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सुभाष घई के साथ एक मुलाक़ात

Posted By: संजीव श्रीवास्तव
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 सुभाष घई ने एक से बढ़कर एक हिट फ़िल्में बनाई हैं
बॉलीवुड के जाने माने निर्माता निर्देशक और शोमैन कहे जाने वाले सुभाष घई को सफलता आसानी से नहीं मिली है लेकिन अभी भी नई ऊंचाईयां छूने की चाह उनमें बरक़रार है.

इस हफ़्ते मेहमान हैं जाने माने निर्देशक और शोमैन कहे जाने वाले सुभाष घई.

संजीव श्रीवास्तव: आपका करियर इतना सफल और शानदार रहा है. जब आप इंडस्ट्री में आए थे तो क्या आपको लगता था कि आप इतने नामी निर्देशक बनेंगे?

सुभाष घई: देखिए, जब भी कोई नौजवान अपना संघर्ष शुरू करता है तो उसके सपने तो होते हैं, लेकिन आगे अंधेरा ही नज़र आता है. मैं भी 20-21 साल की उम्र में पुणे इंस्टीट्यूट में आया था तो एक्टिंग के लिए आया था. मेरे पिता ने मुझसे कहा था कि अगर आप ज़िंदगी में अपने शौक को पेशा बनाने के लिए गंभीर हो तो सबसे पहले प्रोफेशनल ट्रेनिंग लो.

जब मैं अभिनय के प्रशिक्षण के लिए गया तो मैंने पाया कि मेरा रुझान डायरेक्शन की तरफ ज़्यादा है. जब मैं मुंबई आया तो यूनाइटेड प्रोड्यूसर टैलेंट कॉन्टेस्ट में मुझे चुन लिया गया. इसमें 12 शीर्ष निर्माता थे, जिसमें यश चोपड़ा भी थे. मुझे लगा कि मैं बहुत प्रतिभाशाली हूँ. लेकिन जब मैंने दफ़्तरों के चक्कर लगाए तो असलियत पता लग गई और धक्के खाते-खाते दो साल लग गए.इस दौरान मेरी हताशा बढ़ती जा रही थी. संघर्ष के ये तीन साल मैं कभी भूल नहीं सकता.

लेकिन फिर एक मोड़ आया. दरअसल, मैं अक्सर अपनी कहानियां निर्माताओं और अपने दोस्तों को सुनाया करता था. प्रकाश मेहरा ने मुझे बुलाकर कहा कि मुझे कहानी चाहिए लेकिन मैं आपको कोई भूमिका नहीं दे सकता. अब मुझे तय करना था कि मुझे अभिनय छोड़कर स्क्रिप्ट लेखक बनना है या नहीं.

मेरी कहानियां काफ़ी पसंद की जाने लगी. छह-सात महीनों में ही कई बड़े डायरेक्टरों ने मुझे बुलाया और मेरी कहानियां पसंद की जानें लगी. एक साल में मेरे छह स्क्रिप्ट बिक गए. मुझे कहानियों की अच्छी कीमत मिलने लगी.

संजीव श्रीवास्तव: कहानी सुनाने में कितना वक़्त लगता है?

सुभाष घई: कहानी सुनाने में आपको 10 मिनट से लेकर 45 मिनट तक लग सकते हैं. ये निर्भर करता है कि कहानी सुनाने वाला कैसा है और आप उसे कितनी अच्छी तरह सुना रहे हैं. ये फ़िल्म की तरह है. फ़िल्म में आप 10 मिनट में बोर हो जाते हैं, लेकिन अगर फ़िल्म अच्छी है तो आप ढाई घंटे तक बैठे देखते रहते हैं.

संजीव श्रीवास्तव: तो आप कहानी पूरे नाटकीय अंदाज़ में सुनाते हैं?

सुभाष घई: बिल्कुल. कहानी सुनाने का मेरा तरीक़ा फ़िल्म दिखाने की तरह है. मैं अभिनेताओं को भी जब कहानी बताता हूँ तो उन्हें स्क्रिप्ट नहीं देता बल्कि उन्हें कहानी के बारे में बताता हूँ. फ़िल्म कालीचरण की स्क्रिप्ट पाँच-छह निर्माताओं ने खारिज़ कर दी थी, लेकिन फिर मैंने इसे एलएन सिप्पी को सुनाया और ये फ़िल्म हिट रही. यहीं से मेरे भाग्य ने पलटा खाया.

