EXCLUSIVE INTERVIEW: द वैक्सीन वॉर, बॉक्स ऑफिस और अमिताभ बच्चन पर बोले विवेक अग्निहोत्री

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Vivek Agnihotri Exclusive Interview: अपनी फिल्मों की घोषणा मात्र से चर्चा में आ जाने वाले निर्माता- निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि सोशल मीडिया पर लोग उनके बारे में क्या कहते हैं, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वो सिर्फ ऐसी फिल्में बनाना चाहते हैं, जो समाज पर प्रभाव डाले और जिस पर लोग चर्चा करें।

निर्देशक कहते हैं, "कुछ लोग नहीं चाहते कि मेरी फिल्म चले, इसीलिए वो निगेटिव बातें बोलते रहते हैं। लेकिन ये उनका इकोसिस्टम है। मुझे बहुत सारे लोगों से आशीर्वाद मिलता रहता है। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"

फिल्मीबीट से साथ खास बातचीत में विवेक अग्निहोत्री ने अपनी आगामी फिल्म 'द वैक्सीन वॉर' पर खुलकर बातें की हैं। साथ ही उन्होंने स्टार सिस्टम, बॉक्स ऑफिस से लेकर अमिताभ बच्चन के साथ काम करने की अपनी ख्वाहिश को लेकर काफी कुछ शेयर किया है।

यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

Q. आपकी फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' को नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया है। जानना चाहते हैं कि बतौर निर्माता- निर्देशक अवार्ड जीतने से कितना बदलाव आता है?

A. मैं अवार्ड्स की बहुत अधिक परवाह नहीं करता, लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार एक प्रतिष्ठित पुरस्कार है, इसकी विश्वसनीयता है और इसका वास्तव में बहुत महत्व है। मैं इस अवॉर्ड से खुश हूं क्योंकि 'द कश्मीर फाइल्स' आने के बाद बहुत लोग कह रहे थे कि कश्मीर में कभी कोई नरसंहार हुआ ही नहीं। और ये वो लोग हैं जो आतंकवादियों का समर्थन करते हैं और नरसंहार से इंकार करते हैं। तो इस अवार्ड ने एक काम किया है, इसने उन सभी लोगों को चुप करा दिया है। दूसरा, इसने उस बात को मान्यता दे दी है जो कश्मीरी पंडित समुदाय पिछले इतने वर्षों से कह रहा था। लिहाजा, मैं इस समुदाय के लिए बहुत खुश हूं।

Q. 'द वैक्सीन वॉर' बनाने के पीछे आपकी पहली सोच क्या थी?

A. सबसे पहले यही ख्याल आया कि साइंटिस्ट के ऐसे दुश्मन से लड़ रहे थे, जिसे आप देख नहीं सकते। पूरी दुनिया थम चुकी है, लेकिन शत्रु अदृश्य है। इसके बाद उन्होंने एक वैक्सीन बनाई, जो आपके शरीर में गई, आपको इसका एहसास भी नहीं हुआ और अचानक महामारी खत्म हो जाती है। लेकिन उसके बीच में जो प्रक्रिया हुई, मैं उसे जानना चाहता था। मैं जानना चाहता था कि ये सब कैसे हुआ। जब मैंने रिसर्च करना शुरू किया, तो कुछ चीजें हमारे सामने आईं। सबसे पहले, हमने समझा कि यह एक वॉर जैसा था। इसके ख़िलाफ़ बहुत सारी ताकतवर लॉबी थीं, जो नहीं चाहती थीं कि भारत वैक्सीन बनाये। वे चाहते थे कि भारत विफल हो जाए। लिहाजा, हमने इस चुनौती को कैसे पार किया, यह अपने आप में एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है। साथ ही बहुत सी बातें हैं.. जैसे वैज्ञानिकों का ईरान जाना, फिर वहां युद्ध क्षेत्र में प्रयोगशालाएं स्थापित करना। इसके बारे में कोई नहीं जानता। विभिन्न प्रकार की चीजें हुईं जो मुझे लगता है कि बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन सबसे ऊपर, एक कारण जिसने वास्तव में हमें यह फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया, वह यह है कि इस वैक्सीन को बनाने वाली ज्यादातर साइंटिस्ट महिलाएं थीं। लिहाजा, हमने सोचा इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, हमें यह फिल्म बनानी चाहिए।

