..................... EXCLUSIVE INTERVIEW: Nawazuddin Siddiqui on star system, box office, struggle, Kangana Ranaut and much more - Hindi Filmibeat

EXCLUSIVE INTERVIEW: सिनेमा, स्टारडम से लेकर स्ट्रगल तक, नवाजुद्दीन सिद्दीकी से दिल छूने वाली खास बातचीत

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Nawazuddin Siddiqui Exclusive Interview: नवाजुद्दीन सिद्दीकी फिल्म इंडस्ट्री के एक मुखर कलाकार हैं, जो अपने सामने बैठे पत्रकार से बेखटके कह देते हैं कि मुझे बॉक्स ऑफिस से संबंधित सवाल बिल्कुल पसंद नहीं हैं। वह खुले तौर पर बॉलीवुड की दशकों पुराने पूर्वाग्रहों के बारे में आलोचना करते हैं और अभिनय में ईमानदारी रखने की बात करते हैं। नवाज फिल्म 'जोगीरा सारा रा रा' के साथ 26 मई को सिनेमाघरों में दस्तक देने वाले हैं।

फिल्मीबीट से साथ खास बातचीत में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपने फिल्मी सफर पर दिल छूने वाली बातें की हैं। उन्होंने स्टार सिस्टम, फिल्म प्रमोशन से लेकर कंगना रनौत और अपनी आगामी फिल्मों को लेकर काफी कुछ शेयर किया है।

अभिनेता कहते हैं, "मैं हर फिल्म में यही कोशिश करता हूं कि मेरे किरदार में सच्चाई दिखे। वो कभी पर्दे पर दिखती है, कभी नहीं दिखती है। लेकिन मैं कोशिश पूरी करता हूं। कभी मैं फंस भी जाता हूं, कभी करप्ट भी हो जाता हूं, कभी गलतियां भी हो जाती हैं, कभी कभी ये भी लगता है कि ये फिल्म मैंने क्यों की.. लेकिन यही सफर है।"

यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

Q. बॉक्स ऑफिस से जुड़े सवाल आपको पसंद नहीं, लेकिन फिल्म प्रमोशन को लेकर क्या सोचते हैं?

A. फिल्म प्रमोशन तो अब एक रिवायत बन गई है, तो करना ही पड़ता है। हर आदमी चाहता है कि अपनी फिल्म को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाए। लेकिन उस बीच में जब कोई बॉक्स ऑफिस के बारे में पूछता है या आंकड़ों के बारे में बात करता है, वो चीज मेरे जैसे एक्टर को अजीब लगता है। हम लोग नंबर्स को सोचकर फिल्में नहीं कर रहे हैं। हमें आर्ट से प्यार है, इसका शौक है। चाहे वो कोई भी विधा हो, उदाहरण के तौर पर यदि मुझे पेटिंग का शौक है तो मैं वो बनाउंगा, फिर मैं ये सोचकर नहीं बनाउंगा कि ये कितने में बिकेगी। इसीलिए मुझे लगता है कि बॉक्स ऑफिस का सवाल गलत लोगों से पूछा जा रहा है। इसके बारे में सिर्फ प्रोड्यूसर्स, फाइनेंसर्स से पूछें, वो बिल्कुल सही जवाब देंगे क्योंकि वही इसमें एक्सपर्ट हैं।

Q. लेकिन सिनेमा एक तरह से बिजनेस ही है, तो कहीं ना कहीं कलाकार भी इससे प्रभावित तो होते होंगे?

A. मुझे नहीं लगता कि प्रभावित होना चाहिए। फिल्म फ्लॉप होने के बहुत सारे कारण होते हैं। कभी कभी होता है कि फिल्म ही आपकी 60 स्क्रीन पर रिलीज हो रही है और मेकर्स उम्मीद करते हैं कि एक्टर 4 करोड़ की ओपनिंग लेकर के आए, तो ये तो फिर नामुमकिन है ना। फिर एक्टर के ऊपर इल्जाम लग जाता है कि ये एक्टर फिल्म नहीं हिट करा सकता। मेरे हिसाब से फिल्म को हिट करने का तरीका प्रोड्यूसर के पास होता है। जो मार्केटिंग देखते हैं, उनके पास होता है। फिल्म को आप कितने बड़े स्तर पर ले जा रहे हैं, ये उनके हाथ में है। फिल्म अच्छी है कि बुरी है ये तो बाद में पता चलेगा, लेकिन पहली सीढ़ी होती है दर्शकों को सिनेमाघर तक लाने की।

