Exclusive: बॅालीवुड टिपिकल फिल्मों में पुरुषों के लिए महिलाएं सामान बन कर रह गईंं - शेफाली शाह
'दिल्ली क्राइम' के बाद शेफाली शाह महिला आधारित फिल्मों का बड़ा चेहरा बन गई हैं। 40 की उम्र के बाद जहां एक्ट्रेसेस पर्दे पर अपनी पहचान की तलाश करती हैं तो वहीं शेफाली शाह ने इस सोच को बखूबी तोड़ा है। करीना कपूर खान, दीपिका पादुकोण और आलिया भट्ट के साथ सभी एक्ट्रेसेस के लिए शेफाली शाह ने यह उदाहरण प्रस्तुत किया है कि कला उम्र और स्टारडम की मोहताज नहीं होती।

शेफाली शाह इस महीने अपनी नई सीरीज 'ह्यूमन' के साथ दमदार भूमिका में वापसी कर रही हैं। आने वाले दिनों में डार्लिंग,जलसा जैसी फिल्मों से मजबूत महिला किरदार में अपना दम दिखाने की तैयारी शेफाली शाह कर चुकी हैं। Filmibeat Hindi फिल्मीबीट हिंदी से हुई खास बातचीत में शेफाली शाह ने यह स्वीकार किया है कि बीते एक साल में उन्होंने अपने करियर में सबसे अधिक काम किया है जिसकी एक वजह 'दिल्ली क्राइम' रही है।

ह्यूमन सीरीज के जरिए आप फिर से एक मजबूत महिला किरदार को पेश कर रही हैं?
अगर स्क्रिप्ट मजबूत हो और शक्तिशाली मेरा किरदार हो, फिर मेरे लिए ना करने की वजह कोई नहीं है। इस तरह के प्रोजेक्ट के लिए शूटिंग शुरू होने से पहले ही ढेर सारा उत्साह रहता है। चिकित्सा (मेडिकल) क्षेत्र से जुड़ी ऐसी कहानी को देख कहीं ना कहीं दर्शकों के साथ बतौर एक्ट्रेस मेरी भी दिलचस्पी बढ़ती है। महिला आधारित किरदार निभाना मेरे लिए अद्भुत है। मैं महिला केंद्रित फिल्में लगातार कर रही हूं। बीते साल मैंने ऐसे कई प्रोजेक्ट पर काम किया है। डार्लिंग फिल्म जिसमें मैं और आलिया भट्ट साथ काम कर रहे हैं। इसके बाद कतार में जलसा फिल्म भी है। मैं बता सकती हूं कि यह सभी भूमिका मेरे लिए जोश से भरपूर है।

कोरोना में चिकित्सा को लेकर लोग अधिक जागरूक हुए हैं, ऐसे में क्या ह्यूमन सीरीज आंख खोलने का काम करेगी?
ह्यूमन ड्रग ट्रायल की कहानी है। दर्शकों पर सीरीज का किस तरह का प्रभाव पड़ेगा, यह मैं नहीं कह सकती हूं। यह दर्शकों पर निर्भर करता है। कोरोना से पहले ही इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो गई थी और यह बहुत ही प्रासंगिक विषय है। इस शो के जरिए हम यह जानेंगे कि मेडिकल फील्ड में क्या-क्या चीजें होती हैं। ड्रग्स बनने से लेकर आपके घर तक पहुंचने के बीच क्या-क्या होता है? उस पर्दे के पीछे की कहानी को ह्यूमन दिखाती है।