द वैक्सीन वॉर चैलेंजिंग फिल्म रही

Q. इस फिल्म को "भारत की पहली बॉयो- साइंस फिल्म" कहा जा रहा है। जाहिर तौर पर फिल्म में कई मेडिकल और साइंटिफिक शब्दों का इस्तेमाल किया गया होगा। ऐसे में आपने यह कैसे सुनिश्चित किया कि दर्शकों तक आपकी बात आसानी से पहुंच जाए? क्या इसे लिखना चुनौतीपूर्ण था?

A. हां, यह चैलेंजिंग था क्योंकि यह बहुत जटिल विज्ञान था। रॉकेट साइंस के विपरीत आप यहां कुछ नहीं दिखा सकते कि देखा ये रॉकेट है, ये ऐसे बनता है। अगर आप दर्शकों को बोलेंगे कि आप यहां से चांद तक एक रॉकेट भेज रहे हैं, तो लोग कल्पना कर सकते हैं। लेकिन वैक्सीन वॉर के साथ कुछ ऐसा नहीं था, जिसकी आप कल्पना कर सकें। वहीं, कलाकारों को भी मास्क में दिखाया जाना था। तो हां, यह जटिल था, लेकिन मेरी चुनौती यह थी कि इसे सरल कैसे बनाया जाए ताकि भले ही हम साइंटिफिक शब्दों का उपयोग करें और फिर भी यदि आप फिल्म को समझना चाहते हैं, तो यह आपके लिए कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। जिन लोगों के पास विज्ञान की कोई पृष्ठभूमि नहीं है, यहां तक कि अशिक्षित लोग भी फिल्म को समझ सकें.. इसलिए मेरे लिए मानवीय और भावनात्मक हिस्से को मजबूत रखना महत्वपूर्ण था।

Q. द कश्मीर फाइल्स के लिए आपका रिसर्च वर्क काफी लंबा चला था। इस फिल्म के रिचर्स को लेकर यदि आप कुछ शेयर कर पाएं?

A. इसके स्क्रिप्ट पर हमने 2 साल तक गहनता से काम किया है। इस फिल्म की रिसर्च में वैसे कम समय लगा क्योंकि जिन लोगों के साथ रिचर्स करना था, वो सभी इंस्टीट्यूट्स भारत में ही हैं। हम उन्हें जानते हैं। साइंटिस्ट की टीम भी कोई बहुत ज्यादा नहीं थी। छोटी सी टीम ने पूरा काम किया। साथ ही पहले से ही कोविड से संबंधित बहुत सारा डेटा और जानकारी उपलब्ध थी। लेकिन जो मुश्किल था, वो ये जानना कि भारत में कौन-कौन सी फार्मा लॉबी काम कर रही हैं। कौन-कौन लोग उनके लिए काम कर रहे हैं और वे कैसे काम कर रहे थे। वह कठिन हिस्सा था। लेकिन मैं पिछले कुछ सालों से इस विषय पर काम कर रहा हूं। मेरी अगली किताब भी उसी पर है। इसीलिए उसका 70 प्रतिशत तो मुझे आइडिया था। बाकी का 30 प्रतिशत हमने पिछले 2 वर्षों में शोध किया और पाया।

अमिताभ बच्चन के साथ काम करने की ख्वाहिश है

Q. और कास्ट की बात करें तो, नाना पाटेकर का कैसे जुड़ना हुआ। वो बहुत अनुभवी कलाकार हैं, लेकिन पिछले 5-6 वर्षों में, वह ज्यादा सक्रिय नहीं रहे हैं?

