नहीं ये तो वक्त बताएगा

    By Prachi Dixit
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    इन दिनों बॅालीवुड में स्टार किड शब्द जोरों शोरों से सुनाई दे रहा है। स्टार किड लांच से पहले ही सोशल मीडिया पर सुपरस्टार बन जाते हैं।

    कई लोगों का मानना यह भी है कि अरे,ये तो स्टार किड है इसे किस बात की कमी। लेकिन कई बार बिग डेब्यू भी स्टार किड के काम नहीं आता है। 2011 में फालतू से फेम हासिल करने वाले जैकी भगनानी के साथ भी ऐसा ही हुआ है।

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    बहरहाल, 2018 में स्टारडम नहीं बल्कि बतौर एक्टर खुद को साबित करने के लिए जैकी हाजिर हो गए हैं। जैकी 'मित्रों' से दिल दोस्ती और परिवार की कहानी लेकर दोबारा दर्शकों के दिल में दस्तक देने के लिए तैयार हैं। जैकी इस फिल्म को फालतू 2 बताते हैं।

    फिल्मीबीट से हुई दिलचस्प बातचीत के दौरान जैकी ने फिल्मों की असफलता,स्टारडम और होम प्रोडक्शन में काम करने की खामियों के बारे में बेबाक तरीके से बात की। आपको बता दें कि यह एक दिलचस्प बातचीत है।

    गुजरात का असली रंग मित्रों में

    गुजरात का असली रंग मित्रों में

    मित्रों को आप फालतू 2 भी समझ सकते हैं। यह दोस्ती और प्यार की कहानी है। आपकी और हमारी कहानी है। इस फिल्म में आपको गुजरात का रंग देखने को मिलेगा।गुजरात के बारे में फिल्म और टीवी में हमेशा आरा रारा,गरबा या फिर ढोकला दिखाया गया है। लेकिन सच में ऐसा नहीं है। गुजरात क्या है असल में मित्रों में साफ तौर पर दिखाई देगा। वहां पर ढोकला के साथ चाइनीज भी खाते हैं। वहां के लोग गुजराती के साथ अंग्रेजी में भी बात करते हैं। इस फिल्म से हमने लोगों की सोच थोड़ी सी बदलने की कवायद की है।

    पद्मावती और बाहुबली जैसी फिल्में

    पद्मावती और बाहुबली जैसी फिल्में

    मित्रों एक सिंपल सच्ची और दिल में बस जाने वाली फिल्म है।मेरे ख्याल से दो तरह की फिल्म होती हैं,एक पद्मावती और बाहुबली जैसी फिल्में होती हैं। जिसे हम टीवी पर नहीं देख सकते हैं। ये सारी फिल्में लार्जर देन लाइफ होती हैं। एक दूसरी तरह की फिल्में होती हैं,जो आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ देखते हैं। फिर फिल्म देखने पर कहते हैं कि अरे,यार ये तो मेरे साथ भी हुआ है। ऐसा मेरे घर में भी होता है। लोग फिल्म से जुड़ जाते हैं। अचानक दर्शक महसूस करने लगते हैं कि यह मेरी कहानी है।मित्रों ठीक ऐसी है।

    जीना यहां मरना यहां

    जीना यहां मरना यहां

    इस इंडस्ट्री मैं में 2009 से हूं।मेरे लिए जीना यहां मरना यहां। मेरा मानना है कि आप किसी भी इंडस्ट्री में काम कर लो। आपके हाथ में सफलता और विफलता नहीं है। अगर मैं कहूं कि जितनी भी फिल्में हिट हैं क्या वो अच्छी फिल्म हैं। आपको खुद इसका जवाब पता है। अगर मैं आपसे पूछता हूं कि क्या फालतू सुपरहिट थी,तो आप कहेंगे कि हां। क्या आपको यंगिस्तान अच्छी लगी तो आप कहेंगे कि हां।क्या लोगों ने उसकी तारीफ की हां की। मैं इससे ज्यादा बतौर एक्टर क्या कर सकता हूं।

