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INTERVIEW: "लोगों ने जोधा अकबर की तुलना मुगल-ए-आज़म से की थी, लेकिन क्या मेरी फिल्म वैसी थी?"

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लगान, स्वदेस, जोधा अकबर जैसी कुछ शानदार फिल्में देने वाले निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की अगली फिल्म 'पानीपत' रिलीज होने को तैयार है। अर्जुन कपूर, कृति सैनन और संजय दत्त अभिनीत यह फिल्म 6 दिसंबर को सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली है। ऐसे में फिल्मीबीट ने निर्देशक से मुलाकात की, जहां उन्होंने अपनी फिल्में, स्टारकास्ट, विवाद, बॉक्स ऑफिस की जिम्मेदारी से लेकर अपनी सफलता- असफलता का अनुभव साझा किया।

आशुतोष गोवारिकर 'पानीपत' को लेकर काफी उत्साहित हैं। फिल्म के बारे में बात करते हुए निर्देशक ने कहा- पानीपत को मैंने ज्यादा से ज्यादा authentic रखने की कोशिश की है। लिहाजा, कोई भी अवधारणा बनाने से पहले लोगों को फिल्म देखने की जरूरत है। यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके बारे में लोगों को जानना चाहिए। मैंने नेक इरादे से फिल्म बनाई है। बाकी तुलना करना हमारी प्रवृति है, वह मैं रोक नहीं सकता।

यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

इतिहास पर बनी एक फिल्म को दर्शकों के लिए दिलचस्प बनाना कितना आसान या मुश्किल रहता है?

इतिहास पर बनी एक फिल्म को दर्शकों के लिए दिलचस्प बनाना कितना आसान या मुश्किल रहता है?

मैंने भी खुद से सबसे पहला सवाल यही किया था। जब आप एक थीम उठाते हैं तो यह सवाल हमेशा दिमाग में रहती है कि इससे दर्शकों को कैसे बांध सकते हैं। खासकर जब कहानी इतिहास से जुड़ी हो। आज के दर्शकों का ध्यान आकर्षित करना आसान नहीं है। आज सभी मल्टी टास्क लोग हैं। वो फ़िल्म देखते देखते ही मोबाइल पर भी बात करते हैं। दिन का भी प्लान बनाते हैं। परिवार के बारे में भी सोचते हैं। ऐसे में आपकी कहानी कितनी समसामयिक है, दिलचस्प है और तेज़ है; यह बहुत मायने रखता है। मैंने पानीपत में इन बातों का ध्यान रखा है। उम्मीद है दर्शकों को यह पसंद आएगी।

इतिहास पर कई फिल्में बनी हैं, ऐसे में तुलना होना भी लाज़िमी है। इसे किस तरह देखते हैं?

इतिहास पर कई फिल्में बनी हैं, ऐसे में तुलना होना भी लाज़िमी है। इसे किस तरह देखते हैं?

जब मैंने जोधा अकबर बनाई थी, मैंने सोच के रखा था कि मैं जहांगीर और शाहजहां का हिस्सा नहीं उठाऊंगा क्योंकि वह बन चुका है। जब मैंने लगान बनाई तो मेरे लिए ब्रिटिश काल वहाँ खत्म हो गया। अब मैं उस वक़्त पर फ़िल्म नहीं बना सकता। तुलना हमेशा होगी, वह हमारी प्रवृत्ति है। इसीलिए आप किस काल से कौन सी कहानी उठा रहे हैं यह मायने रखता है। अब लोगों ने पानीपत का ट्रेलर देखा और बाजीराव से इसकी तुलना होने लगी। जाहिर है ये पेशवा की कहानी है तो पहनावा, भाषा, घर सब वैसा ही होगा। ये बाजीराव के ही तो आगे की पीढ़ी है। लेकिन दो फ़िल्मों को जो अलग बनाती है, वो है कहानी। और कहानी कहने का आपका नज़रिया।

फिल्म की पहली झलक के साथ ही अर्जुन कपूर की तुलना रणवीर सिंह ने की जाने लगी। टीम इस बात के लिए तैयार थी?

फिल्म की पहली झलक के साथ ही अर्जुन कपूर की तुलना रणवीर सिंह ने की जाने लगी। टीम इस बात के लिए तैयार थी?

मैं तो इस बारे में सोच भी नहीं रहा हूं। जब मैंने जोधा अकबर बनाई थी तो लोगों ने फ़िल्म देखने से पहले उसे भी मुग़ल ए आज़म के साथ जोड़ कर देखना शुरू कर दिया था। लेकिन क्या मेरी फिल्म वैसी थी? क्या ऋतिक पृथ्वीराज कपूर की तरह लग रहे थे? उसी तरह सदाशिव राव के लिए जैसे अभिनेता की मुझे तलाश थी, अर्जुन उसमें फिट बैठते हैं। खास इसीलिए भी है क्योंकि अर्जुन ने इससे पहले ऐसा कोई किरदार किया नहीं है, तो एक नयापन है। कृति में एक चुलबुलापन है, जो मुझे इस किरदार के लिए सही लगा। और संजय दत्त का व्यकितत्व, उनका aura अभी अलग ही स्तर पर है। इन तीनों के चुनाव में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई।

इन सितारों में अपना एक अलग स्वैग है, इन्हें डाइरेक्ट करना आपके लिए कितना आसान या मुश्किल रहा था?

