EXCLUSIVE INTERVIEW: "सलमान किसी से ये सोचकर दोस्ती नहीं करता कि उसे क्या फायदा मिलेगा"- महेश मांजरेकर

इस साल थियेटर्स में आने वाली चर्चित फिल्मों में शामिल है आयुष शर्मा, सलमान खान और महिमा मकवाना अभिनीत 'अंतिम द फाइनल ट्रूथ'। महेश मांजरेकर के निर्देशन में बनी ये फिल्म 26 नवंबर को रिलीज होने वाली है। इस गैंगस्टर ड्रामा पर बात करते हुए निर्देशक कहते हैं, "अंतिम की कहानी शहरीकरण की वजह से किसानों की ज़मीन छीनी जा रही है, उसके इर्द गिर्द घूमती है। मुझे लगता है कि कहीं न कहीं आपकी कहानी का आधार रियल होना बहुत जरूरी होता है।"

साल 1999 में फिल्म 'वास्तव' के साथ निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने वाले महेश मांजरेकर ने हिंदी सिनेमा के साथ साथ मराठी सिनेमा में काफी नाम कमाया है। कमर्शियल हिट्स देने के साथ साथ उन्होंने कई यादगार किरदार दिये हैं। फिल्म 'अंतिम' की शूटिंग के दौरान ही उन्हें कैंसर होने का पता चला। इलाज के साथ साथ उन्होंने काम भी जारी रखा।

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कैंसर के साथ अपनी लड़ाई पर महेश मांजरेकर ने कहा, "फिल्म खत्म होते ही मैं सर्जरी के लिए गया था। इस बारे में सिर्फ मेरे दो असिस्टेंट जानते थे। मुझे न्यूज में आकर सहानुभूति नहीं बटोरनी थी क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं ऐसा अकेला नहीं हूं दुनिया में। देश में लाखों लोग कैंसर से लड़ रहे हैं। बहुतों की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती है। बाहर कई लोग हैं जिन्हें मुझसे ज्यादा अटेंशन की जरूरत है।"

फिल्म 'अंतिम द फाइनल ट्रूथ' की रिलीज से पहले निर्देशक महेश मांजरेकर ने फिल्मीबीट से खास बातचीत की, जहां उन्होंने अपनी आगामी फिल्मों के साथ साथ अपने स्क्रिप्ट के चुनाव और सलमान खान के साथ अपनी दोस्ती को लेकर खुलकर बातें कीं।

यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

फिल्म के ट्रेलर को काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। क्या आपको लगता है कि फैमिली ड्रामा या ह्यूमन स्टोरीज के बीच आज भी गैंगस्टर ड्रामा ने दर्शकों के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है?

फिल्म के ट्रेलर को काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। क्या आपको लगता है कि फैमिली ड्रामा या ह्यूमन स्टोरीज के बीच आज भी गैंगस्टर ड्रामा ने दर्शकों के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है?