A. हां, सही कर रही हैं। लेकिन हमें एक ऐसे एक्टर की तलाश थी, जिनकी क्रेडिबिलिटी हो। कोई ऐसा एक्टर, जिसने कभी कोई बुरी परफॉमेंस नहीं दी हो। हमने पूरे दिन बैठकर लिस्ट बनाई। और हैरानी है कि लगभग हर कलाकार ने कभी ना कभी, किसी ना किसी मोड़ पर थोड़ा कॉम्प्रोमाइज किया है। लेकिन नाना पाटेकर भारत के एक ऐसे अभिनेता हैं, जिन्होंने एक बार भी समझौता नहीं किया। आप एक भी ऐसी फिल्म नहीं देख सकते, जिसमें उनका अभिनय अच्छा ना हो। जब प्रदर्शन की बात आती है तो नाना बहुत ऊंची विश्वसनीयता लेकर आते हैं। हम उनके जैसा, एक दमदार व्यक्तित्व वाला एक्टर चाहते थे। ऐसे में, दो ही चॉइस थी, या तो मिस्टर बच्चन जैसा कोई हो, लेकिन फिर वह इतने बड़े स्टार हैं कि उनकी सुपर डुपर स्टार वाली छवि इस किरदार पर हावी हो जाती। और हम किसी ऐसे व्यक्ति को भी चाहते थे जो भारत के एक सामान्य आदमी की तरह दिख सके। मुझे लगता है, मिस्टर बच्चन के लिए एक आम आदमी की तरह दिखना मुश्किल था क्योंकि उनका व्यक्तित्व बहुत ऊंचा है। मैं अमिताभ बच्चन का बहुत बड़ा फैन हूं। लेकिन मैंने सोचा, हम किसी भी चीज़ पर समझौता नहीं करेंगे। और इस तरह, नाना हमारे साथ जुड़े।

Q. आपने अमिताभ बच्चन को कभी अप्रोच किया है?

A. उनके साथ काम करना मेरा सपना है। अपने एक प्रोजेक्ट 'द ताशकंद फाइल्स' के लिए मैंने उन्हें अप्रोच किया था। मैंने उनसे भूमिका के बारे में बात की लेकिन कुछ कारणों से हमें फिल्म बनाने में देरी हो गई और बात नहीं बन पाई। लेकिन हां, एक फिल्म फिल्ममेकर के रूप में मिस्टर बच्चन के साथ कुछ अलग करना मेरी ख्वाहिश है.. मेरी एकमात्र ख्वाहिश।

चाहता हूं कि भारतीय नारीवाद पर चर्चा शुरु हो

Q. चाहे वह 'द कश्मीर फाइल्स' हो या 'द वैक्सीन वॉर', जैसे ही आप किसी फिल्म की घोषणा करते हैं, सोशल मीडिया पर काफी चर्चा शुरू हो जाती है। पॉजिटिव भी और निगेटिव भी। एक निर्देशक के रूप में क्या इसका असर आप पर और आपके काम पर पड़ता है?