इन सितारों में अपना एक अलग स्वैग है, इन्हें डाइरेक्ट करना आपके लिए कितना आसान या मुश्किल रहा था?

मैंने इनके काम को स्टडी किया। इनकी खासियत को जाना, जिसके लिए इन्हें पसंद किया जाता है। इनके व्यकितत्व के साथ मैंने अपनी सोच को मिक्स किया। मेरे दिमाग में सदाशिव राव कैसे हैं, अर्जुन को वह रूप दिया। जैसा कि मैंने कहा कृति में एक मॉडर्न अंदाज है, जो मैं पार्वतीबाई में चाहता था। ये एक्टर्स सेट पर काफी तैयार पहुंचे थे, इसीलिए मुझे ज्यादा मुश्किल नहीं हुई।

आपकी ज्यादातर फिल्में इतिहास पर ही आधारित होती है। क्या इस विषय में आपकी ज्यादा रूचि है?

आपकी ज्यादातर फिल्में इतिहास पर ही आधारित होती है। क्या इस विषय में आपकी ज्यादा रूचि है?

जब भी मैं कोई ऐतिहासिक फ़िल्म ख़त्म करता हूँ, तो यही सोचता हूँ कि मेरी अगली फिल्म में सिर्फ दो किरदार होंगे, एक रात की कहानी होगी, एक ही कमरे में होगी, स्विट्जरलैंड में होगी और 18-20 दिनों में फ़िल्म खत्म। अभी मुझे हर फ़िल्म में 120 से 150 दिन लग जाते हैं। लेकिन फिर जब मैं किसी थीम की खोज करता हूँ, तो वह अकसर इतिहास पर आकर ही ख़त्म होती है। खासकर पानीपत को मैंने ज़्यादा से ज़्यादा authentic रखने की कोशिश की है।

इतिहास पर बनी फिल्मों पर अकसर यह दोष लगाता जाता है कि तथ्यों को तोड़ मोड़कर पेश किया गया है। इस पर क्या सोचते हैं?

इतिहास पर बनी फिल्मों पर अकसर यह दोष लगाता जाता है कि तथ्यों को तोड़ मोड़कर पेश किया गया है। इस पर क्या सोचते हैं?

हर 10 साल में, 15 साल में एक नया इतिहासकार आता है और इतिहासकारों में खुद भी बहुत सारे मतभेद हैं। और मैं एक फिल्ममेकर हूँ, मैं तो इतिहासकार भी नहीं हूं। मैं इतिहास की किताब से बस एक चैप्टर स्क्रीन पर दिखाना चाहता हूँ। इतिहास की कोई किताब आप देखेंगे तो 300-400 पन्नों की होती है। जब हम फ़िल्म बनाते हैं तो उसमें से कुछ एडिट करते हैं, तो जो एडिट करते हैं, उस पर ही सवाल उठाए जाते हैं। या जो रखते हैं उस पर सवाल उठ जाते हैं कि ये क्यों रखा, वो क्यों नहीं रखा, वो ज़्यादा महत्वपूर्ण था। इसीलिए मैं अब इस बारे में ज़्यादा सोचता नहीं हूं। लोग सवाल करेंगे तो मैं जवाब दूंगा, मेरे पास लोगों के हर सवाल का जवाब है। इतिहास सबका है। उदाहरण के तौर पर, लोगों के दिमाग में मोहेंजोदड़ो सभ्यता की जो कल्पना है, मेरी फिल्म मोहेंजोदड़ो वैसी नहीं लगी, वह खरी नहीं उतरी, इसीलिए लोगों को पसंद नहीं आई। लगान या जोधा अकबर उस कल्पना से जुड़ गए थे, इसीलिए लोगों ने पसंद किया।

खबरों में है कि आपकी अगली फ़िल्म गौतम बुद्ध पर होगी?

खबरों में है कि आपकी अगली फ़िल्म गौतम बुद्ध पर होगी?

2010 से ही ये मेरे दिमाग में है, लेकिन पहले इसके लिए सही कास्टिंग नहीं मिल रही थी। अभी फिलहाल दो तीन स्क्रिप्ट हैं मेरे पास, तो इसके बाद क्या बनाऊंगा, ये फिलहाल मैंने सोचा नहीं है।

English summary
Director Ashutosh Gowariker is ready with his upcoming film Panipat. Before film release, he had a chat with media, where he talked on his films, controversies and starcast.
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