सलमान जन्मजात अभिनेता हैं. वो वाकई स्टार हैं. जिसके आगे-पीछे लोग होते हैं. उनमें स्टाइल है.यही वजह है कि वो 22 साल से एक्टर बने हुए हैं.
संजीव श्रीवास्तव: फ़िल्म युवराज के पीछे क्या सोच है क्या कहानी है?

सुभाष घई: युवराज फ़िल्म का जन्म संगीत से हुआ है. कुछ फ़िल्में हादसों पर होती हैं, कुछ ख़बरों पर और कुछ सामाजिक मसलों पर. लेकिन युवराज में मुझे लगा कि सिनेमा में जो संगीत दिया जा रहा है वो एमटीवी शैली का है.लोगों को आज भी गुरुदत्त, राजकपूर की फ़िल्मों के गाने बहुत पसंद हैं. तीन-चार साल से वीडियो-म्यूजिक संस्कृति फ़िल्मों पर भी हावी हो गई है. गानों की खिचड़ी सी बनी रहती है. दर्शक कलाकारों को तो देख ही नहीं पाते. तो नृत्य का भाव, मुद्रा सब ग़ायब रहती है.दरअसल, ये म्यूजिक-वीडियो संस्कृति अमरीका में 15-18 साल के बच्चों के लिए थी. बच्चे संगीत और वीडियो को तोड़ मरोड़कर बनाते थे. इससे युवराज का विचार मेरे मन में आया. लेकिन सिर्फ़ गानों से फ़िल्म नहीं बन सकती, इसलिए एक कहानी भी चुनी.कहानी तीन भाइयों की है. कैटरीना कैफ़ चैलो बजाती है, उसका आशिक़ है जो कोरस गायक है. वो सपने देखता है और उसका मानना है कि एक दिन वो बड़ा गायक बनेगा. लेकिन उसे पैसे की ज़रूरत होती है. उसके दो भाई हैं और उसकी मुश्किलें बढ़ती जाती हैं. तो ये पारिवारिक फ़िल्म होते हुए भी संगीत से जुड़ी है. जैसे मेरी फ़िल्में कर्ज़, ताल थी. उसी तरह युवराज है.

संजीव श्रीवास्तव: सलमान के साथ काम करना कैसा रहा?

सुभाष घई: सलमान जन्मजात अभिनेता हैं. वो वाकई स्टार हैं. जिसके आगे-पीछे लोग होते हैं. उनमें स्टाइल है. जिन्हें देखकर लोग आकर्षित होते हैं. सलमान में सबसे अच्छी बात ये है कि वो मानते हैं कि वो स्टार हैं. अधिकतर दूसरे अभिनेता मानते हैं कि उन्हें ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, ऐसे बात करनी चाहिए.सलमान स्टार तो हैं, लेकिन वो स्वाभाविक दिखते हैं. वो असली स्टार हैं. यही वजह है कि वो 22 साल से एक्टर बने हैं. यही कारण है कि उनकी छह फ़िल्में फ्लॉप हो जाएँ तब भी उन्हें फ़िल्में मिलती हैं.मैंने दिलीप कुमार, शाहरुख़ ख़ान से लेकर कई अभिनेताओं के साथ काम किया है. लेकिन ऐसा स्टार मैंने कभी नहीं देखा. अच्छी बात ये है कि उनके मन में मेरे लिए बहुत आदर है. शायद उन्होंने ये तय कर लिया था कि मेरे साथ वो बहस नहीं करेंगे.

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संजीव श्रीवास्तव: अच्छा ये तो हुई तारीफ़, कुछ दिक्कत भी हुई क्या उनके साथ?

सुभाष घई: देखिए, स्टार के साथ काम करने में सबसे बड़ी दिक्कत ये होती है वो समय पर नहीं आते. सलमान साहब अपने समय पर उठेंगे, व्यायाम करेंगे. आप कुछ भी करिए वो अपने समय पर आएंगे, फटाफट शॉट देंगे और चले जाएंगे. शुरुआती तीन-चार दिन में मुझे कुछ तकलीफ़ हुई.लेकिन बतौर निर्देशक हमें अभिनेता के हिसाब से खुद को बदलना होता है. हमें पता है कि अभिनेता से कैसे काम लेना है. मसलन, दिलीप कुमार साहब को चांदी की ट्रे और चाय दे दीजिए, अच्छा शॉट हो जाएगा. सलमान ख़ान जब कैमरे के सामने आते हैं तो उन्हें पता होता है कि इस सीन को कैसे करना है.एक बात मैं आपको बता दूँ कि वह बॉलीवुड का सबसे भला और नेक इंसान है. जितने ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद उन्होंने की है, उतनी किसी ने नहीं की होगी. उन्होंने तमाम असफल निर्देशकों का साथ दिया है. अच्छी बात ये है कि इसमें राजनीति नहीं है.