A. मैं ईमानदारी से कहता हूं कि मैं इन बातों से ज्यादा प्रभावित नहीं होता हूं। कोई भी फिल्म बनाने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि.. वो सारी चीजें जिन पर समाज बात नहीं करती है, आम तौर पर लोग कतराते हैं, वे मुद्दे मुख्यधारा का हिस्सा बनें। कई लोग अपनी फिल्में बॉक्स ऑफिस के लिए बनाते हैं, कई लोग शोहरत के लिए, लेकिन अब मैं जो फिल्में बनाता हूं वह सिर्फ चर्चा शुरू करने के लिए होती हैं। मेरी सभी फिल्मों ने ऐसा किया है। जैसे 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' ने यूनिवर्सिटी परिसरों के अंदर साम्यवाद और नक्सलवाद के बारे में बातचीत शुरू की। जिसे लेकर काफी चर्चा हुई थी। यहां तक की लोग मुझ पर हमला करने आ गए थे। फिर 'द ताशकंद फाइल्स' ने बहुत सारे चैप्टर्स खोले। 'द कश्मीर फाइल्स' ने कश्मीर मुद्दे पर बातचीत शुरू की और अब 'द वैक्सीन वॉर' से इंडियन साइंटिफिक टेम्प्रमन्ट और भारतीय महिलाओं पर भी बातचीत शुरू होगी। मैं चाहता हूं कि भारतीय महिलाओं के इर्द-गिर्द बातचीत शुरू हो क्योंकि मुझे लगता है कि हमें पश्चिमी शैली के नारीवाद और भारतीय नारीवाद के बीच एक रेखा खींचने की जरूरत है। दोनों बहुत अलग हैं। लेकिन बॉलीवुड में फिल्में बनी हैं, वो पश्चिमी स्टाइल फेमिनिज्म पर ही बनी हैं। इन फिल्मों में महिलाओं को सशक्त दिखाने का तरीका यह है कि वह अपने बाल काटती है, शराब पीना और धूम्रपान करना शुरू कर देती है, छोटे कपड़े पहनती है और यूरोप या कहीं घूमने निकल पड़ती है। क्वीन या बहुत सी सारी फिल्में आपने देखी होंगी। या वो पति से लड़ लेती है, या डिवोर्स ले लेती है, या थप्पड़ का बदला कोर्ट में जाकर ले लेती है। यह सशक्तिकरण दिखाने का बहुत ही सतही आधार है। लेकिन अगर आप हमारे देश की माताओं को देखें तो उनमें सबसे बड़ा गुण क्या है? सबसे बड़ा गुण त्याग है। वे खाना बनाती हैं, घर की सफाई करती हैं, साथ ही वे हवाई जहाज उड़ा सकती हैं या किसी बैंक के सीईओ बन सकती हैं। ये सभी महिला वैज्ञानिक जिन्होंने इस वैक्सीन को बनाया, वे अपने बच्चों की देखभाल कर रही थीं, घरेलू काम कर रही थीं और फिर भी वे वैक्सीन बना रही थीं। लेकिन पश्चिमी शैली का नारीवाद इन्हें सशक्त महिलाओं के रूप में मान्यता नहीं देता है। क्योंकि पश्चिमी शैली का नारीवाद महिलाओं को वर्कफोर्स में डालने के लिए है और इसलिए वे नहीं चाहते कि कोई भी महिला घरेलू काम करे। लिहाजा, यदि नारीवाद की इस राजनीति पर चर्चा शुरु हो तो मुझे खुशी होगी। लाखों भारतीय महिलाएं जो महसूस करती हैं कि पश्चिमी शैली के नारीवाद के कारण वे पीछे रह गई हैं, वे भी मुख्यधारा का हिस्सा बन सकती हैं, और उनके योगदान, उनके बलिदान को मान्यता दी जाती है और उनका जश्न मनाया जाता है। इस फिल्म से मैं यही हासिल करना चाहता हूं।

नसीरूद्दीन शाह को आतंकवादियों से सहानुभूति है

Q. लेकिन पिछले 2 सालों में हमने देखा है कि आपकी फिल्मों को सोशल मीडिया पर 'प्रोपेगेंडा' का टैग दिया जाता है। फिल्म इंडस्ट्री से भी कई लोगों ने प्रतिक्रिया दी है। हाल ही में नसीरुद्दीन शाह ने आपकी पिछली फिल्म को डिस्टर्बिंग बताया। इस पर आपकी क्या सोच है?

A. मैं सिर्फ एक ही बात जानता हूं कि निगेटिव लोगों के लिए चीजें निगेटिव होती हैं। पॉजिटिव लोगों के लिए पॉजिटिव होती हैं। ये तो दुनिया का ही नियम है। इसका सोशल मीडिया से कोई लेना- देना नहीं है। खैर, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। जो लोग आतंकवाद का समर्थन करते हैं, जो लोग नक्सलवाद का समर्थन करते हैं, जो लोग इंडिया के विरोध में ही खड़े रहते हैं हमेशा, तो वही लोग 'द कश्मीर फाइल्स' को प्रोपेगेंडा बोलते हैं.. और वही लोग 'द वैक्सीन वॉर' को भी प्रोपेगेंडा बोलेंगे, ये आप मुझसे लिखकर ले लीजिए। इन लोगों को कोई भी पॉजिटिव चीज पसंद नहीं है। वे हर समय, हर जगह नकारात्मकता चाहते हैं। उन्हें मेरे बारे में नकारात्मक बातें लिखनी होती हैं। वे नहीं चाहते कि यह फिल्म चले। लेकिन ये उनका इकोसिस्टम है। मुझे इतने सारे लोगों से आशीर्वाद मिलता है, मेरे लिए वही बहुत है। द कश्मीर फाइल्स के लिए मुझे कश्मीरी हिंदू समुदाय से और जहां भी मैं गया वहां से बहुत प्यार और आशीर्वाद मिला। मैं तो अपने काम की वजह से मजबूरी में सोशल मीडिया पर हूं। मेरा काम ऐसा है कि मैं सोशल मीडिया पर न रहने का जोखिम नहीं उठा सकता। वरना मैं तो हर दिन भगवान से प्रार्थना करता हूं कि मुझे आज सोशल मीडिया पर न रहना पड़े।

