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Exclusive Interview:'आर्टिकल 15' जैसी फिल्मों से बदलाव आता है, क्रांति नहीं- मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब

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अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म 'आर्टिकल 15' सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। आयुष्मान खुराना, मनोज पाहवा, सयानी गुप्ता, कुमुद मिश्रा अभिनीत यह फिल्म जातिवाद पर सीधा प्रहार करते हैं। इसे निर्देशक का साहस कहेंगे कि उन्होंने बिना तोलमोल के इस संवेदनशील विषय को बड़ी ही बेबाकी और ईमानदारी से सामने रखा है। यदि यह आपको असहज करती है तो अच्छी बात है, क्योंकि सच्चाई इतनी ही क्रूर है।

'आर्टिकल 15' फिल्म रिव्यू

बहरहाल, आर्टिकल 15 देखने के बाद एक किरदार जो मेरे साथ लंबे समय तक रहा, वह है 'निशाद'। जिसे निभाया है मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब ने। 2011 में आई 'नो वन किल्ड जेसिका' से डेब्यू किये इस दमदार अभिनेता ने अपने हर किरदार के साथ एक प्रभाव छोड़ा है, चाहे वह मुरारी (रांझणा) हो, चिंटू (तनु वेड्स मनु रिटर्न्स) हो, सादिक (रईस) हो या निशाद (आर्टिकल 15)। फिल्म में वह कम वक्त के लिए हैं, लेकिन प्रभावशाली हैं।

इसे प्रभाव ही कहेंगे कि फिल्म देखने के बाद हमने तुरंत अभिनेता से संपर्क किया और एक खास बातचीत की। ऑस्ट्रेलिया में छुट्टियां गुजार रहे इस कलाकार ने पूरा समय दिया और अपनी ताजा रिलीज हुई फिल्म 'आर्टिकल 15' से लेकर वर्ण व्यवस्था, अपनी पहली फिल्म और थियेटर के दिनों की बातें तक खुलकर शेयर कीं।

यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

आर्टिकल 15 रिलीज हो चुकी है। फिल्म और फिल्म में आपके किरदार को लेकर आपको कैसी प्रतिक्रिया मिल रही है?

फिल्म को लेकर तो बहुत ही अच्छी प्रतिक्रिया आ रही है। सच कहूं तो मुझे अपने किरदार के लिए इस तरह के रिएक्शन की उम्मीद नहीं थी। फिल्म में मेरा किरदार काफी छोटा है। लेकिन हां, फिल्म में राजनीति का फ्लेवर तो निशाद की वजह से ही आता है। शायद इसीलिए उसे लोग अहमियत दे रहे हैं। हालांकि मुझे आइडिया था कि फिल्म अच्छी बन रही है। फिल्म को लोग पसंद करेंगे।

'निशाद' किस तरह से आपसे जुड़ा? छोटा किरदार था तो कुछ सोचने का समय भी लिया?

नहीं, नहीं। दरअसल, अनुभव सर ने मुझे स्क्रिप्ट पढ़ाया, तो शायद उस वक्त वो मुझे किसी और किरदार में देख रहे थे। लेकिन जब फिल्म को लेकर अनुभव सर से बात हुई तो उन्होंने मुझे कोई भी एक रोल के चुनाव का मौका दिया। तो फिर मैंने निशाद का किरदार चुना। इस किरदार के साथ मुझे एक कनेक्शन सा महसूस हो रहा था। सच कहूं तो स्क्रिप्ट पढ़ते ही मैं इस स्क्रिप्ट का फैन हो गया था। मैंने उनसे कहा कि आपके हाथ में खजाना है, इसे देखकर लोग हिल जाएंगे।

वर्ण व्यवस्था के विषय को लेकर फिल्म के दौरान या उसके बाद आपकी सोच में भी कुछ बदलाव आया?