संजीव श्रीवास्तव: और कैटरीना कैफ़?

सुभाष घई: युवराज फ़िल्म की कहानी यूरोप के प्राग और ऑस्ट्रिया की पृष्ठभूमि पर आधारित है. कैटरीना इस फ़िल्म में वहाँ के एक डॉक्टर की बेटी की भूमिका कर रही हैं. कैटरीना इस भूमिका के लिए एकदम सही थी. ये भूमिका कोई और अभिनेत्री नहीं कर सकती थी.

संजीव श्रीवास्तव: आपने कई अभिनेत्रियों को मौका दिया. आप कैसे पहचान लेते हैं कि ये अभिनेत्री ऊंचाइयां छूने वाली है?

सुभाष घई: देखिए मुझे नई अभिनेत्रियों में अच्छी बात ये लगती है कि उनमें काम करने का रोमांच और मेहनत करने की ज़बर्दस्त इच्छा होती है. मैं अभिनेत्रियों की प्रतिभा को देखता हूँ, उनका चेहरा बाद में देखता हूँ. चाहे वो माधुरी, मनीषा, महिमा हो या फिर कैटरीना.युवराज में प्राग और ऑस्ट्रिया का पेशेवर सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा है. उस ऑर्केस्ट्रा का नेतृत्व करना हिम्मत की बात थी. कैटरीना ने इस चुनौती को स्वीकार किया. चैलो बजाना सीखा और अच्छा काम किया.

संजीव श्रीवास्तव: आपने कई अभिनेत्रियों के साथ काम किया. आपने इन्हें बेहद खूबसूरत तरीके से पर्दे पर कैसे पेश किया?

सुभाष घई: मैं हमेशा सिनेमा को सपने की तरह देखता हूँ. जब आप सिनेमा देखने जाते हैं तो वहाँ अंधेरा हो जाता है. सपने में खूबसूरत चीजें दिखाना मुझे अच्छा लगता है. मारधार, लड़ाई, मर्डर मुझे अच्छा नहीं लगता और घबराहट होती है.पहाड़ों के बीच गाना, असली ज़िंदगी में नहीं होता, लेकिन मैं सिनेमा में इसे दिखाता हूँ. दरअसल, मेरा ज़ोर पारिवारिक फ़िल्में बनाने पर होता है. बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी फ़िल्में देखें. मैं सिर्फ़ युवाओं के लिए फ़िल्म नहीं बना सकता.

संजीव श्रीवास्तव: आपकी सबसे खूबसूरत अभिनेत्री कौन है?

सुभाष घई: मेरी सबसे खूबसूरत अभिनेत्री तो एक ही है और वो है माधुरी दीक्षित.

संजीव श्रीवास्तव: और प्रतिभाशाली अभिनेत्री?

सुभाष घई: देखिए प्रतिभा का मैं आपको राज बता दूँ कि प्रतिभा को हमेशा चमकाया जाता है. प्रतिभा हर इंसान में होती है. देखने वाली बात ये है कि हम उस प्रतिभा को कितना निखार पाते हैं. माधुरी को ही लें तो शुरू में न तो उसे अभिनय आता था और न ही नृत्य.लेकिन बाद में जब उन्हें बताया गया कि उनमें कितनी प्रतिभा है तो उन्होंने मेहनत की और सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ी.

संजीव श्रीवास्तव: और ताल में ऐश्वर्या राय?

सुभाष घई: मुझसे पहले लोगों ने ऐश्वर्या राय की मिस वर्ल्ड की छवि को कैश किया था. मैं चाहता था कि उनकी इस छवि की छाप न दिखे. मैंने पहले ही ऐश्वर्या से कह दिया था कि इस फ़िल्म में मैं उनकी मिस वर्ल्ड की छवि तोड़ना चाहता हूँ और वो बहुत खुश हुई.

संजीव श्रीवास्तव: संगीत की इतनी ज़बर्दस्त पहचान आपको कैसे है. कर्ज़ का ही थीम म्यूजिक लें.

