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एक मुलाक़ात श्याम बेनेगल के साथ

Posted By: Super
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एक मुलाक़ात श्याम बेनेगल के साथ
इस हफ़्ते पेश हैं एक ऐसी हस्ती जिन्हें भारतीय सिनेमा का आधार स्तंभ माना जाता है. इन्होंने व्यवसायिक और समानांतर दोनो ही तरह के सिनेमा में अपनी छाप छोड़ी है. हम बात कर रहे हैं श्याम बेनेगल कि जो एक मुलाक़ात में आज हमारे मेहमान हैं.

सबसे पहले, आप ये बताएं कि फ़िल्म निर्माता बनने के बारे में कब सोचा?
देखिए, ये बहुत पुरानी बात है. मैं तब छह-सात साल का था. हम सिकंदराबाद सैन्य छावनी में रहते थे. वहाँ एक गैरीसन सिनेमा था. मैंने जब पहली बार फ़िल्म देखी तो इस क़दर सम्मोहित हो गया कि लगा कि दूसरी दुनिया में ही आ गया हूँ. और इस माध्यम से जो जुड़ाव हुआ वो आज भी कायम है.

वो पहली फ़िल्म कौन सी थी?
मेरे ख़्याल से वो कोई अंग्रेजी फ़िल्म 'कैट पीपुल" थी. वो हॉरर फ़िल्म थी. ऑडियो-वीडियो माध्यम से आप कुछ ऐसा कर सकते हैं जो असली दुनिया से हटकर हो. तो फ़िल्मों की इस ख़ासियत ने मुझे आकर्षित किया और आज भी आकर्षित करती है.

लेकिन आपने जो फ़िल्में बनाई वो असली दुनिया के काफ़ी करीब हैं?
बिल्कुल. काल्पनिक फ़िल्म और डॉक्यूमेंटरी में ये फर्क है कि डॉक्यूमेंटरी तथ्यों पर आधारित होती है. आम फ़िल्म हक़ीकत से जुड़ी होती हैं. इसमें हालात सच्चे होते हैं, लेकिन कल्पनाओं का सहारा लिया जाता है.

आपको समानांतर सिनेमा का पिता कहा जाता है, कैसा लगता है आपको...
असल में किसी ने अपनी सहूलियत के लिए 'समानांतर सिनेमा" के शब्द की रचना की है. मतलब ये कि इसे इस रूप में दिखाया जाता है कि ये मुख्य सिनेमा से हटकर है. या फिर ये बताने की कोशिश होती है कि इस तरह की फ़िल्मों से मनोरंजन नहीं होता. तो मैं इस तरह के शब्दों से कभी सहमत नहीं रहा.इतना है कि हर फ़िल्म निर्माता अपने तरीक़े से फ़िल्म बनाता है. मुझे लगता था कि आम तौर पर जो फ़िल्में बनती थी वो एक ही ढर्रे पर थी और कुछ इसमें अलग करने का स्कोप नहीं था.

हम आपकी पहली फ़िल्म अंकुर की बात करेंगे. लेकिन पहले ये बताएँ कि गुरुदत्त साहब आपके रिश्तेदार थे और बहुत अच्छे फ़िल्म निर्माता भी. तो क्या आप उनसे प्रभावित थे?
मैं उनसे प्रभावित तो नहीं था, लेकिन उनका व्यक्तित्व प्रेरित करने वाला ज़रूर था. जब मैंने 1950 में उनकी फ़िल्म बाजी देखी तो मैं इससे बहुत प्रेरित हुआ. इस फ़िल्म को देखने के बाद मैंने तय कर लिया कि अब तो मुझे फ़िल्में ही बनानी हैं.

ऐसी क्या ख़ास बात थी बाज़ी में?
दो चीज़ें थी. एक तो हिंदी फ़िल्मों के लिए मॉडर्न कहानी थी, दूसरे उसमें गाने भी अलग थे. फ़िल्म के दृश्य जिस तरह से फ़िल्माए गए थे उसकी शैली भी अलग थी. उनके गाने आइटम की तरह नहीं होते थे, मतलब ये कि गाने कहानी का हिस्सा होते थे. लेकिन मैं इस तरह की फ़िल्म नहीं बनाना चाहता था. मुझे अपनी प्रेरणा के हिसाब से फ़िल्म बनानी थी. ऐसा नहीं था कि मुझे किसी की नकल करनी थी.