मैं यूं भी राजनीति में थोड़ा दिलचस्पी लेने वाला इंसान हूं, शायद इसीलिए ट्रोल भी हो जाता हूं। हां, इस फिल्म ने इस विषय पर सोचने को मजबूर तो जरूर किया। जिस सोच पर फिल्म बन रही है, वह नई बात नहीं है। सदियों से यह हमारे समाज में हमारी आंखों के सामने है, लेकिन इस तरीके से कोई इस विषय को लेकर नहीं आया, जिस तरह इस फिल्म ने दिखाया है। बिना किसी एक जाति या समुदाय को गलत ठहराने की बजाए सच्चाई दिखाई गई है। मुख्य विलेन यहां हमारी सोच है।

जातिवाद को लेकर आप क्या सोचते हैं? समाज को किस तरह इस भेदभाव से बचाया जा सकता है?

जिस दिन हम मन में यह ठान लेंगे कि हमारे आस पास के सभी लोगों को हमें समान नजरों से देखना है, जिस दिन हम यह सोचना बंद कर देंगे कि तरक्की के लिए हमें किसी और से बड़ा बनना पड़ेगा.. उसी दिन से जातिवाद खत्म हो जाएगा। वर्ण व्यवस्था हमारे समाज में काफी अंदर तक धंसी हुई है कि कभी कभी खुद को भी नजर नहीं आती। मैं एक उदाहरण देता हूं, जब पीवी सिंधु ने ओलंपिक जीता था, तो गूगल पर उनका नाम टाइप करते ही दूसरे नंबर पर आता है- पीवी सिंधु की जाति। सिर्फ यह कह देने से कि नहीं हमारे समाज में ऐसा कोई भेदभाव नहीं है, हम लोग शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपाकर नहीं बैठ सकते।

मेरा एक और मानना है कि सबसे पहले तो ये सारी मैट्रिमोनियल साइट्स बंद कर देने चाहिए। आपको यदि जानना है कि हमारे देश में कितने कॉम्प्लेक्शन के लोग होते हैं तो इन साइट्स को पढिए। आपको पता चल जाएगा कि हमारे देश में एक आदर्श लड़की या एक आदर्श लड़के की क्या परिभाषा होती है। ये सारी चीजें जब तक हैं, तक तक वर्ण व्यवस्था जैसे मुद्दे खत्म नहीं होने वाले।

इसे अनुभव सिन्हा का साहस ही कहेंगे उन्होंने इस संवेदनशील लेकिन अहम विषय पर फिल्म बनाई?

इस विषय पर फिल्म बनाने की सोचना, बना देना और फिर रिलीज कर देना.. ये अपने आप में बड़ी बात है। मैं अनुभव सिन्हा जी को फुल मार्क्स देता हूं। ये आसान काम नहीं है। अनुभव सर और गौरव सोलंकी को मैं इस फिल्म के लिए पूरी क्रेडिट देना चाहता हूं। इस विषय को लेकर ये लोग काफी स्पष्ट थे, जिसे देखकर मुझे बहुत खुशी हुई।

आपने कहा था कि आप author backed roles करना चाहते हैं। इस फिल्म से कहीं वह तमन्ना पूरी हुई?

हां, बिल्कुल। इस तरह के किरदार में आपके पास कुछ अलग करने की गुंजाइश ज्यादा होती है। बतौर कलाकार आप खुद में कुछ अलग खोज पाते हो। ऐसे किरदारों में लेखक, निर्देशक भी खुद को इंवेस्ट करते हैं। आर्टिकल 15 में जैसा मेरा किरदार है, वह आता तो सिर्फ कुछ देर के लिए है, लेकिन पूरी फिल्म में उसकी उपस्थिति बनी रहती है।

आपके निभाये किरदारों को पसंद किया जाता है। लेकिन साथ ही यह भी धारणा है कि आप कम फिल्में करते हैं। ऐसे में सोचते हैं कि आप अंडर रेटेड हैं?