Q. फिल्मों को जब उम्मीद मुताबिक स्क्रीन नहीं मिल पाती है, बतौर एक्टर दुख होता है?

A. बिल्कुल, इस बात का तो बहुत दुख होता है कि फिल्म लोगों तक नहीं पहुंच रही है। फिल्म लोगों तक पहुंचे, सब उसे देंखे, तब फैसला होगा ना कि फिल्म अच्छी है या बुरी। पहले लोगों तक पहुंचे तो। लोग यहां ढूंढ़ रहे होते हैं कहां लगी है फिल्म। फिर लोग अंत में यट्यूब या ओटीटी पर देखते हैं, तब पता चलता है कि ये तो बहुत अच्छी फिल्म थी, हमने मिस कर दी।

Q. आपके अभिनय को लेकिन दर्शकों ने हमेशा सराहा है, प्यार दिया है।

A. बिल्कुल, और इससे एक मोटिवेशन मिलता है अच्छा काम करने का। मुझे लगता है कि मैं उन्हीं की वजह से ही हर अगली फिल्म में और मेहनत करने की कोशिश करता हूं। लोगों का प्यार मुझे मोटिवेट करता है।

Q. आज के समय में हिंदी फिल्मों के कंटेंट को किस तरह से देखते हैं?

A. मुझे लगता है कि हिंदी सिनेमा का जो अभी कंटेंट है, वो बहुत ही रिपीटेटिव हो रहा है। पैंडेमिक से पहले कुछ वक्त के लिए काफी अच्छी फिल्में आईं। लोगों का रिस्पॉस भी बहुत अच्छा रहा, फिल्में हिट हुईं। लेकिन पैंडेमिक के बाद सबने सोचा कुछ और था, हो कुछ और गया। दर्शक अब आ ही नहीं रही है थियेटर्स तक। और बहुत सारे कारण हैं इसके पीछे; चाहे वो टिकटों की कीमत हो या लोगों का इंस्टाग्राम और रील्स में ज्यादा वक्त देना हो। साथ ही लोगों को घर में आराम से बैठकर ओटीटी कंटेंट देखने की भी आदत हो गई है। उसे सब ओटीटी पर मिल रहा है तो वो क्यों जाएगा बाहर, जब तक आप उसे कुछ बेहतरीन नहीं देंगे।

Q. फिल्मों की राइटिंग को लेकर भी काफी सवाल उठाए जाते हैं कि राइटर्स को उतनी अहमियत नहीं दी जा रही है, जिस वजह से कंटेंट दर्शकों को सिनेमाघर तक खींच नहीं पा रही है?

A. ये भी बिल्कुल सच है। कंटेंट बहुत सतही लिखा जा रहा है। बजट के हिसाब से तो फिल्में बड़ी हैं, लेकिन उससे ऑडियंस को मिल क्या रहा है? जो अच्छे राइटर्स भी हैं हमारे यहां, उन्हें तवज्जो देनी चाहिए। ये बहुत जरूरी है।