    मैं यह सोचकर डिप्रेशन में नहीं आ सकता

    मैं यह सोचकर डिप्रेशन में नहीं आ सकता

    अगर किसी एक्टर के पास 40 फिल्में हैं तो मैं यह सोचकर डिप्रेशन में नहीं आ सकता हूं। मेरा काम सिर्फ मेहनत करना और सच्चाई से अपना काम करना है। बाकी दर्शक मालिक हैं।दर्शक हमेशा सही होते हैं। मुझे खुद का काम करना है। मुझे नहीं मालूम कि कौन से बाॅल पर मेरा छक्का लगने वाला है। अब इसका मतलब यह नहीं कि मैं नेट प्रैक्टिस करना छोड़ दूं।मुझे नहीं पता कि शुक्रवार को कितनी फिल्में आ रही हैं। फिल्म को कितने थिएटर मिलेंगे। कई सारी चीजें हैं जो मेरे हाथ में नहीं। मेरे हाथ में सिर्फ अपना काम करना है और दर्शकों पर छोड़ देना है।

    मेरे दिमाग की बैंड बजा दी

    मेरे दिमाग की बैंड बजा दी

    मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है, कोई खास सीन देने जा रहा हूं,तभी निर्देशक आता है और कहता है कि अरे यार तुम्हारे डैड ने 100 जूनियर कलाकार हटा दिए। ऐसी हालत में एक्टर के तौर पर मैं क्या कर सकता हूं।मैं डैड (वासु भगनानी )को फोन भी नहीं कर सकता। आखिर कौन सा बेटा अपने पिता का पैसा बर्बाद करना चाहेगा। आप निर्देशक की सुनेंगे या निर्माता की। इन सब के बीच में जाकर आपको परफॉर्म करना है। फिल्म देखते वक्त कोई सबटाइटल नहीं आने वाला है कि पता है उस दिन निर्माता और निर्देशक ने मिलकर मेरे दिमाग की बैंड बजा दी थी।

    मेरे लिए कोई शॉर्टकट नहीं है

    मेरे लिए कोई शॉर्टकट नहीं है

    दर्शक सबकुछ हैं।जब मैं 100 प्रतिशत नहीं दे सका तो दर्शकों से 100 प्रतिशत की उम्मीद कैसे कर सकता हूं।किसी एक्टर के साथ 40 प्रतिशत देने पर भी फिल्म को 100 प्रतिशत मिल जाता है। मेरे साथ ऐसा नहीं होता है। मेरे लिए कोई शॉर्टकट नहीं है। फिल्म बैकग्राउंड होने के बाद भी मैं अभी भी संघर्ष कर रहा हूं। अगर ऐसा होता तो मैं पहली फिल्म से सुपरस्टार बन जाता।

    फिल्म में एजुकेशन का लेवल बढ़ गया है

    फिल्म में एजुकेशन का लेवल बढ़ गया है

    मुझे स्टार और एक्टर दोनों बनना है। मैं आमिर खान की तरह बनना चाहता हूं। अब ये वक्त बताएगा कि मेरा यह सपना कब पूरा होगा। फिल्मों के लिए अब यह वक्त बदलेगा। पहले लोग फैंटेसी देखने जाते थे। पर्दे पर सुपरस्टार देखने जाते थे।अब सब रियल हो गया। फिल्म में एजुकेशन का लेवल बढ़ गया है। अभी सबको पता है कि ढाई किलो का हाथ नहीं होता है।इतना तो साफ है कि स्टार अच्छा काम करेंगे तो कटेंट ऊपर है। एक तरफ कंटेंट अच्छा है लेकिन कोई बिग स्टार नहीं है तो,दूसरी तरफ स्टार बड़ा है लेकिन कंटेंट नीचे हैं तो लोग कंटेंट को देखने जाएंगे स्टार को नहीं।

    English summary
    In an Interview Jackky Bhagnani talk about aamir khan method of acting and Mitron
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