INTERVIEW: मैं करियर के शुरुआत के 5 साल तक टाइपकास्ट हो गया था- इमरान हाशमी

हिंदी सिनेमा में हॉरर फिल्मों का कद उठाने का जिम्मा इमरान हाशमी ने बखूबी निभाया हैं। जहां कई बड़े स्टार्स ने हॉरर की डरावनी कहानी को कॉमेडी को गाड़ी पर सवार कर दर्शकों तक पहुंचाया। तो वहीं प्योर हॉरर जॉनर के साथ किसी एक्टर ने इंसाफ करने की सफल कोशिश की है तो वह इमरान हाशमी रहे हैं। इमरान हाशमी एक ऐसे एकमात्र हिंदी सिनेमा के स्टार हैं जिनके फिल्म बायोडाटा में सबसे अधिक हॉरर हिट फिल्में रही हैं। बड़े पर्दे के बाद अब इमरान हाशमी ओटीटी पर भी हॉरर फिल्म डिबुक: द कर्स इज रियल लेकर आ रहे हैं।

Emraan hashmi

Filmibeat Hindi फिल्मीबीट हिंदी से बातचीत में इमरान हाशमी ने बताया कि आखिर क्यों हॉरर कहानी उनकी पसंद लिस्ट में दिलचस्पी का फैक्टर लाती हैं। कैसे इसकी वजह से इमरान हाशमी टाइपकास्ट होने से भी बाहर निकले हैं।

मलयालयम फिल्म एजरा का हिंदी रीमेक

मलयालयम फिल्म एजरा का हिंदी रीमेक

हॅारर फिल्म में एक निर्देशक की आंख बहुत महत्व रखती है। इस वजह से मैं निर्देशक जे के की सोच को समर्थन करना चाहता था। डिबुक: द कर्स इज रियल मलयालयम फिल्म एजरा का हिंदी रीमेक है। मैंने एजरा कुछ साल पहले देखी है। काफी कुछ इसके मलयालयम फिल्म एजरा से मिलता है। डिबुक अलग इस लिहाज से है कि हाॅरर के हिस्से को काफी बढ़ाया गया है। छोटी-छोटी बारीकियां स्क्रिप्ट और नरेटिव में बदलाव किए हैं।

इंटरनेशनल स्तर पर अच्छी संवेदनशीलता

इंटरनेशनल स्तर पर अच्छी संवेदनशीलता

जहां तक जोनर का सवाल है तो मैंने हॅाररफिल्में की हैं। 2007 से लेकर अभी तक मैंने 4 हॅारर फिल्में की हैं। मेरी पिछली फिल्मों से डिबुक अलग है। देखा जाए तो इंटरनेशनल स्तर पर अच्छी संवेदनशीलता है बड़े दर्शक वर्ग के लिए यह फिल्म है।मानवीय कहानी है। अगर कहानी दर्शकों के साथ जुड़ गए नहीं होगी तो फिल्म नहीं चलेगी। डिबुक दर्शकों को डराने में सफल साबित होगी। मैं इसके लिए बेहद उत्साहित हूं। इस वजह से मैंने डिबुक के लिए हामी भरी।

लॉकडाउन के बाद 30 प्रतिशत फिल्म की पूरी शूटिंग

लॉकडाउन के बाद 30 प्रतिशत फिल्म की पूरी शूटिंग

डिबुक को ओटीटी पर रिलीज की प्लानिंग शुरू में नहीं की गई थी। कोरोना महामारी से पहले साल 2019 में फिल्म की शुरुआत हुई थी। फिल्म को खत्म करने में केवल 30 प्रतिशत का काम बकाया था। तभी कोरोना महामारी आ गई। पहला लॅाकडाउन हो गया। बहुत समस्या हो गई। हमारी पूरी टीम यह सोचने लगी कि थिएटर रिलीज का क्या होगा? फिर देखा तो वक्त हमारे लिए अच्छा था क्योंकि हमें लगा कि बहुत सारे बदलाव सिनेमा को लेकर होने वाले हैं। ओटीटी कोरोना महामारी में उठ कर सामने आया। बहुत सारे लोग ओटीटी पर हॅाररफिल्म भी देख रहे थे। इस वजह से हमने हॅाररमूमेंट को फिल्म में पहले से अधिक बढ़ाया। लॉकडाउन के बाद 30 प्रतिशत फिल्म की शूटिंग पूरी की।

बॉक्स ऑफिस का दबाव ओटीटी पर नहीं

बॉक्स ऑफिस का दबाव ओटीटी पर नहीं

ओटीटी पर बॅाक्सऑफिस का दबाव नहीं रहता।ओटीटी का अनुभव अलग है। बॉक्स ऑफिस का दबाव रहता है। ओटीटीकी खूबी यह है कि दबाव नहीं तो आप अपने क्रिएटिव में नयापन ला सकते हैं।थिएटर में ऐसा दिखता है कि फिल्म को दोहराते रहो। अगर आप कोई भी अच्छी कहानी ओटीटी पर बताएंगे तो वो चलेगी। इस तरह ओटीटी कहानी दिखाने के मामले में काफी अलग है। हमारी फिल्म के टाइटल के साथ कहानी भी दूसरी हॅारर फिल्मों से काफी अलग है। डिबुट को हिंदी में समझा जाए तो इसके मायने भूत, उनके यकीन करने के हिसाब से।और अगर हम हिंदी टाइटल में जाते हैं तो आहट या सन्नाटा या भूत जैसे नाम दिमाग में आता है।। हमें नयापन चाहिए था क्योंकि फिल्म भी हॅारर के जोनर को ऊंचे स्तर पर लेकर जाती है तो हमें लगा कि टाइटल भी लोगों को आकर्षित करना चाहिए।