Q. स्टार सिस्टम को लेकर आप क्या सोचते हैं? आजकल स्टार्स की फीस को लेकर काफी सवाल उठाए जा रहे हैं?

A. ये पहले था कि बहुत बड़ा स्टार है, उसकी एक फैन फॉलोइंग है तो लोग उसे देखने के लिए फिल्म भी देखने आ रहे हैं। लेकिन अब तो वो भी सीन नहीं है, तो फिर किस बात है पैसा। बहुत मेकर्स तो अब ये भी कर रहे हैं कि फीस की जगह मुनाफा दे रहे हैं। यदि फिल्म चली, प्रॉफिट हुआ, तो कुछ आप भी ले जाना। ये सही भी है। दूसरी बात ये है कि यदि कोई स्टार फिल्म कर रहा है, उसकी फैन फॉलोइंग है, लेकिन उसके बाद भी फिल्म नहीं चली, तो उसका दोष भी सिर्फ स्टार पर नहीं, बल्कि उसके राइटर और डायरेक्टर भी जाना चाहिए। फिल्म में सभी बराबर के भागीदार होते हैं। लेकिन हां, इंडस्ट्री में परिवर्तन तो जरूर आना चाहिए। चाहे वो कंटेंट को लेकर हो या किसी बात को लेकर। मैं सीधे किसी एक चीज पर उंगली नहीं रख पाउंगा अभी, लेकिन बदलाव जरूरी है। इसीलिए मैं कोशिश करता हूं कि जितना एक्सपेरिमेंट कर सकता हूं, वो करता रहूं।

Q. फिल्मों में आपको दो दशक से ज्यादा का वक्त हो गया। कितना आसान या मुश्किल है, आज भी किरदारों को उसी पैशन से निभाना और पर्दे पर नयापन लाना?

A. आसान तो नहीं होता है, हर रोल ज़ीरो से स्टार्ट करना पड़ता है। पहले किरदार को भूलाकर, फिर नए किरदार में ढ़लना और सहजता के साथ निभाना मुश्किल होता है। इस सहजता के पीछे और मेहनत होती है।

Q. और इस मेहनत के पीछे की मोटिवेशन क्या है?

A. मोटिवेशन यही है कि मेरी एक जर्नी है, मैं उस पर चल रहा हूं और मैंने कोई डिस्टिनेशन नहीं सोचा है कि मैं कहां जाउंगा। बस मुझे चलते जाना है। यही मेरी लाइफ है और इसी लाइफ में मैं खुश हूं। उतार- चढ़ाव आएंगे, कभी कोई फिल्म चलेगी, कभी कोई नहीं चलेगी, कभी कोई बहुत बड़ी हिट होगी, ये सब हमारे काम का हिस्सा है। मुझे बस मेहनत के साथ, ईमानदारी के साथ काम करते जाना है बस।

Q. कुछ समय पहले, आपने एक बयान दिया था कि मर जाऊंगा लेकिन अब छोटे रोल नहीं करूंगा।

A. वो तो मैं बिल्कुल नहीं करूंगा। मैंने 12 साल स्ट्रगल किया है, बहुत सारे छोटे रोल किये हैं, अब नहीं करूंगा।

Q. ये भी तो कहा जाता है कि रोल छोटा हो या बड़ा, एक अभिनेता को इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

A. यहां फर्क पड़ता है। वो जो ग्रेट फिल्में बनती हैं ना, वो हॉलीवुड में ही बनती हैं , जहां रोल छोटा- बड़ा नहीं होता है। यहां बॉलीवुड में होता है। इसी फिल्म (जोगीरा सा रा रा) में देख लीजिए, सब बेहतरीन एक्टर्स हैं। किसी से कम नहीं हैं ये। इनसे भी इनके सपने पूछना। ये भी करना चाहते हैं ना बड़ा रोल। लेकिन कहां मिलता है? हजारों, लाखों में कोई एक होता है जिसको वो रास्ता मिल जाता है। तो ये अन्याय नहीं है? कितने अच्छे अच्छे एक्टर्स हैं हमारे देश में और वो सर्पोटिंग एक्टर बन के रह जाते हैं। जो मुख्य भूमिका निभा रहे हैं, वो कौन हैं। इतना टैलेंट है उनके अंदर? इन कलाकारों के बारे में कौन सोचेगा। इनके सपने, जिसके लिए इन्होंने सालों साल इतनी मेहनत की। 12 साल, 15 साल लगा दिये, आज भी वो सर्पोटिंग एक्टर बने हुए हैं। कौन हैं ये डिसाइड करने वाले कि एक विशेष लुक वाला एक्टर ही मेन रोल करेगा। टैलेंट को प्रमुखता मिलनी चाहिए। अगर आप एक ईमानदार फिल्म बना रहे हैं, तो आपका सिद्धांत होना चाहिए कि सही टैलेंट फिल्म का हिस्सा बने और वो कहीं से भी आ सकता है।