आपको गुरुदत्त की सबसे अच्छी फ़िल्म कौन सी लगी?
सबसे अच्छी फ़िल्म मुझे 'साहब बीवी और ग़ुलाम" लगी. इसके अलावा 'प्यासा" और 'काग़ज के फूल" भी मुझे काफी पसंद हैं.

आप गुरुदत्त को नजदीक से देखते समझते थे. क्या वो ट्रेजडी किंग थे?
वो बहुत बुद्धिमान थे और अंतर्मुखी भी. उनका व्यक्तित्व बहुत दिलचस्प था. वो बहुत सोचते थे. जो लोग क्रिएटिव होते हैं, वो अक्सर डिप्रेशन में रहते हैं. उनके बहुत दोस्त नहीं होते थे. उनके सहयोगी ही उनके सबसे अधिक क़रीब थे. रहमान और जॉनी वाकर उनके अच्छे दोस्तों में थे. मैं मानता हूँ कि उन्हें किसी में विश्वास या यकीन नहीं था.

तो क्या आपमें भी कुछ इस तरह की बात है कि आप भी अकेलापन पसंद करते हैं?
देखिए. मैंने पहले भी कहा कि क्रिएटिव लोगों में इस तरह की समस्या होती ही है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं आपके सामने ये स्वीकार ही करूँ.

आपने पहली फ़िल्म अंकुर बनाई. उसका विचार कैसे आया?
हम लोग शहर के बाहरी हिस्से में रहते थे. हम लोग इतवार या छुट्टी के दिनों में अपने मकान मालिक के लड़कों के साथ उनके फॉर्म हाउस में जाया करते थे. वहाँ मैंने जो कुछ महसूस किया. उन घटनाओं को मैंने कहानी के रूप में लिखा और ये कहानी हमारे कॉलेज की पत्रिका में भी छपी. तभी मैंने सोचा कि इसको लेकर ही पहली फ़िल्म बनाऊँगा.

आपने इस फ़िल्म में शबाना आज़मी को पेश किया?
शबाना ही नहीं, मेरे समेत उसमें जितने भी लोग थे सबके लिए ये पहला मौका था.

आपको कैसे लगा कि शबाना अच्छी कलाकार हैं?
उनको देखकर ही लगता था कि वो अच्छी कलाकार हैं. उनमें बहुत आत्मविश्वास था. हालाँकि वो मेरी पहली पसंद नहीं थी. मैं इस फ़िल्म में वहीदा रहमान को लेना चाहता था, लेकिन तब वो बड़ी स्टार थी और उन्होंने ये भूमिका करने से मना कर दिया था.लेकिन कई साल बाद उन्होंने मुझसे कहा कि उन्होंने उस रोल के लिए मना कर बड़ी ग़लती की थी.

आपकी इतनी सारी उपलब्धियाँ हैं. बेस्ट फीचर फ़िल्म के पाँच अवार्ड. कैसा लगता है?
वैसे तो मुझे अब तक 27-28 पुरस्कार मिल चुके हैं. पुरस्कार से आपको पहचान मिलती है. यही पुरस्कार की महत्ता है. लेकिन असली पहचान तो दर्शक ही हैं जो आपकी फ़िल्मों को पसंद या नापसंद करते हैं.

अपने बचपन के बारे में कुछ बताएँगे?
मेरी पैदाइश हैदराबाद की है. जब मैं बच्चा था तो तब ये निजाम का हैदराबाद था, जब कुछ बड़ा हुआ तो ये भारत का हिस्सा बना. तो मैंने कई ऐतिहासिक बदलाव देखे हैं. एक बात और कि हैदराबाद शहर में सामंतवादी राज या सोच थी, लेकिन जहाँ हम रहते थे वो छावनी क्षेत्र था, जहाँ की सोच एकदम अलग थी.मैं मानता हूँ कि मेरा बचपन बहुत अच्छा बीता. मैं हैदराबाद के पहले अंग्रेजी स्कूल महबूब कॉलेज हाईस्कूल में पढ़ा. ये स्कूल शायद अब 160 साल पुराना होगा.

तो क्या आपके पिता सेना में थे?
नहीं, मेरे पिता फोटोग्राफर थे. वैसे तो वो कलाकार थे, लेकिन जीविकोपार्जन के लिए उनका स्टूडियो था.