Q. निगेटिविटी का प्रभाव काम पर पड़ता है?

A. नहीं, मैं विक्टिम जैसा महसूस नहीं करता। मुझे विक्टिम कार्ड खेलने से नफरत है। अगर नसीरुद्दीन शाह मेरी फिल्म को लेकर कुछ कह रहे हैं तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है। या तो नसीर भाई इतने बूढ़े हो गए हैं कि सही और गलत के बीच अंतर नहीं कर पा रहे हैं या उन्हें आतंकवादियों से सहानुभूति है और वे कश्मीर नरसंहार के पीड़ितों से नफरत करते हैं। या वो अपने जीवन में किसी बात से निराश होगें। मुझे नहीं पता कि उसकी समस्या क्या है। मेरा मतलब है, कोई यह क्यों कहेगा कि नरसंहार कभी नहीं हुआ। यदि नरसंहार कभी नहीं हुआ, तो कश्मीर में कोई कश्मीरी पंडित कैसे नहीं रहता? मुझे समझ नहीं आता कि इस तरह का अमानवीय दृष्टिकोण कहां से आता है। मुझे यकीन है कि नसीर भाई के लिए या तो संन्यास लेने का समय आ गया है या उन्हें मदद की जरूरत है।

बॉलीवुड भ्रष्ट इंडस्ट्री है, इसीलिए मैं सवाल उठाता हूं!

Q. आप अक्सर बॉलीवुड की राजनीति के बारे में भी बात करते हैं। समझना चाहती हूं कि वास्तव में बॉलीवुड की वह कौन सी बात है जो आपको लकीर के दूसरी तरफ खड़ा करती है?

A. मुझे इस पूरी बॉलीवुड मानसिकता से दिक्कत है। सबसे पहले, मैंने यहां काफी समय बिताया है इसीलिए मैं समझता हूं वे कैसा महसूस करते हैं और क्या सोचते हैं। जब भी आप कोई फिल्म बनाते हैं, तो वे आपको इसे औसत करने के लिए मजबूर करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि दर्शक बेवकूफ हैं। उन्हें लगता है कि यह सिंगल स्क्रीन, यह मध्यवर्गीय भारतीय दर्शक बेवकूफ हैं, उन्हें कुछ भी समझ नहीं आता है, वे किसी भी बुद्धिमान चीज़ को समझने के लायक नहीं हैं और इसलिए आपको यथासंभव मूर्खतापूर्ण फिल्म बनानी चाहिए। यही मेरी एक बड़ी समस्या है। मेरी दूसरी बड़ी समस्या यह है कि इस इंडस्ट्री में लेखकों और निर्देशकों का कोई सम्मान नहीं है, जो असली रचनाकार हैं। अगर आप इंडस्ट्री की पिछली 3- 4 सुपर डुपर हिट फिल्में उठा लें तो कोई नहीं बता पाएगा कि उस फिल्म का लेखक और निर्देशक कौन है। क्या आपने कभी देखा है कि कोई लेखक बीच में खड़ा हो और मीडिया उनकी तस्वीरें कवर कर ले। और ऐसा नहीं है कि मीडिया हमेशा से ऐसा करता था। नहीं.. लेकिन ये स्टार्स हैं, जिन्होंने इस सिस्टम को बढ़ाने के लिए मजबूर किया। उन्होंने हमेशा खुद को केंद्र में रखना शुरू कर दिया है। और मेरी तीसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह एक बहुत ही दमनकारी और भ्रष्ट उद्योग है। इसलिए, जो कोई भी कहता है कि हमें सिस्टम के खिलाफ नहीं बोलना चाहिए और इसे बदलना चाहिए, मेरा सवाल यह है कि यह वह इंडस्ट्री है जो मुझे सीधे प्रभावित करती है क्योंकि मेरी रोटी यहीं से आती है.. तो मुझे इस इंडस्ट्री पर सवाल क्यों नहीं उठाना चाहिए? मैं जाकर CAA के लिए एक्टिविज्म करूं और शाहीन बाग या जेएनयू में जाकर धरना हूं, लेकिन अपने ही उद्योग के उत्पीड़कों को स्वीकार करके, उनके सामने घुटने टेक दूं, तो इसका कोई मतलब नहीं है। इसलिए, मैं सबसे पहले उस व्यवस्था को चुनौती देता हूं। और मैं ऐसा इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि मेरे मन में बॉलीवुड के खिलाफ कुछ है या मैं इससे नफरत करता हूं। मैं गंभीरता से अपने दिल की गहराई से कहता हूं कि जो कोई भी मुझे जानता है, वह समझता है कि मैं कितनी शिद्दत से महसूस करता हूं कि भारतीय सिनेमा का पूरी दुनिया में सम्मान किया जाना चाहिए। और यही कारण है कि मैं इतनी मेहनत कर रहा हूं, दुनिया भर में अपनी फिल्में ले जा रहा हूं ताकि उन्हें दिखा सकूं कि भारत क्या है।