सुभाष घई: मुझे फ़िल्म हीरो की बांसुरी भी बहुत पसंद है. 30 साल बाद आज भी कई डिस्को में ये धुन सुनाई देती है.रही कर्ज़ की बात तो मुझे एक थीम चाहिए था जिसमें एक लड़का गिटार बजाता हो और पुनर्जन्म के बाद भी वो गिटार बजाय. जब मैंने प्यारेलाल जी से ये कहा तो उन्होंने मुझे छह धुनें सुनाईं तो मैंने एक चुन ली और ये ज़बर्दस्त हिट रही.संगीत मेरी आत्मा से जुड़ा है. मुझे सबसे बड़ा दुख है कि मैंने शास्त्रीय संगीत नहीं सीखा.

दिलीप कुमार अभिनय का स्कूल हैं. दिलीप कुमार के बाद जो स्टार बने हैं, उन्हीं की नकल करते हैं
संजीव श्रीवास्तव: आपने शायद अमिताभ बच्चन के साथ काम नहीं किया?

सुभाष घई: दुर्भाग्य की बात है कि मैं अभी तक अमिताभ के साथ काम नहीं कर सका. एक फ़िल्म हमने शुरू करने की कोशिश भी की, लेकिन वो नहीं बन सकी. अमिताभ देश के सबसे अच्छे अभिनेता हैं, उन्होंने तमाम भूमिकाएँ की हैं और शानदार की हैं. बुरी से भी बुरी फ़िल्म में भी अमिताभ का अभिनय शानदार रहा है.मेरी इच्छा है कि मैं अमिताभ के साथ काम करूँ. मैं ऐसी स्क्रिप्ट की तलाश में हूँ जो किरदार अभी तक अमिताभ ने नहीं किया हो. जब तक मुझे ऐसी भूमिका नहीं मिली तब तक मैं उन्हें प्रस्ताव भी नहीं दूँगा.

संजीव श्रीवास्तव: अभिनेताओं में आपकी पसंद?

सुभाष घई: दिलीप कुमार. दिलीप कुमार अभिनय का स्कूल हैं. दिलीप कुमार के बाद जो स्टार बने हैं, उन्हीं की नकल करते हैं या उनसे किसी न किसी तरह प्रेरित हैं. आज भी अगर आप शाहरुख़ के बालों का स्टाइल या शारीरिक भाषा देखें तो इसमें दिलीप कुमार की पचास के दशक की फ़िल्मों का अक्स मिलेगा. सभी बड़े अभिनेताओं में किसी न किसी रूप में दिलीप कुमार का अक्स मिलेगा.

संजीव श्रीवास्तव: आप अपनी फ़िल्मों में एक छोटी भूमिका क्यों करते हैं?

सुभाष घई: ये दर्शकों से मेरी मुहब्बत है. अगर मैं दर्शकों को थोड़ी मुस्कराहट देता हूँ तो इसमें क्या बुराई है.

संजीव श्रीवास्तव: आपकी पसंदीदा फ़िल्म?

सुभाष घई: मेरी पसंदीदा फ़िल्म मदर इंडिया है. मैं इस फ़िल्म को कई बार देख चुका हूँ. महबूब ख़ान ने जिस तरह से इस फ़िल्म के हर किरदार और हर सीन को फ़िल्माया है, वो बेजोड़ है. मैं तो साफ कहूँगा कि हम तो नक़लची हैं. विदेशी फ़िल्मों की कहानियां चुराते हैं, पुरानी फ़िल्मों के गाने चुराते हैं.

संजीव श्रीवास्तव: कोई सपना जो अभी पूरा नहीं हुआ हो?

सुभाष घई: ये तो लालच हुआ. इससे ज़्यादा किसी आदमी को क्या चाहिए. आप सुभाष घई हैं, लोग आपसे प्यार करते हैं. आपके पास पैसा है. आपने इंस्टीट्यूट खोला है जिसमें 500 बच्चे पढ़ते हैं. मेरी इच्छा है इसमें पढ़े बच्चे कामयाब हों और ऑस्कर लेकर आएँ.

संजीव श्रीवास्तव: आपको लोग शो मैन कहते हैं. क्या इससे आप अपनी छवि में क़ैद हो जाते हैं?

सुभाष घई: नहीं. ऐसा बिल्कुल नहीं है. मैं इसे ज़िम्मेदारी के रूप में लेता हूँ. क्योंकि लोग सुभाष घई को नहीं, उसके काम को पसंद करते हैं. अगर मेरा काम अच्छा नहीं होगा तो वो मुझे पसंद नहीं करेंगे. इससे मुझे बेहतर काम करने की प्रेरणा मिलती है.

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