मेरा मानना है कि कहानी में कुछ ऐसा होना चाहिए, जो दर्शकों को आकर्षित कर सके। गैंगस्टर ड्रामा आते नहीं हैं, ऐसा नहीं है, लेकिन गैंगस्टर ड्रामा का इमोशनल बेस स्ट्रॉन्ग हो ना.. तो वो ज़रूर अपील करती है। कई फिल्में अभी आयी थी ऐसी, लेकिन मुझे लगा कि कहीं न कहीं उसमें soul की कमी थी। मुझे लगता है कि कहानी का आधार रियल होना बहुत ज़रूरी है। गैंगस्टर की जिंदगी पर फ़िल्म नहीं होनी चाहिए, लेकिन वो उस स्थिति में कैसे पहुंचा, इस पर कहानी होनी चाहिए। जैसे 'वास्तव' में कहानी मिल के स्ट्राइक और मिल के मजदूर के बच्चों का क्या होगा, इसके इर्द गिर्द थी। वहीं, अंतिम की कहानी शहरीकरण की वजह से किसानों के ज़मीन जो छीनी जा रही है, उसके इर्द गिर्द घूमती है। शहरें फैल रही हैं, और फैल के गांव में घुस रही हैं, तो वहां के ज़मीन के भाव बढ़ रहे हैं। मज़बूरी में किसान भी सोचते हैं कि चलो अच्छे दाम मिल रहे हैं, बेच दो। किसान के जो बच्चे हैं, उन्हें खेती करने में दिलचस्पी नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने पिता को पिसते देखा है। तो अब ये बच्चे क्या करेंगे? ये एक सर्कल है और इसी सर्कल से निकल कर बहुत सारे लड़के पुणे में आकर गैंगस्टर बन गए। एक समय ऐसा आ गया जब गांव के लड़के से पूछो की आगे जाकर क्या करोगे, तो कहते थे कि पुणे जाकर गैंगस्टर बनूंगा। तो ये एक डरावना सच है। दरअसल इन लड़कों को बहुत सारे ग्रुप का सपोर्ट भी मिल जाता है। जो इनका सिर्फ इस्तेमाल करते हैं। इधर गैंगस्टर को लगने लगता है कि मैं भगवान हो गया हूं। जबकि कब कहां इनका एनकाउंटर हो जाएगा, इन्हें भी नहीं अंदाज़ा होता है। तो ये कहीं न कहीं सच्ची घटनाओं से प्रेरित है, इसीलिए और भी दिलचस्प है। ये कहानी मेरे दोस्त प्रवीण तरडे ने लिखी है। ये उसके गांव की कहानी है। उसने जिस पैशन से ये कहानी लिखी है, मैंने उसी पैशन से प्रेजेंट करने की कोशिश की है।

अंतिम की शुरुआत कैसे हुई? इस रीमेक को बनाने के पीछे का पहला आइडिया क्या था?

अंतिम की शुरुआत कैसे हुई? इस रीमेक को बनाने के पीछे का पहला आइडिया क्या था?

इसके ओरिजनल फिल्म में मैंने काम किया था छोटा सा। प्रवीण तरडे, जिसने ये फिल्म बनाई है , वो मेरा दोस्त है। वो मेरा असिस्टेंट रह चुका है। जब सलमान ने ये फिल्म देखी तो उसने सोचा कि इसे हिंदी में भी बनाया जाए। हिंदी में भी इस प्रवीण तरडे ही डायरेक्ट करने वाले थे। काफी उनकी मीटिंग भी हुई थी। मुझे खुशी थी कि ये फिल्म हिंदी में बन रही है ताकि ऑल इंडिया स्तर पर लोग देख सकेंगे। फिर वक्त गुजरता गया। मैं भी जब कभी सलमान के पास जाता था तो डवलेपमेंट सुन रहा था। फिर मैंने बीच में सुना कि प्रवीण नहीं करने वाला है फिल्म। मैंने किसी से पूछा भी नहीं कि क्या कारण था। इस बीच फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम शुरु था। लगभग 6 से 8 महीने तक यह चला। मैं सलमान के घर जाता था तो सुनता था कि क्या क्या चल रहा है। आयुष भी बेसब्र हो रहा था कि कब शुरु होगी फिल्म। उसके बाद सलमान ने मुझसे पूछा कि तू करेगा डायरेक्ट? मैं कुछ हैरान रह गया। सच ये भी है कि मैं सिर्फ डवलेपमेंट सुन कर फिल्म नहीं कर सकता। तो मैंने कहा कि, करूंगा लेकिन मैं लिखूंगा तो करूंगा। फिर मैंने लिखी, सबको अच्छी लगी और फिर ये शुरु हुई।

फिल्म की कहानी के साथ साथ इसके स्टारकास्ट की भी काफी चर्चा है। आयुष और सलमान खान को आमने सामने लाने के पीछे क्या सोच थी?

फिल्म की कहानी के साथ साथ इसके स्टारकास्ट की भी काफी चर्चा है। आयुष और सलमान खान को आमने सामने लाने के पीछे क्या सोच थी?

