Exclusive Interview- अमिताभ बच्चन इंडिया के एवेंजर्स बन सकते हैं, रणवीर सिंह में भी वो बात है- मयूर पुरी
एक दौर था जब लेखक या फिर गीतकार को वो क्रेडिट नहीं मिलता था जिनके वो हकदार होते थे। फिर वक्त बदला और इंडस्ट्री में कुछ ऐसा सितारे आए जिन्होने अपने काम के दम पर अपना नाम बनाया और आज लोग उनके काम को खासा पसंद करते हैं। वो ना तो किसी फिल्मी बैकग्राउंड से थे और ना ही कोई उनका गॉडफादर था। आज हम बात करने जा रहे हैं लेखक और गीतकार मयूर पुरी के बारे में जो कि इस वक्त अपनी हालिया रिलीज फिल्म थॉर- लव एंड थंडर को लेकर चर्चा में हैं।
जी हां, हॉलीवुड की ये शानदार फिल्म जिसकी हिंदी स्क्रिप्ट मयूर पुरी ने लिखी है और उन्होने इसके अलावा भी कई शानदार हॉलीवुड प्रोजेक्ट किए हैं। हिंदी फिल्मों के कई शानदार गाने भी उनके नाम ही हैं।

हाल ही में फिल्मीबीट से उनकी एक्सक्लूसिव बातचीत हुई है और उन्होने अपने करियर को लेकर कुछ अहम बातें साझा की हैं जो कि उनके फैंस जरूर जानना चाहेंगे। पढ़िए गीतकार और लेखक मयूर पुरी के साथ फिल्मीबीट की बातचीत के मुख्य अंश...

आपका हालिया रिलीज प्रोजेक्ट थॉर- लव एंड थंडर आपको कैसे मिला और इसको लेकर अनुभव कैसा रहा?
डिज्नी मार्वल्स के साथ मेरा बहुत अच्छा रिश्ता रहा है जोकि इंडिया में काम करता है। मैने उनके लिए एबीसीडी और एबीसीडी 2 की है, जब एबीसीडी 2 खत्म हो चुकी थी तब उनको जंगल बुक बनाना था और इसको हिंदी में डब करना था। तब उन्होने कहा था कि आपको जंगल बुक का हिंदी वर्जन लिखना है। मैने सोचा मै तो ओरिजिनल राइटर हूं, मैं क्यों ट्रांसलेशन का काम करूं? लेकिन जब मैने फिल्म देखी तो लगा ये तो हमारी ही कहानी है, इंडिया की कहानी और इसके सारे किरदार तो हिंदी वाले ही हैं। इसके बाद मैने जंगल बुक की, और तब से अब तक 5 सालों में मैं करीब 26 फिल्में कर चुका हूं। बहुत मजा आता है क्योंकि काफी अच्छा और चैलेंजिंग काम है। एक बाद एक प्रोजेक्ट आते रहते हैं, थॉर की बात करें तो मार्वल के साथ मेरी 4 फिल्म की डील थी। अब नया कॉंट्रैक्ट करेंगे और नई फिल्में करेंगे।