मैं टाइपकास्ट हो गया था

मैं टाइपकास्ट हो गया था

रोमांटिक फिल्मों के बाद मैंने हॅारर फिल्मों के साथ कई सारी फिल्में की ताकि मैं अपनी प्रतिभा को विस्तार से दिखा सकूं। जब भी मैंने कुछ अलग किया है तो एक बहुमुखी प्रतिभा का टैग लगा है। फिर चाहे वो हॅारर फिल्म हो या फिरवन्स अपॉन टाईम इन मुंबई, आवारापन, टाइगर,चेहरे, संघाई, जन्नत, मुंबई सागा, डर्टी पिक्चर। इन सारी फिल्मों ने दर्शकों के सामने एक नए इमरान हाशमी को पेश किया। मैं सच कहूंगा कि पहले चार पांच साल तक एक तरह से मैं टाइपकास्ट हो गया था।

क्योंकि तभी फिल्में बनती थी , जो चल रहा है जो बिक रहा है उसी को बाहर दोहराना है। शुक्र है कि वर्तमान में ऐसा माहौल नहीं है। ओटीटी पर कहानी, किरदार फिल्म का विस्तार अच्छी दिशा में हो रहा है। ओटीटी वर्तमान में केवल हीरो तक नहीं रह गया है। यह अब किरदार पर निर्भर हो गया है। हीरो भी अब किरदार को प्ले करना चाहते हैं।

फिल्म से स्विच हो जाता हूं

फिल्म से स्विच हो जाता हूं

करियर और निजी जिंदगी को लेकर मेरी कभी कोई प्लानिंग नहीं रही है। मैंने कभी कोशिश नहीं किया कि हीरो बनना है, या मेरी इमेज होनी चाहिए। मैंने कभी पीआर के लिए सोचा नहीं था। हमेशा से मेरे ख्याल से मैंने निजी और प्रोफेशनल लाइफ को अलग रखा है।

मैं प्रोफेशनल तरीके से किसी फिल्म को प्रमोट करता हूं उसके बाद मैं फिल्म से एक तरह से स्विच हो जाता हूं। मेरी जो जिंदगी फिल्मों से दूर है वो मेरी पसंद है। दोस्त है परिवार है उनका दूर-दूर तक इंडस्ट्री से नाता नहीं है और मैं ऐसे ही इसे रखना चाहता हूं। यही मुझे जमीन से जुड़ा हुआ रखताहै।

हॅारर फिल्मों के लिए थिएटर की जरूरत नहीं

हॅारर फिल्मों के लिए थिएटर की जरूरत नहीं

हॅालीवुड फिल्मों के मुताबिक हिंदी सिनेमा के भूत कॅामिकल होते हैं। हमारे एक्टिंग करने का तरीका नाटकीय होता है। थिएटर परफॉरमेंसको पसंद किया जाता है।ओटीटी पर शानदार परफॅारमेंस हैं। अगर ओटीटी पर वैसा दिखायेंगे तो दर्शक हंस देंगे। हॅारर कॅामेडीको समझा जा सकता है फिर भी। ज्यादातर फिल्म मेकर्स ने हॅारर की अधिक विस्तार से खोज नहीं की गई है।

हॅारर का प्रभाव लेने के लिए थिएटर की जरूरत नहीं है। आप इसे ओटीटी पर भी देख सकते हैं। आप घर के लिविंग रूम में अंधेरा कर देत हैं तो वो हॅारर फिल्म का अहसास आ जाता है। हमारी यह फिल्म थिएटर के लिए बनी थी। थिएटर खुलने का आप कब तक इंतजार करोगे, बीते दो साल से हमारे निर्माता फिल्म के साथ बैठे हुए हैं।मैं खुश हूं कि यह बड़े स्तर पर अमेजन प्राइम पर रिलीज हो रही है।

फिल्म कई बार डरावना अनुभव लेकर आती है

फिल्म कई बार डरावना अनुभव लेकर आती है

फिल्म बुरी बनती है मेरे लिए वहीडरावना अनुभव है। जब आप थिएटर में बैठते हैं और आपको लगता है कि यही है बस यहां से मेरा करियर शुरू। फिर फिल्म शुरू होती है तो पांच-दस मिनट में अंदाजा हो जाता है कि आपका क्या होने वाला है। वो डरावना अनुभव होता है हॅारर फिल्म से भी अधिक। इससे आप बाहर नहीं आ सकते हैं। करियर के शुरुआत में मुझे लगा मास्टरपीस फिल्म कर रहा हूं लेकिन बाद मैं सच्चाई पचा चलती है।

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