आयुष तो शुरुआत से ही वो रोल करने वाला था। जब फिल्म के राइट्स लिये गए थे, उसी वक्त से ये तय था कि आयुष मेनलीड करेगा। लेकिन जो इंस्पेक्टर का रोल है, वो ओरिजनल में एक लंबा नहीं था, लेकिन मुझे लगा कि ये सही और गलत के बीच की लड़ाई है। तो मैंने उस रोल को थोड़ा डेवलप किया। सलमान को पहली बार ऐसी फिल्म में लिया गया, जहां हीरोइन नहीं है, गाने नहीं हैं। पहले हमने सोचा भी था कि स्क्रिप्ट में कुछ बदलाव करेंगे और सलमान के अपोजिट भी एक एक्ट्रेस कास्ट करेंगे। लेकिन फिर सभी को लगा कि यह फिट नहीं बैठ रहा। इस फिल्म में सलमान का रोल उनकी सभी फिल्मों से काफी अलग है। फैंस क्या बोलेंगे, इसका थोड़ा डर था क्योंकि सलमान काफी सीरियस रोल में है। वह एक ऐसा पुलिस अफसर का किरदार निभा रहे हैं, जो सही करना चाहता था लेकिन सिस्टम में फंसा है। ऐसे में वो क्राइम खत्म करने के लिए माइंड गेम्स खेलना शुरु करता है। ये रोल रिस्की था क्योंकि फैंस की उम्मीदों से हटके रोल है ये। मैं बहुत खुश हूं कि ट्रेलर देखकर फैंस ने सलमान को सराहा है। आज जब कहीं कमेंट्स पढ़ता हूं कि 'सलमान बहुत अलग दिख रहा है अंतिम में'.. तो एक सुकून मिलता है। सलमान ने सच में फिल्म में शानदार काम किया है। आयुष और सलमान भी एक दूसरे के साथ बहुत कंफर्टेबल थे। वो ब्रदर इन लॉ है, लेकिन साथ ही दोस्त जैसा भी है, जिस वजह से एक कंफर्ट लेवल था सेट पर और फिल्म की सीन्स में भी वो उभर कर आया।

जब आयुष की पहली फिल्म आई तो अभिनय को लेकर उन्हें मिली जुली प्रतिक्रिया मिली थी। लेकिन अंतिम के ट्रेलर में लोग उन्हें देखकर थोड़ा हैरान हैं, तारीफ भी कर रहे हैं। आप उन्हें एक अभिनेता के रूप में कैसे देखते हैं?

जब आयुष की पहली फिल्म आई तो अभिनय को लेकर उन्हें मिली जुली प्रतिक्रिया मिली थी। लेकिन अंतिम के ट्रेलर में लोग उन्हें देखकर थोड़ा हैरान हैं, तारीफ भी कर रहे हैं। आप उन्हें एक अभिनेता के रूप में कैसे देखते हैं?

मुझे लगता है कि आयुष डायरेक्टर्स एक्टर हैं। कभी कभी होता है कि कोई कलाकार अच्छा एक्टर होता है, लेकिन उसके अंदर से वो सामर्थ्य निकालना जरूरी होता है। लवयात्री से उसके बारे में राय बनाना सही नहीं होगा क्योंकि वो उसकी पहली फिल्म थी। हालांकि अच्छा हुआ उसने लवयात्री पहले किया क्योंकि उसे पता चला कि क्या नहीं करना चाहिए। और यहां ये फिल्म शुरु होने में जब देर हो रही थी, तो उसकी जो बेसब्री थी, उसका मैंने बराबर यूज किया इस रोल के लिए। बहुत बार ऐसा होता है कि यहां जो एक्टर आता है, वो ये सोच आता है कि मैं तो एक्टिंग करूंगा.. और यहीं पर फंस जाता है वो। अभिनय करने में आपको सिर्फ सिचुएशन पर रिएक्ट करना होता है। जो आदमी रिएक्ट करता है, वो अच्छा एक्टर है। कुछ एक्टर लाइंस रटते रहते हैं कि मैं ऐसा बोलूंगा, मैं वैसा बोलूंगा.. ये नहीं सोचते कि मुझे सामने वाले की लाइंस सुननी है। वो जब लाइंस पढ़ते भी हैं तो अपनी लाइंस पढ़ लेते हैं, सामने वाले की लाइन महत्वपूर्ण नहीं समझते। लेकिन उन्हें समझाना जरूरी है कि पहले उसका सुनो, फिर बोलो.. क्योंकि अभिनय रिएक्शन के बारे में हैं। मैंने आयुष के साथ वही किया और नतीजा सामने है।

इस फिल्म से महिमा मकवाना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में डेब्यू कर रही हैं। उन्हें निर्देशित करना कैसा था?

