'हल्ला बोल' लोगों को सोचने पर मजबूर करेगी
सामाजिक सरोकारों से जुडी समस्याओं को अपनी फिल्म की कहानी बनाने वाले राजकुमार संतोषी की हर फिल्म दर्शकों में चेतना की लहर ज़रूर जगाती है. यह बात स्वयं राज जी भी मानते हैं. अपने बुलंद इरादों के अटल राज जी फिलहाल समस्याओं पर विचार करने की बजाय उसके खिलाफ हल्ला बोलने की तैयारी में हैं. आइए जानें क्या है 'हल्ला बोल".
आपने हमेशा आम आदमी को ध्यान में रखकर फिल्में बनाई है. 'हल्ला बोल" आपकी पिछली फिल्मों से कितनी अलग है ?
बहुत अलग है. कहानी पूरी तरह से अलग है जिस पर आज तक किसी ने कोई फिल्म नहीं बनाई है. यह कहानी है इंसान का इंसान के प्रति ज़िम्मेदारी की. लोगों का वास्ता सिर्फ अपने घर से रहता है पडोसी के घर में क्या हो रहा है उन्हें इससे कोई लेना देना नहीं रहता. बहुत पहले मैंने एक जगह पढा था “अगर आपके पडोसी पर कोई जुल्म कर रहा है और आप चुप हैं तो समझिए अगली बारी आपकी है". 'हल्ला बोल" इसी की कहानी है कि अगर आपके सामने कुछ गलत हो रहा है तो आप यह मत सोचिए कि मुझे इससे क्या बल्कि उसके खिलाफ आवाज़ उठाइए, हल्ला बोलिए. अगर आज आप दूसरों के हक में नहीं बोलेंगे तो कल आपके लिए भी कोई आवाज़ नहीं उठाएगा.
क्या वजह है कि इस फिल्म में आम आदमी की बजाय एक सुपर स्टार अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाता है ?
यह हमारी कहानी का आधार है. इसकी वजह यह है कि जिन लोगों ने सुपर स्टार को अपने सिर पर चढाया है उन्हें अपना आदर्श बनाया है उनके प्रति उसकी भी कुछ ज़िम्मेदारी बनती है. वह एक ऊंचे स्तर पर है जहां उसकी बात सुनी जाती है. इसलिए उन सबके लिए वह अपनी आवाज़ बुलंद करता है. अन्याय के खिलाफ हल्ला बोलता है. हालांकि आज के परिवेश में इसका उल्टा हो रहा है. आज जो जितना बडा आइकॉन है वह उतना ही चुप है. उसे डर है कहीं उसके बोलने से उसकी छवि न बिगाड दी जाए. इस फिल्म में पंकज कपूर का एक बहुत अच्छा डायलॉग है “शरीर पर चोट लगती है तो एक जानवर भी रोता है इंसान वो है जो दूसरों का दर्द समझे". इसे कहानी का सार भी कह सकते हैं.
क्या यह सच है कि यह फिल्म सफदर आज़मी साहब के नाटक 'अल्ला बोल" पर आधारित है ?
मैंने वह नाटक पढी नहीं है मगर मैं सफदर आज़मी साहब के बारे में जानता ज़रूर हूं. हो सकता है उनके नाटक में भी कुछ इस तरह के मुद्दे हों मगर हमारी फिल्म का नाटक से कोई लेना देना नहीं है.
विद्या बालन को सभी जहां ग्लैमरस लुक देने की होड में लगे हैं वही आपने उन्हें काफी सिंपल रखा है ?
यह कहानी की डिमांड थी. वह एक छोटे से कस्बे की रहने वाली लडकी है जिसकी शादी आगे चलकर एक सुपर स्टार से होती है. वह भले ही स्टार वाइफ बन जाती है मगर उसके मूल्य वही रहते हैं जो पहले थे. वह अजय की आवाज़ है उसे हमेशा जागरुक रखती है. अजय देवगन बदलता चला जाता है मगर वह बदलती नहीं इसलिए हमनें विद्या को काफी सिंपल लुक दिया है.
आपकी अधिकतर फिल्मों में अजय दिखाई दे रहे हैं. अपने और अजय के रिश्तों को आप किन शब्दों में बयां करेंगे ?
अजय मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं. साथ ही वह बहुत वर्सटाइल एक्टर भी हैं. उनका व्यक्तित्व इतना शानदार है कि मैं उन्हें जितना अलग अलग किरदार देता हूं वह उन सबमें न सिर्फ आसानी से ढल जाते हैं बल्कि उनके साथ पूरा न्याय करते हैं.