Q. करियर में उतार- चढ़ाव से किस तरह से डील करते हैं?

A. मैं इस मामले में बच्चन जी बहुत इंस्पायर होता हूं। उनसे खूबसूरत उतार- चढ़ाव किसी ने नहीं देखा होगा। जब आपके सामने ऐसे उदाहरण हों तो उससे प्रेरणा ले सकते हैं आप। एक वक्त था बच्चन साहब का, फिर दूसरा वक्त आया, फिर तीसरा भी वक्त आया.. जो अभी चल रहा है। आज भी वो इतने एक्टिव हैं, इतना काम करते हैं। सक्सेस वही है, जब आप गिर के भी फिर से खड़े हो जाते हैं। सिकंदर वही कहलाता है। मैं भी बस इसी तरह से डील करता हूं।

Q. बतौर एक्टर, आज के समय में क्या ख्वाहिश है?

A. ख्वाहिश यही है कि अब मैं और ज्यादा एक्सपेरिमेंट करूं। बड़ी फिल्म हो या छोटे बजट की फिल्म हो, वो मायने नहीं रखता हैं। मैं अपने आपको अंदर से कितना टटोल सकता हूं , मेरे लिए अब ये मायने रखता है। मुझे लगता है कि एक हजार इंसान आप ही अंदर होते हैं। ना जाने कितने तरह के इमोशन होते हैं, और वो सब इमोशन को छूना चाहता हूं मैं अपने अंदर।

Q. एक्सपेरिमेंट करने का मौका मिल पा रहा है?

A. हां, बिल्कुल। शायद इसीलिए मैं flaws वाले किरदार भी बहुत करता हूं। जैसे सेक्रेड गेम्स हो या गैंग्स ऑफ वासेपुर हो, उनमें मेरे किरदार में काफी कमियां हैं। सच कहूं तो मुझे वो किरदार आकर्षित ही नहीं करती हैं, जिनमें सिर्फ अच्छाई ही अच्छाई हो। वो बात सिर्फ भगवान में होती है। आप इंसान हैं तो आप में कुछ ना कुछ कमियां होगीं हीं और यही बात किरदारों को रिलेटेबल बनाती है।

Q. एक्सपेरिमेंट की बात करें तो, कुछ समय पहले आपने फिल्म हड्डी का लुक डाला था, जिसकी काफी ज्यादा चर्चा हुई और लोगों ने बहुत पसंद किया। उस किरदार के बारे में कुछ बता पाएंगे?

A. बहुत कठिन था वो। वो किरदार ही बहुत दर्दनाक था मेरे लिए। उसकी शूटिंग खत्म हो चुकी है, सिर्फ एक- दो दिनों का काम और बचा है, लेकिन मैं बचता हूं वो करने के लिए। उस किरदार की कॉस्ट्यूम पहनते ही ना एक ऐसी दुनिया में चला जाता हूं, जहां बहुत दर्द होता है। उस कम्यूनिटी का दर्द मैं अब समझ सकता हूं। जिनकी ख्वाहिश फीमेल बनने की होती है। फिल्म की शूटिंग करने से पहले मैं ट्रांसजेंडर्स के बीच में रहा और उनकी एक ही ख्वाहिश होती है जिंदगी में कि वो फीमेल बन जाएं। इसीलिए ये किरदार मैंने फीमेल की तरह किया, ना कि एक ट्रांसजेंडर की तरह से किया है। एक एक्टर के तौर पर मैं अपने आपको फीमेल समझता था। समाज में जिस तरह से उनको देखा जाता है, जो नजरिया होता है, वो सब मुश्किलें मैं अब समझ पा रहा हूं।

Q. जब इस तरह का गहरा किरदार निभाते हैं, जो इमोशनली काफी डिमांडिंग होता है, तो बतौर एक्टर उस इमोशन को छूना कितना मुश्किल होता है? क्या अपने जीवन की किसी घटना को याद करते हैं या क्या प्रोसेस होता है?