Q. इंडस्ट्री में बाकी फिल्ममेकर्स के साथ आप कैसा रिश्ता साझा करते हैं?

A. मैं तो हर किसी से बात करता हूं। हाल ही में, सुधीर मिश्रा सोशल मीडिया पर चिल्ला रहे थे कि उनके वामपंथी दोस्त उनकी ही फिल्म का समर्थन नहीं करते हैं, तो मैंने कहा कि ठीक है आइए, मैं आपकी फिल्म का समर्थन करूंगा। मुझे किसी से कोई समस्या नहीं है। जब भी मुझे कोई चीज़ पसंद आती है तो मैं उन्हें फोन करता हूं, उन्हें लिखता हूं कि मुझे आपका काम पसंद आया। और मुझे नहीं लगता कि जब कोई मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिलता है तो उसे मुझसे कोई समस्या होती है। लेकिन जब मैं काम करता हूं, तो मैं अपने साथ काम करने वाले हर व्यक्ति को यह बताना सुनिश्चित करता हूं कि मेरी सोच क्या है, मैं किस प्रकार का सिनेमा बनाता हूं और यदि वे हमारे नियमों और शर्तों पर काम करते हैं तो यह ठीक है, यदि वे नहीं करना चाहते हैं.. तो भी ठीक है। हमारे बीच कोई समस्या नहीं, कोई मनमुटाव नहीं।

बॉक्स ऑफिस के सही आंकड़े कोई नहीं जानता

Q. आप फिल्म निर्देशक के साथ साथ निर्माता भी हैं। बॉक्स ऑफिस आंकड़ों को किस तरह से देखते हैं?

A. मुझे ये आंकड़ें बहुत फर्जी लगते हैं और मेरे लिए इनका कोई मतलब नहीं है। आंकड़ों का जनता से क्या लेना-देना? यदि आपकी फिल्में चर्चा शुरू कर सकती है, समाज पर वास्तविक प्रभाव डाल सकती है, तो ठीक है। यदि किसी फिल्म से एक व्यक्ति का जीवन भी बदल गया, तो हमारा काम पूरा हो गया। फिल्म को प्रभावी होना चाहिए। लोगों को आज से 5 साल बाद भी मेरी फिल्में ऐसे याद होनी चाहिए जैसे यह उनकी जिंदगी का हिस्सा हो। वरना हम इन नंबरों का क्या करेंगे। और सच तो ये है कि कोई नहीं जानता कि सटीक आंकड़ें क्या हैं।

Q. अंत में, अपनी आने वाली फिल्मों के बारे में बताते जाएं।

A. मेरी अगली फिल्म 'द दिल्ली फाइल्स' है, जिसकी शूटिंग मैं जनवरी में शुरू कर रहा हूं और उम्मीद है कि यह 2024 में रिलीज होगी। इसके अवाला, पिछले कुछ सालों से हम कुछ बहुत ही प्रमुख लोगों के साथ एक कहानी पर रिचर्स कर रहे हैं। मैंने ये बात कभी नहीं कही, लेकिन मैं धर्म- अधर्म की लड़ाई पर एक बड़ी फिल्म बनाऊंगा।

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