अजय काफी प्रैंकस्टर है क्या विद्या के अलावा अजय ने आप पर कभी प्रैंक खेला ?
(हंसते हुए) नहीं मैं हमेशा भाग जाता था. मुझे याद है 'लज्जा" की शूटिंग के दौरान मुझे पता चला था कि अजय मेरे साथ कोई प्रैंक करने वाले है सो मैं दो घंटे के लिए सेट से गायब हो गया और बाद में आया. शूटिंग करते वक़्त इस तरह की बातों से सेट पर जीवंतता बनी रहती है. इससे पता नहीं चलता कि काम कब खत्म हो गया.
नुक्कड नाटक के ज़रिए आप इस फिल्म का प्रोमोशन करने जा रहे हैं. इसकी कोई खास वजह ?
इस फिल्म में पंकज कपूर एक समाज सुधारक की भूमिका निभा रहे हैं. वह नुक्कड नाटक के ज़रिए समाज में फैली विसंगतियों को समाज के सामनें लाते हैं. इस फिल्म में अजय भी नुक्कड नाटक कर रहे हैं. मुझे लगता है लोगों से सीधे संपर्क करने का यह सबसे पूराना और कारगर तरीका है. रास्तों पर खडे होकर करंट टॉपिक पर बोलना लोगों से जुडने का सबसे बढिया माध्यम है. यही वजह है कि हमनें नुक्कड नाटक के ज़रिए लोगों से सीधे मिलने की योजना बनाई है. हमारे सभी कलाकार भारत के प्रमुख शहरों मे जाएंगे और वहां की परेशानियों को नुक्कड नाटक के ज़रिए केन्द्र में लाएंगे. इससे लोगों की परेशानियों को आवाज़ भी मिल जाएगी और हमारी फिल्म का प्रोमोशन भी हो जाएगा.
हमेशा से फिल्में समाज का आईना रही हैं. आपको क्या लगता है यह फिल्म समाज को कितना बदल पाएगी ?
यह फिल्म समाज को बदल देगी इसका दावा मैं नहीं करता हूं मगर हां समाज को सोचने पर मजबूर ज़रूर करेगी. कोई भी कदम उठाने से पहले हम उस पर सोचते हैं यह फिल्म उस सोच को आगे बाढाएगी. मैं एक समाज सेवक नहीं और ना ही राजनीतिज्ञ हूं. मैं एक फिल्मकार हूं और मेरा काम है किसी भी मुद्दे को मनोरंजकता के साथ दर्शकों के सामनें रखना. इस पर विचार विमर्श हो सकता है. हो सकता है इससे कुछ सहमत हों और कुछ असहमत हों. मगर बात तो है यह.
आपको लगता है आज के दौर की फिल्मों के लिहाज़ से 'हल्ला बोल" आज के दर्शकों के लिए पर्फेक्ट फिल्म है ?
आज कल लोग अलग तरह की फिल्में पसंद कर रहे हैं इस बात की मुझे खुशी है. फिल्म 'हल्ला बोल" में भी कुछ ऐसी बात है जो काफी अलग है और मुझे पूरा यकीन है यह फिल्म दर्शकों को ज़रूर पसंद आएगी.
साईमिरा पिरामिड द्वारा ड्रिस्ट्रीब्यूट की जा रही 'हल्ला बोल" उनकी पहली फिल्म है. आपको डर नहीं यदि वे कामयाब न हो पाए तो ?
जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. यह बहुत अच्छी संस्था है. साऊथ की फिल्मों के लिए यह काफी जाना माना नाम है. जिस तरह वे इस फिल्म का प्रोमोशन कर रहे हैं उससे मैं काफी खुश हूं. मुझे यकीन है आने वाले समय में साईमिरा पिरामिड बॉलीवुड के लिए भी एक जाना माना नाम हो जाएगी.
क्या वजह है 'अंदाज़ अपना अपना" के बाद आपने कोई कॉमेडी फिल्म नहीं बनाई. हालांकि इन दिनों कॉमेडी फिल्मों का बोलबाला है ?
कॉमेडी फिल्मों के लिए कुछ कहानियां है मेरे दिमाग में, वैसी कास्टिंग हो जाए तो फिल्म शुरू कर दूंगा. आज कल कॉमेडी फिल्मों के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है.