इस फिल्म से महिमा मकवाना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में डेब्यू कर रही हैं। उन्हें निर्देशित करना कैसा था?

मैंने उसका ऑडिशन लिया था और आडिशन में उसके सामने एक सपोर्ट के तौर पर मैं ही दूसरा रोल कर रहा था। जब उसने पहली लाइन बोली ना, उसी वक्त मैं समझ गया कि ये अच्छी एक्ट्रेस है क्योंकि उसने रिएक्ट किया था मेरी लाइन पर। तभी मैंने तय कर लिया था कि ये उस रोल के लिए सही अभिनेत्री है। फिल्म में जो लड़की का किरदार है उसके लिए मुझे किसी नई अभिनेत्री की ही तलाश थी। यदि मैं किसी चर्चित अभिनेत्री को लेता तो शायद उसकी इमेज को तोड़ने में मुझे थोड़ी दिक्कत होती.. क्योंकि आप मानें या ना मानें लेकिन नाम के साथ एक बैगेज तो आता है। अब उसमें एक्ट्रेस का भी दोष नहीं है। उसने चार फिल्में की हैं और चारों सफल रही है तो उसे लगता है कि मुझे सब आता है। लेकिन मुझे इस किरदार के लिए ऐसी एक्ट्रेस चाहिए थी जो जैसा मैं कहूं बिल्कुल वही भाव पकड़े। तो महिमा ने वो किया। वो बहुत ही मेहनती और अच्छी एक्ट्रेस है। मैं उसे आगे के लिए बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

फिल्म की शूटिंग महामारी के दौरान हुई थी, वो तो एक चैलेंज था ही। साथ ही आप पर्सनल लाइफ में भी स्वास्थ्य को लेकर जूझ रह थे। आपको कैंसर का पता चला, लेकिन आपने फिल्म पर काम नही रोका। उस वक्त आपका मोटिवेशन फोर्स क्या रहा? और आपके साथ काम कर रहे लोग कितने सर्पोटिव रहे?

फिल्म की शूटिंग महामारी के दौरान हुई थी, वो तो एक चैलेंज था ही। साथ ही आप पर्सनल लाइफ में भी स्वास्थ्य को लेकर जूझ रह थे। आपको कैंसर का पता चला, लेकिन आपने फिल्म पर काम नही रोका। उस वक्त आपका मोटिवेशन फोर्स क्या रहा? और आपके साथ काम कर रहे लोग कितने सर्पोटिव रहे?

सब बहुत ही सर्पोटिव थे। एक तो मैंने ज्यादा किसी को बोला भी नहीं था। दो असिस्टेंट थे, सिर्फ वो जानते थे। फिर बाद में मैंने सलमान को जानकारी दी थी। तो उसने कहा कि अमेरिका में जाकर ट्रीटमेंट कराओ। लेकिन मुझे था कि मैं यहीं कराउंगा। कीमो के दौरान भी मैं ठीक था। मुझे बहुत तकलीफ नहीं हुई। मेरे लिए ये फिल्म खत्म करना बहुत जरूरी था। मैं घर बैठकर भी क्या करता। सिर्फ ये था कि उस वक्त मेरी इम्यूनिटी बहुत डाउन थी तो मुझे इंफेक्शन का काफी डर था। उस वक्त कोविड केस भी काफी बढ़े हुए थे। लेकिन मुझे लगता है मैं लकी रहा कि हमने समय पर फिल्म खत्म कर ली। फिल्म खत्म होते ही मैं सर्जरी के लिए गया। लेकिन सर्जरी के पहले मैंने सबसे छिपाकर रखा था। मुझे लगा कि क्या होने वाला है बताकर भी, न्यूज में आकर भी। उसके बाद एक तो बहुत सारे सहानुभूति से भरे मैसेज आने लगते हैं, जो मैं बिल्कुल नहीं चाहता था। क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं ऐसा अकेला नहीं हूं दुनिया में जिसे कैंसर हुआ है। देश में लाखों लोग हैं एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से बाहर, जो कैंसर से लड़ रहे होते हैं, कई लोगों की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती है, फिर भी फाइट कर रहे होते हैं.. तो मैंने क्या ऐसा अलग कर लिया। मेरे पास तो सभी सहूलियत है। बाहर कई लोग हैं जिन्हें मुझसे ज्यादा अटेंशन की जरूरत है। मैंने कई लोगों को देखा है जो 24- 25 साल में ही कैंसर से लड़ रहे होते हैं, तो उनका दुख मुझसे कहीं बढ़कर है। इसीलिए मैं ये बाहर नहीं आने देना चाहता था.. और अब मैं अच्छा हूं, स्वस्थ हूं।