आपका जन्म अजमेर, राजस्थान में हुआ, वहां से मुंबई तक का सफर कैसे तय किया?
अजमेर में मेरा जन्म हुआ लेकिन मैं पला बढ़ा गुजरात में, मेरे पिता जी वहां थे क्योंकि उनकी रेलवे में गवर्नमेंट जॉब थी और मम्मी हाउसवाइफ थीं। मेरा किसी भी तरह का ताल्लुक इंडस्ट्री में नहीं था। मैं जब 90 के दशक में कॉलेज में था तब मैं विज्ञापन बनाता था। मैने लिट्रेचर की पढ़ाई की, ड्रामा की पढ़ाई की अपनी यूनिवर्सिटी में। मैने अहमदाबाद में काफी काम किया, सीरियल्स डायरेक्ट किए, फिर 1999 में मैं मुंबई आया। जब मैं मुंबई आया को मेरी मुलाकात संजय गढ़वी साहब से हो गई और उस वक्त फिल्म बन रही थी 'तेरे लिए', तो उन्होने बतौर चीफ असिस्टेंट मुझे काम दे दिया। लेकिन उस दौरान मैं ये नहीं बोलना चाहता था कि मैं राइटर भी हूं। लेकिन जैसे जैसे फिल्म शूट हुई तो उनको पता चला का इस लड़के का इंट्रेस्ट लेखन में भी है। फिर उन्होने उनकी अगली फिल्म लिखने को कहा। 'मेरे यार की शादी' बनी, उसको यशराज ने प्रोड्यूस किया, ये बड़ा बैनर था तो हम लोग तुरंत लाइमलाइट में आ गए। इसके तुरंत बाद हमें 'धूम' मिली करने के लिए और इस फिल्म में मैं एसोसिएट डायरेक्टर था, 'धूम' के लेखक अलग थे जिनका नाम विजय कृष्ण आचार्य है, लेकिन फिर भी 'धूम' में मेरा काफी योगदान रहा। आप ये समझ लीजिए मैं धूम में डायरेक्टर का राइट हैंड था। 2004 में धूम रिलीज हुई और 2005 में मैने यशराज छोड़कर गाने लिखना शुरु कर दिए। उस वक्त मेरी दोस्ती प्रीतम से हो चुकी थी और उन्होने बोला कि ओम शांति ओम में मेरे लिए गाने लिखिए। 2007 में ओम शांति ओम रिलीज हुई इसके डायलॉग मैने लिखे थे और इसके बाद पीछे मुड़के देखने वाली बात ही नहीं थी।

द लॉयन किंग, एवेंजर्स, मोगली और पाइरेट्स ऑफ कैरेबियन जैसी फिल्मों से आपका नाता है, करियर की शुरुआत में आपने सोचा था कि, हॉलीवुड प्रोजेक्ट्स के साथ जुड़ेंगे?
(हंसते हुए) शायद सपना देखा होगा लेकिन वो हॉलीवुड का नहीं था, मैं ये जरूर चाहता था कि मेरा भी नाम आए बड़े पर्दे पर। मैने 11वीं तक ये फैसला कर लिया था कि मुझे साइंस छोड़कर लिट्रेचर में जाना है। मैने काफी जल्दी लिखना शुरु कर दिया था और छठी या सातवीं कक्षा से मैं कविता लिखता था, स्कूल में नाटक करता था और ये सब काफी यंग एज में शुरु किया था। लेकिन ये सच है कि मैने हॉलीवुड कभी नहीं सोचा था, बॉलीवुड सोचा था।

अगर किसी बॉलीवुड एक्टर पर सुपरहीरो फिल्म बने तो वो कौन होगा? आप किसके लिए लिखना चाहते हैं?
ऐसा कुछ मेरे दिमाग में नहीं है क्योंकि मैने सभी के साथ काम किया है। मैने शाहरुख सर के साथ काम किया है, अक्षय सर के साथ किया है। अगर सुपरहीरो की बात करें तो मेरे हिसाब से अमिताभ बच्चन जी को सुपरहीरो होना चाहिए। क्योंकि उनसे बड़ा महानायक इस देश का, इस सदी का, इस इंडस्ट्री का कोई नहीं है। मैं जरूर चाहूंगा कि वो किसी फिल्म में सुपरहीरो बनें। (हंसते हुए) वो इंडिया के एवेंजर्स बना जाएं। अभी की जनरेशन की बात करें तो काफी लोगों ने ट्राय किया है, शाहरुख सर ने रा-वन में कोशिश की थी, अभिषेक ने द्रोणा में कोशिश की, लेकिन वो इतनी कामयाब नही हुईं। ऋतिक रोशन सबसे सफलतम साबित हुए हैं, इसलिए सुपरहीरो फिल्म के लिए मैने उनका नाम नहीं लिया क्योंकि वो सच में हैं। रणवीर सिंह मुझे लगता है कि सुपरहीरो फिल्म कर सकते हैं क्योंकि उनमें वो बात है, वो यादगार परफॉर्मेंस दे सकते हैं। मुझे बहुत खुशी होगी अगर हमारे यहां सुपरहीरो फिल्में बने।