मैं अपने आपको बतौर अभिनेता अंडर रेटेड महसूस नहीं करता। मुझे मेरे काम के लिए इज्जत मिल रही है। यहां मैं किरदार की बात नहीं कर रहा हूं.. किरदार तो खैर यहां ज्यादा लिखे ही नहीं जा रहे हैं। लेकिन बतौर अभिनेता मुझे मेरे काम के लिए इज्जत हमेशा मिली। फिल्में फ्लॉप हुई लेकिन लोगों ने मेरे काम को पसंद किया। लोगों को शायद दिखता है कि मेरे अंदर और क्षमता है कि मैं कुछ अलग कर सकता हूं। लेकिन जिस तरह के किरदार मिल रहे हैं मुझे वो देखकर हां महसूस होता है कि क्या यार.. मैं इतना ही कर सकता हूं क्या! मैं उम्मीद करता हूं कि आर्टिकल 15 के बाद चीजें बदलेंगी। लोगों को समझ आए कि एक एक्टर एक ही तरह का काम नहीं कर सकता।

तो माना जा सकता है कि इंडस्ट्री में अभी भी आपका संघर्ष जारी है?

हां, बिल्कुल। मुझे किरदार की लंबाई कभी महत्वपूर्ण नहीं लगी। लेकिन किरदार में एक गहराई तो होनी चाहिए। मैं भी चाहता हूं कि मुझे ऐसे रोल मिलें, जिसमें लिखावट पहले से ही अच्छी हो। आर्टिकल 15 को ही ले लें, तो इसमें एक डॉयलोग है कि- कभी हम कभी हरिजन हो जाते हैं तो कभी बहुजन हो जाते हैं.. बस जन नहीं बन पा रहे कि जन गण मन में हमारी भी गिनती हो जाए। तो यह लाइन ही इतनी उम्दा है कि इसे परर्फोम करने में एक उत्साह रहता है। ये बातें एक कलाकार को प्रोत्साहित करती हैं।

'नो वन किल्ड जेसिका' में मनु शर्मा के किरदार को पहले सख्त और मजबूत रखा गया था। लेकिन ऑडिशन में आपने उसे अपने ढ़ंग से निखारा और थोड़ा कमजोर दिखाया .. जो कि निर्देशक को काफी पसंद आया। इसमें कितनी सच्चाई है? क्या आप आज भी अपने किरदारों में improvise करते हैं?

दरअसल, कुछ ही निर्देशक होते हैं जो आपको वो स्पेस देते हैं। निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने उस वक्त मुझे वह जगह दी और विश्वास दिखाया तो मैंने भी पूरी कोशिश की। अनुभव सिन्हा ने भी मुझे इस फिल्म में स्पेस दी है कि मैं अपने किरदार से लोगों को जोड़ सकूं। जब आपको पता है कि आपके पीछे पूरी टीम जो आपको बैकिंग दे सकती है तो आप किरदार के लिए और ज्यादा मेहनत करते हो, कुछ अलग करने की चाह रखते हो।

फिल्मों के चुनाव को लेकर क्या आप ज्यादा सेलेक्टिव हैं? या निर्देशकों के लिए आपको इंप्रेस करना मुश्किल है?

हां, हो सकता है ये गलत हो, लेकिन ये सच है। किसी निर्देशक के लिए मुझे इंप्रेस करना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन फिल्म के चुनाव में मैं यदि ये देखने लग जाऊं तो शायद मैं दो-तीन सालों में एक फिल्म करूंगा, जबकि अभी भी मैं कम फिल्में ही करता हूं। अभी मुझे जिस किरदार में थोड़ी क्षमता दिखती है, मैं उसे करता हूं। कई बार मैं लोग भी देखता हूं कि हां ये टीम अच्छी रहेगी, इनके साथ मैं आने वाले तीन महीने काम कर सकता हूं। वैसे हां, मैं हूं कुछ choosy. कुछ और लोग भी कहते हैं कि मैं कम काम करता हूं। लेकिन मैं अपने हर किरदार को 100 प्रतिशत देता हूं।

2011 से 2019.. 8 सालों के बाद अब जैसे किरदार, जैसी फिल्में मिल रही हैं, उससे संतुष्ट हैं?