निर्देशन की बात करें, तो आपने एक तरफ वास्तव, कुरुक्षेत्र और अंतिम जैसी फिल्में हैं, तो दूसरी तरफ अस्तित्व, विरूद्ध और नटसम्राट जैसी फिल्में बनाई हैं। एक निर्देशक के तौर पर किस तरह की कहानी या शैली आपको ज्यादा अपील करती है?

निर्देशन की बात करें, तो आपने एक तरफ वास्तव, कुरुक्षेत्र और अंतिम जैसी फिल्में हैं, तो दूसरी तरफ अस्तित्व, विरूद्ध और नटसम्राट जैसी फिल्में बनाई हैं। एक निर्देशक के तौर पर किस तरह की कहानी या शैली आपको ज्यादा अपील करती है?

कोई ऐसी एक शैली की बात नहीं है। दरअसल, मैं खुद लिखता भी हूं। बहुत सारी कहानी तो मैंने लिखकर फेंक भी दी है। मुझे खुद ही लगा कि ये फिल्म अच्छी नहीं बनेगी। लेकिन कुछ फिल्में हैं जो मेरे दिल के करीब हैं। जैसे कि 'नटसम्राट'.. मेरी इच्छा है कि वो फिल्म हिंदी में मैं कभी बनाऊं। एक 'पांघरूण' नाम की फिल्म है, जो मैंने अभी की है, वो भी मैं चाहता हूं कि पूरे देश की जनता देखे। जो कहानी लिखते हुए आपको महसूस हो कि ये जाकर ऑडियंस से कनेक्ट करेगी, पर्सनल या साइकोलॉजिकल स्तर पर.. तो फिर मैं वो फिल्म करता हूं। फिर मैं देखता नहीं कि ये बॉक्स ऑफिस पर चलेगी या नहीं चलेगी।

और इतने सालों के अनुभव के बाद आप एक एक्टर के तौर पर कैसे अपने रोल चुनते हैं?

रोल मुझे चुनते हैं.. मेरे पास कहां विकल्प है कि मैं रोल का चुनाव करूं। सच कहूं तो मैंने ज्यादातर रोल जो किया वो पैसों के लिए किया है। कुछ किरदार हैं.. जैसे कि फिल्म 'मर्द को दर्द नहीं होता' में जो मैंने किया है, उसे बहुत एन्जॉय किया है। बाकी रोल ऐसे आते हैं कि चलो कोई और भी कर सकता है तो मैं भी कर लूंगा। मैं ज्यादा सोचता ही नहीं। मैं सेट पर जाता हूं, डायरेक्टर से पूछता हूं कि क्या चाहिए, वही करता हूं और वापस आ जाता हूं।

एक फिल्ममेकर के तौर पर ओटीटी और थियेटर के भविष्य को कैसे देखते हैं?

एक फिल्ममेकर के तौर पर ओटीटी और थियेटर के भविष्य को कैसे देखते हैं?