फिल्म 'लज्जा" के बाद कोई महिला प्रधान फिल्म न बनाने की वजह ?
दरअसल उस तरह की कोई कहानी नहीं मिली. मैं कोशिश कर रहा हूं कि दुबारा वैसी कोई फिल्म बनाऊं. 'हल्ला बोल" में भी विद्या का किरदार बहुत अच्छा है यह किरदार विशेष रूप से हमारी महिला दर्शकों को बहुत अच्छी लगेगी. यह किरदार भावुक होने के साथ साथ ताकतवर भी है.
आपकी आने वाली फिल्मों के बारे में बताइए ?
अभी मैं एक ऐतिहासिक फिल्म 'अशोक द ग्रेट" और 'रामायण" बना रहा हूं. इन फिल्मों के अलावा मैंने एक नाटक 'जिस लाहौर नहीं वेख्या" के सारे अधिकार हाल ही में खरीदा है और उस पर काम चल रहा है.
इनके अलावा आप 'पृथ्वीराज चौव्हान" पर आधारित एक फिल्म तथा 'लंदन ड्रीम्स" बनाने वाले थे. उसका क्या हुआ?
नहीं वह फिल्म मैं नहीं बना रहा हूं. दरअसल उस पर और भी लोग फिल्म बनाने की सोच रहे हैं सो मैंने उस फिल्म का आइडिया ड्रॉप कर दिया. मैं नहीं चाहता था कि 'लिजेंड ऑफ भगत सिंह" जैसा दुबारा हो. 'लंदन ड्रीम्स" के बारे में भी मैं अभी कुछ बता नहीं सकता क्योंकि अभी तक हमें किसी भी एक्टर की तारीख नहीं मिली है.
हमनें सुना है सलमान खान इस फिल्म को विपुल शाह के साथ बनवाना चाहते हैं?
जी हां मैंने भी कहीं पढा है. अगर सलमान ऐसा चाहते हैं तो इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है. यूं भी मैं इन दिनों काफी व्यस्त हूं.
इससे पहले शाहरुख ने भी 'अशोका" बनाई थी मगर वह फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई. आप ऐसा क्या मापदंड अपनाएंगे जिससे यह फिल्म दर्शकों को अपनी तरफ आकर्षित करे ?
देखिए पहली बात तो यह विषय इतना विशाल है जिसमें काफी शोध की ज़रुरत पडती है. यह जानकर भी यदि आप इसमें हाथ डाल रहे हैं तो इससे आपकी बहादुरी पता चलती है. नि:संदेह उन्होंने भी काफी शोध किया होगा और हमनें भी काफी शोध किया है. उनकी और हमारी फिल्म में बहुत फर्क है. उनकी फिल्म कलिंग युद्ध पर समाप्त हुआ था और हमारी फिल्म इस युद्ध से शुरू होगी. इस फिल्म की कहानी और कहानी कहने का अंदाज़ काफी अनोखा है. मुझे लगता है बहुत दिनों बाद हमारे दर्शकों को एक ऐतिहासिक फिल्म देखने को मिलेगी जो महिला प्रधान है. यह फिल्म राजा अशोक की अंतिम पत्नी तिस्य रक्षिता पर आधारित है. यह किरदार बिपाशा बसु निभाने वाली है.
अपने फिल्मी सफर को किन शब्दों में पारिभाषित करेंगे ?
मेरा अब तक का फिल्मी सफर काफी दिलचस्प रहा. कुछ फिल्मों में सफलता मिली तो कुछ में असफलता मिली. मुझे फक्र है मैंने जितनी भी फिल्में बनाई है सभी सामाजिक सरोकारों पर होने के साथ साथ दर्शकों द्वारा सराही गई. मैंने कभी इंग्लिश फिल्मों की कहानी को चुराए बिना हमेशा मौलिक कहानी पर फिल्म बनाई. आज कल मैं देख रहा हूं कि बडे बडे फिल्मकार बिना किसी संकोच के इंग्लिश फिल्मों की कॉपी कर रहे हैं. साथ ही बडे बडे नामी सितारे उन्हें रिजेक्ट किए बिना फिल्म करने को राज़ी हो जा रहे हैं. सबसे हास्यास्पद बात तो यह है कि अधिकतर फिल्मकार फ्रेम दर फ्रेम चोरी की गई फिल्म को बिना किसी शर्म के अपनी प्रेरणा कह रहे हैं.


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