नहीं, मैं संतुष्ट तो नहीं हूं। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन जिस तरह से किरदार मुझे मिल रहे हैं, मैं उससे संतुष्ट नहीं हूं। फिलहाल आर्टिकल 15 और तुर्रम खान.. यही दो ऐसी स्क्रिप्ट मेरे पास आई, जिसे पढ़कर मैं उत्साहित हुआ। लेकिन उम्मीद है मुझे कि अब कुछ बेहतरीन किरदार आने शुरु हो जाएं।

कहीं पढ़ा था मैंने कि रामगोपाल वर्मा की 'सत्या' से आप काफी प्रभावित थे?

हां बहुत ज्यादा। वह सिर्फ गैंगस्टर ड्रामा नहीं थी। जिस तरह से उन्होंने किरदारों को सामने लाकर खड़ा किया था। वहां से फिल्मों में अभिनय की बातें शुरु हो गईं। कैमरा वर्क, कहानी, किरदार.. उस फिल्म में सभी कुछ उम्दा था। मुझे फिल्मों में काम करने का कीड़ा उसी फिल्म से लगा।

थियेटर में काम करते हुए, जब आपने फिल्मों में आने की ठानी, तो बॉलीवुड से क्या उम्मीदें थीं?

उस वक्त तो कोई उम्मीद ही नहीं थी। मैं भविष्य का ज्यादा सोचकर कुछ करता नहीं दरअसल। हां, उस वक्त भी एक भूख थी बेहतर काम करने की.. वो आज भी है।

आपकी सबसे चर्चित किरदारों में 'मुरारी' भी है। कहा जा सकता है कि आनंद एल राय ने आपको एक बड़ी ऑडियंस तक पहुंचने का रास्ता दिया था?

मैं जो इतनी बातें कर पा रहा हूं, जो भी सफलता एन्जॉय कर रहा हूं, वह इसीलिए क्योंकि मैंने रांझणा की थी। रांझणा के बाद ही मेरे करियर में वह स्टेज आई थी कि लोग काम देने लगे थे। उसके बाद मुझे कहीं जाना नहीं पड़ा। आनंद एल राय से मैं यह क्रेडिट तो छीन ही नहीं सकता।

बहरहाल, आर्टिकल 15 को प्रतिक्रिया काफी अच्छी मिल रही है। लेकिन आपको लगता है कि इन विषय प्रधान फिल्मों से समाज में बदलाव आएगा?

कुछ बदलाव तो आता है। ऐसा तो नहीं होता कि एक फिल्म आई और सभी कुछ बदल गया। फिल्म सिर्फ प्रेरित करती है, कुछ लोगों के दिमाग में सवाल उठाती है, कुछ को सोचने पर मजबूर करती है, कुछ तो जवाब भी देती है। आर्टिकल 15 देखकर यदि एक व्यक्ति भी खुद की सोच में बदलाव लाता है तो यह फिल्म की जीत होगी। किसी क्रांति की उम्मीद हम नहीं कर सकते, लेकिन परिवर्तन तो आता है।

आगे किन फिल्मों में आपको देख पाएंगे?

आर्टिकल 15 के बाद तुर्रम खान आ रही है। फिल्म की शूटिंग खत्म हो चुकी है। तुर्रम खान को लेकर भी मैं काफी उत्साहित हूं। फिल्म में राजकुमार राव, नुसरत भरुचा भी हैं और निर्देशन कर रहे हैं हंसल मेहता।

English summary
In and exclusive interview with Filmibeat, Article 15 actor Mohammed Zeeshan Ayyub opens up about his choices of film, theatre days and his thoughts on casteism and article 15.
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