एक सलीम जावेद का समय था.. जब लोग लेखक के नाम को जाना करते थे.. फिर वैसी लोकप्रियता लेखकों को मिलना बंद हो गई.. अब पिछले कुछ सालों से, एक बार फिर उद्योग में लेखक को वो महत्व मिलने लगा है.. इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे.. और आप खुद कितना बदलाव देखते हैं?
इंडस्ट्री में इंपॉर्टेंस कोई नहीं देता है, उसको छीनना पड़ता है, लड़ना पड़ता है, कमानी पड़ती है। कदम कदम पर संघर्ष करना पड़ता है। इतने साल हो गए लेकिन आज भी गाना आता है, यू ट्यूब पर लिखा होता है कि ये ठीक नहीं लिखा है। किसी का नाम आना, या क्रेडिट आना उसको इंपॉवर करना होता है। जिनके फेस हैं, उनका नाम ना आए तो भी कोई समस्या नहीं है क्योंकि एक्टर्स को सभी जानते हैं। डायरेक्टर का नाम सबसे आखिरी में आता है जो कि सभी जानते हैं, लेकिन आज जब में नई फिल्मों के ओपनिंग क्रेडिट्स में देखता हूं तो 12-12 लोगों के नाम होते हैं। जिसमें लॉयर्स, अकाउंटिंग टीम, फाइनेंस.. इनके नाम होते और राइटर या गीतकार का नाम फिल्म के आखिरी में आता है, ये लेखक का फेल्योर नहीं है, ये समाज के फेल्योर है। क्योंकि हमारी इंडस्ट्री इस वक्त लॉ और अकाउंट को अपने ज्यादा करीब और महत्वपूर्ण समझने लगी है। लेकिन हम लोग इस मानसिकता से लड़ते जा रहे हैं, हमने कैंपेन भी चलाया था जिसका नाम 'क्रेडिट द क्रिएटर्स' था। कोशिश हम लोग करते हैं, लेकिन दो साल पहले तक जो गानों के प्लेटफॉर्म्स होते हैं, इसमें गीतकार का कोई सर्चफील्ड नहीं है। इसमें टॉप लिस्ट में गीतकार का नाम नहीं आता था। इसलिए हमने इसको संज्ञान में लिया और एक मुहिम शुरु कर दी। हम ट्वीट करते थे टैग करके, जैसे ये गाना इरशाद कामिल का है, आपने इरशाद का नाम क्रेडिट नहीं किया है, कृपया लिखिए। इस कोशिश के बाद बहुत सारे कॉमन लोग इस मूवमेंट से जुड़ गए, और उन लोगों ने ट्वीट करना शुरु कर दिया। इसका परिणाम आया और 8 महीने पहले की बात है, स्पॉटीफाई ने मुंबई में इरशाद कामिल का एक बड़ा होर्डिंग लगाया और लिखा साल का सर्वाधिक स्ट्रीम होने वाला गाना 'शायद', वो इनकी कलम से आया है। फर्क आता है मगर मेहनत करनी पड़ती है, हमने मिलकर काफी स्ट्रगल किया है। पिछले जनरेशन के जो गीतकार थे, उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता क्योंकि हमने उनके साथ काम नहीं किया। लेकिन हमारी जनरेशन में बहुत प्यार, मोहब्बत और एकता है। हम एक दूसरे की इज्जत करते हैं, काम को सराहते हैं।

आपने इंडिया की पहली 3डी डांस फिल्म एबीसीडी के डायलॉग्स और गाने लिखे थे, आज किस तरह से उसको याद करते हैं?
पहली एबीसीडी तो मुझे आकस्मिक रूप से मिली थी क्योंकि उसकी स्क्रिप्ट तैयार हो चुकी थी लेकिन उनको मजा नहीं आ रहा था। वो मेरे पास आए डॉक्ट्रिंग के लिए तो मैने इसको देखते देखते पूरी स्क्रिप्ट ही री-राइट कर दी। उनको ये बात काफी अच्छी लगी, जिस तरह से मैने प्रोजेक्ट पूरा किया। मेरा रिश्ता रेमो सर के साथ काफी पुराना है क्योंकि उनके लिए मैने 'फालतू' लिखी थी, वो उनकी पहली फिल्म थी और हिट भी हुई थी। मेरा सचिन जिगर के साथ काफी अच्छा रिश्ता था और वो फिल्म के लिए आया करते थे। वो कहते थे हम साथ में काम करेंगे। एबीसीडी की वजह से हमे साथ काम करने का मौका मिला, एबीसीडी लोगों ने पसंद की फिर एबीसीडी 2 बनने लगी। एबीसीडी बहुत ही भयंकर टीम वर्क वाली फिल्म थी। मै अपनी और सचिन जिगर की बात नहीं कर रहा हूं, हम लोगों ने तो मेहनत की ही, लेकिन रेमो सर और उनकी जो टीम थी, उन लोगों ने बहुत जबरदस्त मेहनत की थी। उनकी पूरी टीम को लेकर मेरे मन में काफी आदर है, रेमो ऐसे इंसान हैं जो कि ज्यादा बोलते नहीं है लेकिन ऐसा माहौल बना देते हैं कि आपको खुद लगने लगेगा कि मुझे इस आदमी के लिए अपनी सौ प्रतिशत देना है। फराह के लिए भी यही बात कहना चाहूंगा क्योंकि उनसे इतना प्यार मिलता है कि आपको लगेगा कि इनके लिए तो जान लगा दो।