दिल्ली क्राइम और ह्यूमन सीरीज में इंटेस किरदार से निजी तौर पर बाहर आना मुश्किल होता है?
दिल्ली क्राइम जैसी फिल्मों में इंटेस किरदार से दिमागी तौर पर उसकी धार से बाहर आना बहुत कठिन हो जाता है क्योंकि हम लगातार शूटिंग करते रहते हैं। उसकी परफॉर्मेंस मुश्किल होती है। हम शूटिंग पर जाते हैं, घर आकर फिर से स्क्रिप्ट पर बैठते हैं। अगले दिन फिर से शूटिंग पर जाते हैं। लगातार किरदार के साथ रहने में उससे हटने का मौका नहीं मिलता। वह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया होती है। हां, यह सही है कि इंटेस भूमिका काफी समय तक हमें पकड़ कर रखती है। लेकिन हम अपने रोजमरा जिंदगी में उससे प्रभावित होकर उसे लेकर नहीं चल सकते हैं।

क्या दिल्ली क्राइम से लेकर ह्युमन सीरीज तक के सफर को अपने करियर का गोल्डन पीरियड मानती हैं?
जी हां, यह बिल्कुल सही है। दिल्ली क्राइम के बाद से ही मुझे और भी अधिक काम के प्रस्ताव मिलने लगे। दिल्ली क्राइम की वजह से लोगों के विचार मेरी तरफ बदल गए हैं। मुझे ध्यान में रखकर स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। लीड और पैरलल लीड फिल्में मुझ तक पहुंच रही हैं। प्रभावी किरदार मिल रहे हैं। पिछले साल मैंने जितना काम किया है उतना काम शायद मैंने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं किया है। पिछले साल मैंने 6 प्रोजेक्ट्स पर काम किया है। यह मेरे लिए लाजवाब रहा है।

फिल्म इंडस्ट्री में एक्ट्रेस की उम्र और शादी का लेबल अब मायने नहीं रखता, हालात बदल गए हैं?
फिल्म इंडस्ट्री में एक्ट्रेस की उम्र और शादी का लेबल लगना काम में बाधा नहीं पैदा कर रहा है। एक्ट्रेस की जीवन सीमा इंडस्ट्री में बढ़ गई है। दिल्ली क्राइम इसका बड़ा उदाहरण है। पहले की तुलना में एक्ट्रेसेस को पहले से अधिक काम मिल रहा है। महिला आधारित फिल्में बन रही हैं। एक्ट्रेसेस को लगातार पर्दे पर दिखने और काम मिलने में कठिनाई नहीं हो रही है।बॅालीवुड की फिल्मों में महिलाएं केवल पुरुषों के लिए सामान बन कर रह गई थीं। अब ऐसा नहीं है। मजबूत किरदार अभिनेत्रियों के लिए लिखे जा रहे हैं। यहां तक कि टीवी पर भी कई बड़े शो महिला केंद्रित हैं।

क्या कभी कोई ऐसी फिल्म की है जिसे आप नहीं करना चाहती थी लेकिन आपने फिर भी किया?
जी नहीं, अगर मुझे कोई फिल्म नहीं करनी है तो मैं नहीं करूंगी। चाहे वह फिर कितना भी बड़ा प्रोजेक्ट क्यों ना हो।मैंने कई बड़ी फिल्मों के ऑफर को अस्वीकार किया है। मैं ऐसे किरदार के लिए हामी भरती हूं जो मुझे दिल और दिमाग से हिला देता है। मैं इस सोच के साथ काम नहीं करती हूं कि इस प्रोजेक्ट का क्या होगा? कौन देखेगा? कितने प्लेटफॉर्म पर आएगी? कितनी बड़ी थियेटर रिलीज मिलेगी? यह सारे हिसाब-किताब मैं नहीं करती। यह मेरा काम नहीं है। मैं क्रिएटिव इंसान हूं। अगर कोई काम मुझे प्रोत्साहित करता है, तो मैं उससे आगे का गुणा भाग नहीं करती। मैं शूटिंग पर यह सोचकर नहीं जाती कि मुझे सब आता है। मेरे लिए हर दिन स्कूल का पहला दिन होता है। मैं घबराई हुई, उत्साहित रहती हूं। मेरे दिल के करीब मेरे द्वारा निभाया गया हर किरदार है।


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