आपने शुरुआत कहाँ से की?
सबसे पहले मैंने विज्ञापन एजेंसी में काम किया. बंबई आने के बाद मैंने कॉपी एडीटर के रूप में काम शुरू किया. पहले साल में ही मैंने हिंदुस्तान लीवर के लिए एक विज्ञापन लिखा था और इसे राष्ट्रपति पुरस्कार मिला. छह महीने बाद ही मैं विज्ञापन फ़िल्में भी बनाने लगा और 1000 से ज़्यादा विज्ञापन फ़िल्में भी बना दी. तो सीखने के लिहाज से ये मेरे लिए बहुत अच्छा रहा.

जब मैंने अपनी पहली फीचर फ़िल्म बनाई तो मुझे फ़िल्म निर्माण के तमाम पहलुओं की जानकारी थी. यही वजह थी कि अंकुर बनाने के बाद जब वी शांताराम ने मुझे फोन किया तो पूछा कि ऐसी फ़िल्म कैसे बनाई, अब तक क्या कर रहे थे. फिर मैं राजकपूर से मिला तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुमने पहले कभी फ़िल्म नहीं बनाई फिर भी इतनी अच्छी फ़िल्म बना दी. ये कैसे किया. शंयाम बेनेगल की फ़िल्म सुभाष चन्द्र बोस का एक दृश्य राजकपूर कैसे लगते थे आपको? उनकी पुरानी फ़िल्में बहुत अच्छी थी. श्री 420, आवारा. मुझे लगता है कि आवारा शानदार फ़िल्म थी. लेकिन बाद में उन्होंने शो मैन पर ज़्यादा ध्यान दिया. ख़्वाजा अहमद अब्बास, बीबी साठे उनके लिए कहानियाँ लिखा करते थे. इनके साथ में राजकपूर ने कई बेहतरीन फ़िल्में बनाईं.

आपको नहीं लगता कि राजकपूर की फ़िल्मों में कुछ संदेश होता था?
बिल्कुल. उनकी फ़िल्मों में संदेश होता था. दरअसल, वो समाज से जुड़े फ़िल्ममेकर थे.

जब आप विज्ञापन फ़िल्में करते थे, उन दिनों फीचर फ़िल्म की दुनिया में आपको और कौन सी चीजें प्रभावित करती थी?
देखिए, घर में तो मेरे पिताजी को प्रभात फिल्म्स, न्यू थियेटर की फ़िल्में बहुत पसंद थी. ये फ़िल्में बहुत अच्छी थी. इसमें समाज सुधार का विचार और संदेश था. प्रभात की फ़िल्में पारिवारिक मनोरंजन से भरपूर होती थी.जबकि मुझे हॉलीवुड की फ़िल्में पसंद थी. और इनमें से भी जॉन फोर्ड, विलियम वाइल्डर की फ़िल्में. मैंने इनसे काफ़ी कुछ सीखा.

कोई ख़ास फ़िल्म, जिसने आप पर बहुत असर डाला हो?
जब मैं बच्चा था, तब मुझे महबूब ख़ान की फ़िल्म औरत बहुत अच्छी लगी थी. बाद में महबूब ने मदर इंडिया बनाई. जो मुझे लगता है कि ये फ़िल्म अब तक की सबसे अच्छी फ़िल्म है.

अभी राजकपूर की बात हो रही थी. सुभाष घई को आज के ज़माने का शो मैन कहा जाता है. आपको लगता है कि वो राजकपूर जैसे हैं?
देखिए, सुभाष घई अलग तरह के फ़िल्ममेकर हैं. उनका ज़ोर पूरी तरह दर्शकों के मनोरंजन पर होता है. तो इस तरह से तो वो शो मैन हैं. लेकिन राजकपूर थोड़ा अलग हटकर थे. वो अपने पात्र रचने में दिलचस्पी रखते थे. ये पात्र आरके लक्ष्मण के कार्टून 'आम आदमी" जैसे थे.

आपकी पाँच-छह सबसे पसंदीदा फ़िल्में?
राजकपूर की 'आवारा", गुरुदत्त की 'साहब, बीबी और ग़ुलाम", 'प्यासा" और बीआर चोपड़ा की 'वक़्त" मुझे काफ़ी पसंद हैं. वैसे हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री बहुत बड़ी है. बहुत फ़िल्में बनती हैं, ऐसे में फ़िल्में चुनना बहुत मुश्किल होता है.