थॉर बॉक्स ऑफिस पर इतना बेहतरीन प्रदर्शन कर रही है .. एक लेखक के रूप में नंबरों से आपको कितना फ़र्क पड़ता है?
(हंसते हुए) मैं हिंदी वर्जन की बात करूंगा, फर्क तो कुछ भी नहीं पड़ता है बस अगली फिल्म जाती है। अगले फिल्म में फिर मेरे बजट पर बातचीत नहीं होती है क्योंकि मैं सामने रख देता हूं। मुझे फर्क इस बात से पड़ता है क्योंकि आज के जमाने में नंबर्स झूठ नहीं बोलते हैं, पहले होता था लेकिन आज डिजिटल दौर है और पता चलता है कि कितने लोग फिल्म देखने आए। इससे आपको समझ में आता है कि आप जो लिख रहे हो उसका क्या इंपैक्ट पड़ रहा है। सबसे अच्छी बात तो ये है कि मैं पहले से ही थिएटर्स में जाकर ही फिल्में देखता हूं, लोगों के साथ बैठकर देखता हूं जो कि अलग तरह की नॉर्मल ऑडियंस होती है। मैं छोटे शहर से आया हूं और मेरा कनेक्ट अलग तरह का है ऑडियंस के साथ में, मैं जिस शहर से हूं वहां आजू बाजू के 80 गावों के किसान आते हैं बीज खरीदने के लिए। इसलिए मजदूरों, किसानों और गृहस्थ लोगों के साथ मैने फिल्में देखीं हैं, तो मुझे ऑडियंस की एक नब्ज पता है। इसलिए जब मैं देखता हूं फिल्मों के बड़े फिगर्स तो मैं बोल सकता हूं प्रोड्यूसर्स को कि, मैने कहा था कि ये चलेगा और ये चला। तब खुशी होती है कि इतनी बड़ी फिल्म की जिम्मेदारी को हमने निभा दिया। मार्वल्स के जो फैंस हैं वो बहुत प्यारे हैं, इतने इज्जत के साथ वो देखते हैं कि आप उनके साथ गलत नहीं कर सकते हैँ। हमने फैंस की सुनी है, रिएक्शन्स से पता चलता है। मैं यू-ट्यूब के कॉमेंट्स पढ़ता हूं जाकर कि लोग क्या बोल रहे हैं। नंबर्स महत्वपूर्ण हैं लेकिन फैंस का रिेक्शन भी महत्वपूर्ण है।

जाते जाते आप अपने आगामी प्रोजेक्ट्स के बारे में बताना चाहेंगे?
फिलहाल मैं लखनऊ में हूं, मेरा दोस्त है सफ्दर अब्बास वो फिल्म बना रहा है, एक बड़ी अच्छी कहानी है। उसकी शूट के लिए हम यहां पर हैं, इसके अलावा एक छत्रपति करके प्रोजेक्ट है, उसका रीमेक हैं जो कि राजामौली सर ने बनाई थी, उसी का रीमेक हिंदी वर्जन बन रहा है। उसकी स्क्रिप्ट मैने लिखी है और इसके लिए दो गाने भी मैने लिखे हैं। काफी प्रोजेक्ट्स हैं, वापस जाने के बाद 'अमेजन' और 'नेटफ्लिक्स' के साथ भी काम करना है।


Click it and Unblock the Notifications