A. निर्भर करता है। कभी कभी पूरी पिछली जिंदगी आपके दिमाग में टेप की तरह रिवाइंड में घूम जाती है। बहुत सारे ऐसे सीन होते हैं, जहां पर आपको कोई घटना याद करनी पड़ती है और वो एक्टर के लिए बहुत दुखदायक होता है। बाहर से लोगों को पता नहीं चलता है कि इस वक्त ये सीन करते हुए एक्टर दिमाग में क्या याद कर रहा है। अपने जख्मों को कई बार कचोटना पड़ता है। जो यादें कहीं सो गई होती हैं, उन्हें जगाना पड़ता है। हड्डी में मैंने वो प्रोसेस अपनाई थी। जब मैंने जिंदगी के कुछ दर्दनाक पन्नों को वापस से खोला था। एक दृश्य के दौरान मैंने अपनी छोटी बहन को याद किया था, जब कैंसर से वो गुजर गई थीं। वो 25 साल की थी। आम तौर पर मैं उस बारे में सोचते हुए भी डरता हूं, क्योंकि वो मुझे तोड़ देता है, लेकिन इस फिल्म की शूट में मैंने उस घटना का सहारा लिया।

Q. किरदार में सच्चाई लाना आसान नहीं है।

A. बिल्कुल, किसी भी किरदार के लिए आपके अभिनय में सच्चाई होना सबसे जरूरी है। यदि आप दर्द में हैं, वो वही दर्द पर्दे पर भी दिखती है और फिर ऑडियंस उसे सराहती भी है। कहा जाता है ना कि एक अच्छा एक्टर होने से पहले आपको एक अच्छा इंसान होना पड़ता है। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता कि कोई अच्छा एक्टर हो और इंसान बुरा हो। ये भले हो सकता है कि आज उसे जज गलत कर रहे हों। आजकल ऐसे भी लोग कहीं से कहीं किसी की भी बात सुनकर एक धारणा बना लेते हैं। कहते हैं ना कि अपने बारे में तो सब वकालत करते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे की बात आती है, तो तुरंत जजमेंटल हो जाते हैं।

Q. कंगना रनौत के साथ आप एक फिल्म कर रहे हैं। वो आपकी काफी तारीफ भी करती हैं। बतौर प्रोड्यूसर कंगना के बारे में आप क्या सोचते हैं?

A. मैं तो कंगना को इसीलिए मानता हूं क्योंकि वो बहुत कमाल की एक्ट्रेस हैं। बहुत शानदार टैलेंट हैं वो और उतनी ही कमाल की प्रोड्यूसर भी हैं। उम्मीद करता हूं कि आगे वो और फिल्में प्रोड्यूस करें। जब उनकी फिल्म कर रहा था, तो सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि जो भी कलाकार फिल्म में थे, सब खुश होकर जाते थे सेट से। इतना अच्छा माहौल उन्होंने बनाकर रखा था और ये काबिलेतारीफ है कि किसी प्रोड्यूसर की वजह से पूरा यूनिट खुश रहे, ये अगर सीखना है तो कंगना से सीखना चाहिए।

Q. बतौर एक्टर सोशल मीडिया को कितना जरूरी मानते हैं?

A. जहां तक फिल्मों का सवाल है, तो फिल्म प्रमोशन के लिए वो एक अच्छा मीडियम है। बहुत सारे लोग इससे पैसा भी कमा रहे हैं, जो बहुत अच्छी बात है। लेकिन मैं यही मानता हूं कि बुराई को ज्यादा ना फैलने दें। कहते हैं कि प्यार फैलाने में वक्त लगता है लेकिन नफरत बहुत जल्दी फैल जाती है। तो मेरा तो यही मानना है कि इस मीडियम से पॉजिटिविटी फैलाना चाहिए।

Q. और अंत में, आने वाली फिल्मों के बारे में बताते जाएं..

A. जोगीरा सारारा के बाद मेरी टीकू वेड्स शेरू आएगी, फिर हड्डी, अद्भुत, बोले चूड़ियां और नूरानी चेहरा है.. ये सब फिल्में आने वाली हैं।

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