आपने नसरुद्दीन शाह, ओम पुरी, कुलभूषण खरबंदा जैसे अच्छे कलाकारों के साथ काम किया. आप कैसे तय करते थे कि इनमें से कौन किस भूमिका के लिए फ़िट है?
बिल्कुल, आपने जितने भी कलाकारों के नाम लिए, वे कोई भी भूमिका कर सकते हैं, लेकिन उनकी कद-काठी उस भूमिका के लिए फिट होनी चाहिए. उनकी योग्यता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता. लेकिन आप कुलभूषण को वैसा रोल नहीं दे सकते जो नसीरुद्दीन की कदकाठी के अनुरूप हो.

स्मिता पाटिल को आप फ़िल्मों में लेकर आए. वो किस तरह की अभिनेत्री थी?
वो इस तरह की अभिनेत्री थी कि कैमरा भी उन्हें पसंद करता था. जैसे ही वो कैमरे के सामने आती उनमें चमत्कारिक बदलाव हो जाता. मेरा कहने का मतलब ये है कि असल ज़िंदगी में शायद वो आम लड़की लगे, लेकिन कैमरे के सामने आते ही वो चमकने लगती. इसके अलावा उनकी खूबी ये थी कि वो कोई भी भूमिका कर सकती थी. और मानवीयता की बात करें तो वो बहुत अच्छी इंसान थीं.

आपने अपनी फ़िल्मों में दबे-कुचले वर्ग को बार-बार दिखाया है. तो क्या ये आपकी विचारधारा है या आपकी व्यक्तिगत राजनीति?
निश्चित तौर पर ये मेरी विचारधारा है. मैंने जो महसूस किया है देखा है. समाज से जुड़ी हुई समस्याओं को मैंने दिखाया है.

आपने कभी मनमोहन देसाई या यश चोपड़ा बनने के बारे में सोचा.तड़क-भड़क महंगा सेट, महंगी साड़ियां, सपनों की दुनियां, खूबसूरत लड़के-लड़कियां?
मेरे पास वैसी संवेदनशीलता नहीं है. शायद मैं उस तरह की फ़िल्में बना भी नहीं पाऊँगा.

ज़ुबैदा में रेखा के साथ काम करना कैसा लगा?
बहुत अच्छा लगा. वैसे रेखा पहले मेरे साथ 1980 में कलयुग में काम कर चुकी थी. वो बहुत मेहनती अभिनेत्री हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि वो सेट पर एकदम तैयार होकर आती हैं, वो आपका समय बर्बाद नहीं करतीं. मैं उनकी फोटोग्राफिक याददाश्त की दाद देता हूँ. उन्हें 30 साल पहले के संवाद भी याद होंगे.मुझे याद है कि जब मैंने कलयुग बनाई तो जहाँ शूटिंग हुई वहाँ बहुत शोर था और पोस्टसीन डब करना पड़ता था. 32 दृश्य थे और उनकी डबिंग करनी थी. आपको हैरत होगी कि रेखा ने दृश्य देखकर सारी डबिंग दो घंटे में ही कर दी.

और करिश्मा कपूर का अभिनय?
ज़ुबैदा में करिश्मा का अभिनय शानदार था. उन्होंने बड़ी जीवंत और यादगार भूमिका की. जिन लोगों ने ये फ़िल्म देखी उन्हें करिश्मा की भूमिका शानदार लगी.

आज के दौर में सबसे प्रतिभावान किस निर्देशक को मानते हैं?
किसी एक का नाम तो नहीं लिया जा सकता. काफी प्रतिभावान युवा निर्देशक हैं. अनुराग कश्यप हैं. 'चक दे इंडिया" के शिमित अमीन, नीरज पांडे, नागेश कोकूनूर, 'मुंबई मेरी जान" के निशिकांत कामत काफी अच्छे निर्देशक हैं.

और संगीतकारों में?
बहुत सारे हैं. सलीम-सुलेमान, शांतनु मोहित्रे. बहुत अच्छे हैं.

आपने इतने कलाकारों के साथ काम किया. आपके पसंदीदा कलाकार?
कई हैं. लेकिन आप अगर मुझसे पूछें कि हमारे पास दो सर्वश्रेष्ठ कलाकार कौन हैं तो मैं अमिताभ बच्चन और नसीरुद्दीन शाह दोनों का नाम साथ लेना चाहूँगा.

अमिताभ ने आपके साथ तो कोई फ़िल्म नहीं की है?
नहीं, अभी तक तो नहीं की है. उम्मीद करता हूँ कि उनके साथ फ़िल्म बनाऊँगा.

और आपकी अगली फ़िल्म?
अभी तो एक और कॉमेडी फ़िल्म बना रहा हूँ. शायद आठ-नौ महीने में बनकर तैयार हो जाएगी.

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