कोई शक नहीं कि ओटीटी आज एक बड़ी चीज है लेकिन जो अनुभव सिनेमाहॉल में मिलता है वो अलग ही है। अंतिम का ट्रेलर जब मैंने थियेटर में देखा लॉन्च के दिन.. तो मुझे भी महसूस हुआ कि दो सालों से ये कितना मिस कर रहा था मैं। वो अनुभव अद्भुत है। ओटीटी एक बहुत अच्छा माध्यम है। लेकिन आखिर में सच यही है कि बड़ी स्क्रीन पर फिल्म देखना एक अल्टीमेट अनुभव है। उसे कोई रिप्लेस नहीं कर सकता, उसे कोई नुकसान नहीं पहुंता सकता। मेरा यही सोचना है कि साथ साथ में चलेगा ओटीटी और सिनेमा।

आप अलग अलग इंडस्ट्री से जुड़े रहे हैं। लेखन, निर्देशन और अभिनय भी करते हैं। इन सभी के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं?

एक्टिंग में तो मैंने अब काफी बैकसीट ले लिया है। लेकिन मराठी सिनेमा के ऑडियंस की मुझे समझ है। यहां के ऑडियंस बहुत अच्छे हैं.. जो रियल सिनेमा को फेवर करते हैं। वैसे मैं कहूं तो देखिए सारी इंडस्ट्री जो है वो फ्राइडे टू फ्राइडे काम करती है। फ्राइडे के साथ सब रिलेशनशिप बदल जाती है। तो मेरा बस यही सोचना है कि काम करते जाओ, रूको मत। जो सामने आता है करते जाओ।

आपने और सलमान खान ने ऑन स्क्रीन साथ में काफी काम किया है, ऑफ स्क्रीन भी आपको दोस्ती बहुत पुरानी है। जाते जाते इस दोस्ती, इस बॉण्ड पर कुछ शेयर करना चाहेंगे?

आपने और सलमान खान ने ऑन स्क्रीन साथ में काफी काम किया है, ऑफ स्क्रीन भी आपको दोस्ती बहुत पुरानी है। जाते जाते इस दोस्ती, इस बॉण्ड पर कुछ शेयर करना चाहेंगे?

सलमान और मैं एक दूसरे से बहुत कनेक्ट करते हैं क्योंकि मुझे लगता है कि हम दोनों का माइंडसेट ना एक मिडिल क्लास वाले आदमी का माइंडसेट है। सलमान जब किसी से दोस्ती करता है तो वो ये नहीं सोचता कि इस दोस्ती से मुझे क्या मिलेगा। उसकी जरूरतें बहुत कम है। सलमान का घर अगर देखोगे तो वो इतना सिंपल रहता है। वो एक बेडरूम अपार्टमेंट में रहता है। जो मुझे कमाल लगता है। जहां बाकी स्टार्स बंगले और लग्जरी फ्लैट्स में रहते हैं.. सलमान वहीं बहुत खुश है। बहुत बार जब मैं जाता हूं उसके घर पर.. तो वो सोफा पर ही सोया रहता है। तो उसका आउटलुक ही ऐसा है कि वो ये नहीं देखता कि किस रिलेशनशिप से उसको क्या फायदा है। वो देखता है कि सामने वाला इमोशनली उससे कनेक्ट होता है क्या। तो मुझे लगता है कि हमारी दोस्ती रहेगी हमेशा.. बीच बीचे में झगड़े भी होते हैं.. लेकिन हमारी दोस्ती रहेगी हमेशा। हमलोग एक दूसरे को दोस्त नहीं बुलाते हैं.. वो मुझे भाऊ (भाई) बुलाता है, मैं उसको भाऊ बुलाता हूं। बता दूं, हमारी दोस्ती भी बस अचानक ही हुई थी। मैं किसी परेशानी में था तो बिल्कुल अचानक ही उसका एक दिन कॉल आया। उस वक्त हमारी दोस्ती भी नहीं थी। उसने कॉल किया और कहा कि 'क्या टेंशन चल रहा है तेरा.. चिंता मत कर, सब सही हो जाएगा।' मैं हैरान रह गया था। उसके बाद हम दोस्त बन गए.. बस। फिर ये दोस्ती चलती गई।

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